Lalita Jayanti 2026 : माँ ललिता त्रिपुरसुन्दरी की कथा

Maa Lalita jayanti 2026: हिंदू धर्म की समृद्ध परंपरा में माँ ललिता जयंती का एक विशेष स्थान है। हर साल की तरह इस बार भी माघ मास की पूर्णिमा को माता ललिता त्रिपुरा सुंदरी के प्राकट्य उत्सव के रूप में मनाया जाएगा। इस वर्ष यह पावन तिथि 1 फरवरी को पड़ रही है।

माँ ललिता केवल एक देवी नहीं, बल्कि सौंदर्य, ज्ञान और सृजन का संगम हैं। शाक्त परंपरा (शक्ति की पूजा) को मानने वालों के लिए उनकी उपासना सर्वोच्च मानी गई है। भक्त मानते हैं कि इस दिन ललिता सहस्रनाम का पाठ करने या श्री चक्र के सामने ध्यान लगाने से न केवल मानसिक शांति मिलती है, बल्कि जीवन के कठिन रास्तों पर भी स्पष्टता आने लगती है।

Lalita Jayanti : माँ ललिता जयंती पर पढ़े पूर्ण कथा

कहानी उस समय की है जब पूरा ब्रह्मांड तारकासुर के अत्याचारों से त्रस्त था। नियति के अनुसार, तारकासुर का अंत केवल महादेव और देवी पार्वती के पुत्र के हाथों ही संभव था। परंतु महादेव उस समय अपनी घोर समाधि में लीन थे। देवताओं के कार्य को सिद्ध करने के लिए कामदेव ने महादेव की समाधि भंग करने का दुस्साहस किया।

महादेव ने जैसे ही अपना तीसरा नेत्र खोला, उनके क्रोध की अग्नि ने कामदेव को क्षण भर में जलाकर राख कर दिया। कामदेव के भस्म होते ही पूरे संसार से प्रेम और सृजन की शक्ति लुप्त हो गई।

शिवगण ‘चित्रकर्म’ का कौतुक
महादेव के गणों में एक अत्यंत कुशल शिल्पी और कलाकार थे, जिनका नाम था चित्रकर्म। जब महादेव शांत होकर पुनः ध्यान में चले गए, तब चित्रकर्म उस स्थान पर पहुँचे जहाँ कामदेव की राख का ढेर पड़ा था। वह राख कोई साधारण भस्म नहीं थी, उसमें महादेव के क्रोध का तेज और कामदेव की दबी हुई इच्छाएं समाहित थीं।

चित्रकर्म के मन में एक कौतुक (जिज्ञासा) जागा। उन्होंने उस राख को इकट्ठा किया और अपनी कला का प्रदर्शन करते हुए उससे एक विशालकाय पुरुष की आकृति (पुतला) बना दी। वह पुतला देखने में इतना जीवंत और प्रभावशाली था कि चित्रकर्म स्वयं उसे देखकर चकित रह गए।

प्राण प्रतिष्ठा और महादेव की दृष्टि
उसी क्षण भगवान शिव की दृष्टि उस राख से बनी आकृति पर पड़ी। महादेव की दृष्टि में सृजन और संहार दोनों की शक्ति होती है। जैसे ही उनकी दिव्य दृष्टि उस पुतले पर पड़ी, वह निर्जीव आकृति जीवित हो उठी। कामदेव की राख से जन्मा वह पुरुष साक्षात रुद्र के तेज और कामदेव की अतृप्त वासना का मिश्रण था।

उसके जीवित होते ही दसों दिशाएं कांपने लगीं। उसके शरीर से निकलने वाला काला धुआं सूर्य के प्रकाश को ढंकने लगा।

ब्रह्मा जी का ‘भंड’ और नामकरण
उस भयानक जीव को देखकर सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी वहां प्रकट हुए। उस पुरुष की क्रूरता और उसके भीतर उमड़ रहे अंधकार को देखकर ब्रह्मा जी के मुख से अचानक निकला “भंड! भंड!”

