Maa Lalita jayanti 2026: हिंदू धर्म की समृद्ध परंपरा में माँ ललिता जयंती का एक विशेष स्थान है। हर साल की तरह इस बार भी माघ मास की पूर्णिमा को माता ललिता त्रिपुरा सुंदरी के प्राकट्य उत्सव के रूप में मनाया जाएगा। इस वर्ष यह पावन तिथि 1 फरवरी को पड़ रही है।
तिथि का महत्व: अक्सर लोग तारीख को लेकर उलझन में रहते हैं, लेकिन याद रखें कि हमारी सनातन परंपरा में त्योहार कैलेंडर की तारीख से नहीं, बल्कि चंद्रमा की चाल (तिथि) से तय होते हैं। माँ ललिता का यह पर्व भी पूर्णिमा की तिथि पर ही मनाया जाता है।
शक्ति का अद्भुत स्वरूप: माँ ललिता केवल एक देवी नहीं, बल्कि सौंदर्य, ज्ञान और सृजन का संगम हैं। शाक्त परंपरा (शक्ति की पूजा) को मानने वालों के लिए उनकी उपासना सर्वोच्च मानी गई है। भक्त मानते हैं कि इस दिन ललिता सहस्रनाम का पाठ करने या श्री चक्र के सामने ध्यान लगाने से न केवल मानसिक शांति मिलती है, बल्कि जीवन के कठिन रास्तों पर भी स्पष्टता आने लगती है।
अगर आप भी अपनी आध्यात्मिक यात्रा में संतुलन और आंतरिक शांति की तलाश में हैं, तो इस माघ पूर्णिमा पर माँ ललिता की कृपा पाने का अवसर न चूकें।
माँ ललिता कौन हैं? (Who is Maa Lalita?)
शक्ति के रूप में माँ ललिता का परिचय (Introduction to Maa Lalita as the Supreme Shakti)
हिंदू धर्म में “शक्ति” केवल शारीरिक बल या सामर्थ्य का नाम नहीं है। शक्ति वह मूल चेतना है जिससे ब्रह्मांड का सृजन, संचालन और परिवर्तन संभव होता है। माँ ललिता इसी जाग्रत और पूर्ण शक्ति का स्वरूप हैं। उनके बिना सृष्टि की गति और जीवन की कल्पना असंभव है।
माँ ललिता का स्वरूप डराने वाला या कठोर नहीं, बल्कि अत्यंत सौम्य और संतुलित है। शास्त्रों में उन्हें ऐसी सूक्ष्म शक्ति के रूप में वर्णित किया गया है, जो शांत रहकर पूरे ब्रह्मांड को नियंत्रित करती हैं। उनके व्यक्तित्व में करुणा और जागरूकता का अद्भुत समन्वय है—वे केवल ममता देने वाली देवी नहीं, बल्कि भीतर की चेतना को जगाने वाली महाशक्ति हैं।
उनकी उपासना में बाहरी दिखावे और कर्मकांड से कहीं अधिक आंतरिक शुद्धि को महत्व दिया गया है। माँ ललिता की साधना का मुख्य उद्देश्य मन को संतुलित करना और जीवन की बिखरी हुई ऊर्जा को एकाग्र करना है। वे उस परम शांति का प्रतीक हैं, जो क्रियाशील होते हुए भी सदैव स्थिर रहती है।
ललिता, त्रिपुरा सुंदरी और षोडशी नामों का अर्थ (Meaning of the Names Lalita, Tripura Sundari and Shodashi)
माँ ललिता को विभिन्न नामों से स्मरण किया जाता है, और प्रत्येक नाम उनके स्वरूप के किसी न किसी पक्ष को प्रकट करता है।
“ललिता” शब्द का अर्थ होता है – सहज, कोमल और स्वाभाविक। इस नाम के माध्यम से माँ के उस रूप का बोध होता है जिसमें कठोरता नहीं, बल्कि सहज सौंदर्य और अपनापन है।