संस्कृत में ‘भंड’ का एक अर्थ होता है ‘कौतुक’ या ‘विद्रूप’ (विकृत), लेकिन यहाँ ब्रह्मा जी का तात्पर्य उस जीव की ‘अमंगलकारी’ प्रकृति से था। ब्रह्मा जी द्वारा दो बार ‘भंड’ पुकारे जाने के कारण उसका नाम ‘भंडासुर’ पड़ गया।

अजेय होने का वरदान
भंडासुर ने जन्म लेते ही समझ लिया कि शक्ति ही सर्वोपरि है। उसने महादेव की घोर तपस्या की। जब शिव प्रकट हुए, तो भंडासुर ने बड़ी चतुराई से वरदान माँगा:

“हे प्रभु! मुझे वरदान दें कि मेरा वध कोई भी ऐसा योद्धा न कर सके जिसका जन्म किसी माता के गर्भ (योनि) से हुआ हो। साथ ही, युद्ध में मेरे शत्रु की आधी शक्ति मेरे भीतर समा जाए।”

महादेव ने ‘तथास्तु’ कह दिया। इस वरदान ने भंडासुर को व्यावहारिक रूप से अमर बना दिया, क्योंकि सृष्टि का हर जीव चाहे मनुष्य हो, देवता हो या पशु किसी न किसी गर्भ से ही जन्म लेता है।

वरदान पाकर भंडासुर के भीतर का अंधकार और अहंकार सातवें आसमान पर पहुँच गया। उसे अब किसी का भय नहीं था। उसने सबसे पहले अपनी राजधानी ‘शून्यक’ नगर का निर्माण किया। एक ऐसा नगर जहाँ न यज्ञ थे, न प्रार्थना, केवल शक्ति और आदेश था। शून्यक की स्थापना के बाद भंडासुर ने अपनी विशाल सेना एकत्र की और सीधे स्वर्ग की ओर कूच कर दिया।

जब भंडासुर ने स्वर्ग के द्वारों पर दस्तक दी, तो देवराज इंद्र ने अपनी पूरी शक्ति के साथ उसका सामना किया। स्वर्ग की सीमाओं पर भयानक युद्ध छिड़ गया। इंद्र ने अपने अमोघ अस्त्र वज्र से प्रहार किया, वरुण ने अपने पाश से उसे बाँधने का प्रयास किया और अग्नि ने अपनी ज्वालाओं से उसे भस्म करने का प्रयत्न किया।

परन्तु जैसे-जैसे देवता प्रहार करते गए, भंडासुर और अधिक शक्तिशाली होता चला गया। उसका वरदान सक्रिय हो चुका था। अंततः वह क्षण भी आया जब इंद्र का वज्र भंडासुर के शरीर से टकराकर स्वयं टूट गया। देवताओं को तब पहली बार यह बोध हुआ कि भंडासुर का ‘यौनि-ज’ मर्यादा वाला वरदान उन्हें पूरी तरह निष्प्रभावी कर चुका है।

भंडासुर ने इंद्र को उनके ऐरावत हाथी से नीचे गिरा दिया और स्वर्ग पर अपना काला ध्वज फहरा दिया। स्वर्ग अपमानित हुआ। लहूलुहान और पराजित देवता किसी प्रकार अपनी जान बचाकर वहाँ से भाग निकले।

पराजित और भयभीत देवता सबसे पहले ब्रह्मा जी के पास पहुँचे और फिर उन्हें साथ लेकर क्षीर सागर में भगवान विष्णु की शरण में गए। उनकी स्थिति अत्यंत दयनीय थी – मुकुट धूल में मिले थे, अस्त्र टूट चुके थे और चेहरों पर मृत्यु का भय स्पष्ट दिखाई दे रहा था।

इंद्र ने काँपती हुई वाणी में कहा –
“हे सृष्टि के पालनहार! हे पितामह! भंडासुर ने स्वर्ग को श्मशान बना दिया है। वह साधारण असुर नहीं है। वह महादेव के क्रोध और कामदेव की राख का वह विषैला अंश है जिसे कोई पराजित नहीं कर पा रहा। हमारे अस्त्र उसके शरीर पर ऐसे गिरते हैं जैसे फूल पत्थर पर गिरें।”