“त्रिपुरा सुंदरी” नाम का संबंध तीन स्तरों से जोड़ा जाता है। इन तीनों का अर्थ लोक, अवस्था और शक्ति के रूप में समझा जाता है। इसका भाव यह है कि माँ Lalita केवल किसी एक लोक या अवस्था तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उनका प्रभाव हर स्तर पर माना गया है।
“षोडशी” का अर्थ सोलह होता है। यह सोलह कलाओं की पूर्णता का संकेत है। इस नाम के माध्यम से माँ Lalita को पूर्णता का प्रतीक माना गया है, जहाँ कुछ भी अधूरा नहीं रहता।
शाक्त परंपरा में माँ ललिता का स्थान (Position of Maa Lalita in the Shakta Tradition)
शाक्त परंपरा में माँ ललिता का स्थान सर्वोच्च और अत्यंत विशिष्ट है। इस मार्ग में ‘शक्ति’ को ही ब्रह्मांड का मूल आधार माना जाता है। यहाँ यह प्रसिद्ध सिद्धांत है कि “शक्ति के बिना शिव भी निष्क्रिय (शव के समान) हैं।” इसी कारण, माँ ललिता को समस्त ऊर्जा और चेतना का केंद्र माना गया है।
माँ ललिता को शाक्त मार्ग में ‘राजराजेश्वरी’ के नाम से संबोधित किया जाता है, जिसका अर्थ है—वे देवी जो सभी शक्तियों और देवों पर शासन करती हैं। उनकी उपासना की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें बाहरी आडंबरों के बजाय अनुभव और आत्मबोध पर बल दिया जाता है। यही कारण है कि ललिता उपासना आध्यात्मिक रूप से अत्यंत गंभीर होते हुए भी साधक के लिए एक सहज और सुखद मार्ग है।
तीन लोक, तीन शक्तियाँ और माँ ललिता का संबंध (Relationship of Maa Lalita with the Three Worlds and Three Powers)
धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से ‘तीन लोकों’ का अर्थ केवल स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल जैसे भौतिक संसार नहीं, बल्कि चेतना के दृश्य और अदृश्य स्तरों से है। माँ ललिता इन तीनों अवस्थाओं (जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति) में समान रूप से व्याप्त हैं, इसीलिए उन्हें ‘त्रिपुर सुंदरी’ कहा जाता है।
माँ ललिता का संबंध ब्रह्मांड की तीन मुख्य शक्तियों से भी अत्यंत गहरा है:
इच्छा शक्ति: संकल्प लेने की क्षमता।
ज्ञान शक्ति: सही मार्ग को समझने की चेतना।
क्रिया शक्ति: संकल्प को वास्तविकता में बदलने का पुरुषार्थ।
जीवन का सत्य यह है कि इच्छा बिना ज्ञान के भ्रमित हो जाती है, और ज्ञान बिना क्रिया के अर्थहीन रह जाता है। माँ ललिता इन तीनों शक्तियों के बीच वह संतुलन हैं, जो साधक के जीवन में स्थिरता और स्पष्टता लाती हैं। यही संतुलन उनकी उपासना का मूल आधार है—जहाँ साधक अपने भीतर की ऊर्जाओं को एक दिशा में केंद्रित करना सीखता है।
माँ ललिता के प्राकट्य की संक्षिप्त कथा (How Did Maa Lalita Manifest? (Puranic Narrative))
माँ ललिता के प्राकट्य की कथा उस समय से शुरू होती है जब भगवान शिव ने अपनी तपस्या भंग होने पर कामदेव को भस्म कर दिया था। कामदेव की उस भस्मराशि से भंडासुर नामक असुर का उदय हुआ। भंडासुर शक्ति और अहंकार का प्रतीक था, जिसने अपनी आसुरी शक्ति से तीनों लोकों में हाहाकार मचा दिया और धर्म की व्यवस्था को अस्त-व्यस्त कर दिया।
जब देवताओं को अनुभव हुआ कि इस संकट का अंत केवल सृजन की मूल चेतना से ही संभव है, तब उन्होंने ‘चिदग्नि कुण्ड’ (दिव्य अग्नि) की स्थापना कर एक महा-याग किया। देवताओं के संकल्प और साधना की उस अग्नि से माँ ललिता एक अत्यंत तेजस्वी और सौम्य रूप में प्रकट हुईं।
माँ ललिता का यह प्राकट्य ब्रह्मांड में संतुलन स्थापित करने के लिए था। उन्होंने एक भीषण युद्ध में भंडासुर की मर्यादाहीन शक्ति को पराजित कर उसका वध किया। यह केवल एक असुर का अंत नहीं था, बल्कि सृष्टि में चेतना, प्रेम और व्यवस्था की पुनः स्थापना थी। इसी कारण माँ ललिता को ‘राजराजेश्वरी’ के रूप में पूजा जाता है, जो समस्त शक्तियों का नियमन करने वाली परम सत्ता हैं।
श्री चक्र और माँ ललिता का गहरा संबंध (The Relationship Between Shri Chakra and Maa Lalita)
श्री यंत्र: ब्रह्मांड का प्रतीकात्मक स्वरूप (What Is Shri Yantra (Shri Chakra) and Its Significance)
श्री यंत्र, जिसे श्री चक्र भी कहा जाता है, हिंदू शाक्त परंपरा का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र है। यह केवल रेखाओं या त्रिकोणों का समूह नहीं, बल्कि संपूर्ण ब्रह्मांड का एक सूक्ष्म स्वरूप है। जिस प्रकार सृष्टि एक निश्चित नियम और संतुलन पर टिकी है, उसी प्रकार श्री यंत्र की प्रत्येक ज्यामिति एक निश्चित दैवीय व्यवस्था को दर्शाती है।
श्री यंत्र में ऊपर और नीचे की ओर बने त्रिकोण ‘शिव’ और ‘शक्ति’ के मिलन और संतुलन का संकेत हैं। इसके केंद्र में स्थित ‘बिंदु’ वह मूल स्थान है, जहाँ से सृजन की प्रक्रिया प्रारंभ होती है और अंततः वहीं विलीन हो जाती है। इसीलिए श्री यंत्र को ध्यान और आत्म-साक्षात्कार का सबसे शक्तिशाली माध्यम माना गया है।
माँ ललिता का साक्षात स्वरूप: श्री चक्र (Why Shri Chakra Is Considered the Manifest Form of Maa Lalita)
माँ ललिता को श्री चक्र की अधिष्ठात्री देवी माना गया है। इसका भाव यह है कि माँ ललिता की चेतना को श्री चक्र के माध्यम से अनुभव किया जा सकता है। शास्त्र कहते हैं कि भंडासुर जैसे असंतुलित बल के अंत के बाद, सृष्टि में पुनः संतुलन स्थापित करने के लिए माता ने स्वयं श्री चक्र की रचना की।
श्री चक्र में नौ आवरण (स्तर) होते हैं। साधना के दौरान साधक बाहरी आवरणों से होते हुए केंद्र के उस बिंदु तक पहुँचता है, जहाँ ‘मैं’ और ‘ब्रह्मांड’ का अंतर समाप्त हो जाता है। यही कारण है कि श्री चक्र को माँ ललिता का साक्षात, अनुभूति योग्य शरीर माना जाता है।
ललिता सहस्रनाम और श्री चक्र पूजा (Lalita Sahasranama and Shri Chakra Worship)
शाक्त परंपरा में ललिता सहस्रनाम का पाठ और श्री चक्र की पूजा एक-दूसरे के पूरक हैं। जहाँ सहस्रनाम माता के एक हजार दिव्य गुणों का स्मरण कराते हैं, वहीं श्री चक्र उन गुणों की ऊर्जा को केंद्रित करता है।
यह पूजा केवल शब्दों का उच्चारण नहीं, बल्कि माँ की चेतना से जुड़ने का एक आंतरिक अनुशासन है। इसका उद्देश्य किसी बाहरी भौतिक लाभ से अधिक, मन की स्थिरता और दृष्टि की स्पष्टता प्राप्त करना है। इसी कारण इस साधना को अत्यंत गोपनीय, संयमित और श्रद्धापूर्ण माना गया है।
ललिता जयंती और माघ पूर्णिमा: तिथि का महत्व (Lalita Jayanti and Magh Purnima (According to Panchang))
हिंदू पंचांग के अनुसार, ललिता जयंती का निर्धारण किसी निश्चित कैलेंडर तारीख से नहीं, बल्कि माघ मास की पूर्णिमा तिथि से होता है। चूंकि सनातन परंपरा में तिथियाँ चंद्रमा की गति पर आधारित होती हैं, इसलिए हर वर्ष ग्रेगोरियन कैलेंडर (अंग्रेजी कैलेंडर) के अनुसार इसकी तारीख बदलती रहती है।
तिथि और चेतना का संबंध
शाक्त परंपरा में माघ पूर्णिमा को शक्ति उपासना के लिए अत्यंत पवित्र माना गया है। ललिता जयंती केवल एक ऐतिहासिक घटना की स्मृति नहीं है, बल्कि यह उस दैवीय तिथि का सम्मान है जो चेतना, संतुलन और आध्यात्मिक साधना का प्रतीक है। इसी पावन तिथि पर माँ ललिता त्रिपुरा सुंदरी के प्राकट्य का स्मरण किया जाता है।
पंचांग गणना और पूजा का समय
माघ पूर्णिमा का दिन पहले से ही पवित्र स्नान, दान और उपासना के लिए प्रसिद्ध है। शाक्त मार्ग के अनुयायी इसी दिन माँ ललिता की विशेष पूजा करते हैं।
स्थानीय पंचांग: पूजा का सटीक समय स्थानीय सूर्योदय और तिथि की व्याप्ति (Duration) पर निर्भर करता है, इसलिए अलग-अलग क्षेत्रों में पूजा के समय में आंशिक अंतर हो सकता है।
तारीख बनाम तिथि: भक्तों के लिए यह समझना आवश्यक है कि ललिता जयंती पूरी तरह से पूर्णिमा तिथि पर आधारित है। इसे किसी एक निश्चित तारीख से जोड़कर देखना पंचांग की दृष्टि से सही नहीं है।
माँ ललिता की पूजा विधि (Method of Worship of Maa Lalita)
ललिता जयंती पर पूजा का सही समय
माँ ललिता की पूजा माघ मास की पूर्णिमा तिथि में की जाती है। पूजा का समय तय करते waqt यह ध्यान रखा जाता है कि पूर्णिमा तिथि सूर्योदय के समय उपस्थित हो। अधिकतर स्थानों पर पूजा प्रातः काल में की जाती है, क्योंकि यही समय उपासना के लिए शांत और उपयुक्त माना गया है।
यदि किसी कारणवश प्रातः पूजा संभव न हो, तो पूर्णिमा तिथि के भीतर दिन में भी पूजा की जा सकती है। पूजा का सटीक समय स्थानीय पंचांग देखकर ही निश्चित करना उचित माना गया है, क्योंकि तिथि का प्रारंभ और समापन स्थान के अनुसार बदल सकता है।
पूजा के लिए आवश्यक सामग्री
माँ ललिता की पूजा में बहुत अधिक या दुर्लभ सामग्री की आवश्यकता नहीं होती। पूजा सादगी और श्रद्धा से की जाती है। सामान्य रूप से निम्न सामग्री पर्याप्त मानी जाती है:
- स्वच्छ आसन
- माँ ललिता का चित्र या श्री यंत्र
- जल से भरा पात्र
- दीपक और शुद्ध घी या तेल
- धूप
- अक्षत (साबुत चावल)
- पुष्प (विशेष रूप से गुलाब या कमल, यदि उपलब्ध हों)
- नैवेद्य के लिए शुद्ध और सात्त्विक प्रसाद
पूजा में सामग्री से अधिक शुद्धता और भाव को महत्व दिया जाता है।
माँ ललिता का ध्यान और संकल्प (Meditation and Sankalpa for Maa Lalita)
पूजा प्रारंभ करने से पहले शांत मन से बैठकर माँ ललिता का ध्यान किया जाता है। ध्यान का उद्देश्य किसी विशेष दृश्य की कल्पना नहीं, बल्कि मन को स्थिर करना होता है। इसके बाद साधक अपने मन में संकल्प करता है कि वह यह पूजा श्रद्धा और संयम के साथ कर रहा है।
संकल्प में यह भाव रखा जाता है कि पूजा मानसिक शुद्धि, संतुलन और आत्मिक शांति के लिए की जा रही है। संकल्प शब्दों में बहुत बड़ा या जटिल होना आवश्यक नहीं है, मन का भाव ही संकल्प माना जाता है।
मंत्र जाप और ललिता सहस्रनाम पाठ (Mantra Chanting and Lalita Sahasranama Recitation)
माँ ललिता की उपासना में मंत्र जाप का विशेष महत्व बताया गया है। साधारण गृहस्थ के लिए
“ॐ श्री मात्रे नमः”
का जाप पर्याप्त और सुरक्षित माना जाता है।
जो साधक सक्षम हों, वे ललिता सहस्रनाम का पाठ भी कर सकते हैं। ललिता सहस्रनाम (Lalita Sahastranama) का पाठ करते समय उच्चारण की शुद्धता और मन की एकाग्रता पर ध्यान दिया जाता है। यदि पूरा पाठ संभव न हो, तो श्रद्धा के साथ कुछ नामों का पाठ भी किया जा सकता है।
यह माना जाता है कि इस पाठ का उद्देश्य किसी तात्कालिक फल की कामना नहीं, बल्कि चित्त की स्थिरता और चेतना की स्पष्टता है।
नैवेद्य और पुष्प का चयन
Maa Lalita को नैवेद्य के रूप में शुद्ध, सात्त्विक और घर में बना भोजन अर्पित किया जाता है। सामान्यतः फल, मिश्री, खीर या साधारण मिष्ठान अर्पित किए जाते हैं। तामसिक या अत्यधिक मसालेदार वस्तुएँ नैवेद्य में नहीं रखी जातीं।
पुष्प अर्पण में गुलाब, कमल या सुगंधित पुष्प श्रेष्ठ माने जाते हैं, पर यदि ये उपलब्ध न हों तो स्वच्छ भाव से अर्पित कोई भी पुष्प स्वीकार्य माना जाता है। पूजा के अंत में माँ से क्षमा और कृतज्ञता का भाव रखा जाता है।
माँ ललिता की पूजा के फल और प्रभाव (What Benefits Are Attained Through the Worship of Maa Lalita)
गृहस्थ जीवन में शांति और संतुलन
Maa Lalita की उपासना संसार से विरक्ति का मार्ग नहीं, बल्कि संसार में रहकर संतुलित जीवन जीने की कला है। यह साधना साधक को अपने पारिवारिक और सामाजिक दायित्वों को स्पष्टता, संयम और प्रेम के साथ निभाने की शक्ति प्रदान करती है। इससे निर्णयों में उतावलापन कम होता है और आपसी संबंधों में सहजता आती है।
मानसिक शुद्धि और भय से मुक्ति
शास्त्रों के अनुसार, Lalita उपासना का मुख्य फल आंतरिक अशांति का शमन है। जब मन भय, भ्रम या अस्थिरता से घिरा हो, तब ललिता सहस्रनाम का पाठ मन को केंद्रित करने में सहायक होता है। यह प्रभाव किसी तात्कालिक चमत्कार के रूप में नहीं, बल्कि धीरे-धीरे आत्मविश्वास और मानसिक स्पष्टता के रूप में अनुभव होता है।
शक्ति उपासना का सरल मार्ग
Maa Lalita की पूजा उन लोगों के लिए भी श्रेष्ठ है जो साधना के मार्ग पर नए हैं। इसमें किसी जटिल तांत्रिक विधि या भय का स्थान नहीं है; केवल श्रद्धा, शुद्धता और नियमितता ही इसका आधार है।
ललिता जयंती पर क्या न करें? (What Should Not Be Done on Lalita Jayanti)
दिखावा और आडंबर: पूजा को प्रदर्शन या तुलना का विषय न बनाएँ। माता भाव की भूखी हैं, सामग्री की नहीं।
क्रोध और कटु वाणी: साधना के दिन क्रोध, वाद-विवाद और नकारात्मक विचारों से दूरी बनाए रखना आवश्यक है।
अपराधबोध: यदि किसी कारणवश पूजा या व्रत में कोई कमी रह जाए, तो मन में अनावश्यक अपराधबोध न पालें। श्रद्धा का भाव ही पूर्णता है।
अशुद्धि: केवल शारीरिक ही नहीं, बल्कि मानसिक अशुद्धि और ईर्ष्या जैसे भावों से भी बचने का प्रयास करें।
ललिता जयंती से जुड़ी लोक-मान्यताएँ (Folk Beliefs and Living Traditions Associated with Lalita Jayanti)
दक्षिण भारत में Maa Lalita की उपासना किसी एक पर्व या तिथि तक सीमित नहीं रही है, बल्कि यह एक जीवित साधना-परंपरा के रूप में विकसित हुई है। यहाँ शाक्त मार्ग को केवल देवी-पूजा नहीं, बल्कि जीवन को समझने और संतुलित करने का माध्यम माना गया है। Maa Lalita को त्रिपुरा सुंदरी और राजराजेश्वरी के रूप में स्मरण किया जाता है, जिनके माध्यम से शक्ति के सौम्य, अनुशासित और पूर्ण स्वरूप को अनुभव करने की परंपरा बनी।
इस क्षेत्र में यह मान्यता गहराई से स्थापित है कि शक्ति का स्वरूप उग्रता में नहीं, बल्कि संतुलन और चेतना में प्रकट होता है। इसी कारण ललिता उपासना में दिखावा, शोर या त्वरित फल की अपेक्षा नहीं की जाती। साधना का केंद्र मन की स्थिरता, दृष्टि की स्पष्टता और आंतरिक अनुशासन होता है।
दक्षिण भारत की शाक्त परंपरा में श्री चक्र उपासना का विशेष स्थान है। श्री चक्र को केवल पूजन-वस्तु नहीं, बल्कि साधक की चेतना को क्रमशः भीतर की ओर ले जाने वाला माध्यम माना गया है। इस परंपरा में पूजा से अधिक नियमित ध्यान, संयम और मौन साधना को महत्व दिया गया है। यही कारण है कि यहाँ की उपासना शांत, गंभीर और अनुशासित स्वरूप में विकसित हुई।
Maa Lalita Jayanti के दिन भी दक्षिण भारत में अत्यधिक उत्सव या बाहरी आयोजन के बजाय सहस्रनाम पाठ, ध्यान और सीमित पूजा की परंपरा देखी जाती है। इसे किसी विशेष चमत्कार की कामना से नहीं, बल्कि शक्ति परंपरा के स्मरण और आत्मचिंतन के दिन के रूप में देखा जाता है। माना जाता है कि इस प्रकार की साधना व्यक्ति को बाहरी उपलब्धियों से अधिक आंतरिक स्थिरता और विवेक प्रदान करती है।
इसी कारण दक्षिण भारत में माँ Lalita की उपासना को केवल धार्मिक कर्म नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही साधना-संस्कृति के रूप में सम्मान दिया गया है, जहाँ शक्ति को भय का नहीं, बल्कि संतुलन और समझ का प्रतीक माना गया है।
दोस्तों, हमने इस आर्टिकल में माँ ललिता जयंती (Maa Lalita Jayanti) के बारे में अधिक से अधिक जानकरी देने की कोशिश की हैं। लेकिन फिर भी अगर आपको जानकरी में कमी लगी हो या आप किसी और विषय पर कोई जानकारी प्राप्त करना चाहते हैं तो कृपया कमेंट करे। Dharmkahani.com को अपने दोस्तों और परिवार के साथ शेयर जरूर करे।