देवताओं ने हाथ जोड़कर भगवान विष्णु और ब्रह्मा जी के सामने अपनी गुहार रखी। उनके शब्दों में गहरी हताशा थी।
“प्रभु! भंडासुर ने धर्म की मर्यादा तोड़ दी है। यज्ञों का भाग अब असुरों को दिया जा रहा है। आप दोनों ही इस ब्रह्मांड के रक्षक हैं। हम आपसे निवेदन करते हैं कि आप स्वयं शस्त्र उठाएँ और उस दुष्ट भंडासुर का अंत करें। आपकी शक्ति अनंत है, आपके लिए कुछ भी असंभव नहीं।”

देवताओं को लगा था कि भगवान विष्णु अपना सुदर्शन चक्र उठाएँगे या ब्रह्मा जी कोई ब्रह्मास्त्र छोड़ेंगे, परंतु उत्तर कुछ और ही था।

भगवान विष्णु ने शांत स्वर में कहा –
“हे देवराज इंद्र! आप भावुक होकर वध की प्रार्थना कर रहे हैं, पर क्या आपने भंडासुर के जन्म का रहस्य भुला दिया? वह महादेव के क्रोध और कामदेव की राख से जन्मा है। हम स्वयं भी सृष्टि की प्राकृतिक प्रक्रिया से बँधे हुए हैं। भंडासुर का वध करने के लिए ऐसी शक्ति चाहिए जो प्रकृति और पुरुष दोनों से परे हो — एक ऐसी शक्ति जो अजन्मी हो।”

ब्रह्मा जी ने विष्णु जी की बात को आगे बढ़ाते हुए कहा —
“भंडासुर कोई साधारण मांस-मज्जा का असुर नहीं है। वह एक अशुभ विचार की भाँति है। उसे मारने के लिए हमें उस आदि-शक्ति का आह्वान करना होगा जो स्वयं इस ब्रह्मांड की आधारशिला है।”

देवताओं ने व्याकुल होकर पूछा –
“परंतु प्रभु, उस महाशक्ति को हम कैसे पुकारें? हम तो उनके स्वरूप को भी नहीं जानते।”

उसी क्षण वहाँ देवर्षि नारद का आगमन हुआ। देवताओं की व्याकुलता देखकर नारद जी मंद मुस्कुराए। उन्होंने अपनी वीणा की तान छेड़ी और बोले-
“देवताओं! भंडासुर कोई साधारण शत्रु नहीं है। वह महादेव के क्रोध की राख से जन्मा है। उसे साधारण युद्ध से नहीं जीता जा सकता। उसका अंत केवल ललिता परमेश्वरी के हाथों संभव है, जो स्वयं चिदग्नि से प्रकट होंगी। इसके लिए तुम्हें महारुद्र महायाग करना होगा।”

नारद जी ने आगे समझाया कि यह कोई सामान्य यज्ञ नहीं है। इसे ‘चिदग्नि कुंड संभूत’ अनुष्ठान कहा जाता है –
ऐसी अग्नि, जो लकड़ियों से नहीं, बल्कि चित् (चेतना) से प्रज्वलित होती है।

यह यज्ञ हिमालय के शिखर पर होगा, जहाँ की वायु शुद्ध और स्पंदन दिव्य है। इस यज्ञ में चंदन या घी की आहुति नहीं दी जाएगी। नारद जी ने कहा –
“हे देवताओं! तुम्हें अपने अहंकार, अपनी इच्छाओं और अपनी शक्तियों की आहुति देनी होगी। जब तक तुम स्वयं को पूर्णतः शून्य नहीं करोगे, तब तक वह पूर्ण प्रकट नहीं होंगी।”

नारद जी ने देवताओं को श्री विद्या के परम गोपनीय मंत्रों की दीक्षा दी। उन्होंने बताया कि यज्ञ के दौरान उन्हें निरंतर श्री यंत्र का मानसिक और भौतिक निर्माण करना होगा और अपनी इंद्रियों को पूर्णतः वश में कर ‘ह्रीं’ मंत्र की शक्ति को जाग्रत करना होगा।

अंत में नारद जी ने चेतावनी दी –
“देवराज इंद्र! भंडासुर इस यज्ञ को रोकने के लिए अपनी पूरी मायावी शक्ति लगा देगा। यदि तुम बीच में रुके, तो ब्रह्मांड सदा के लिए असुरों के हाथ में चला जाएगा। क्या तुम अपने प्राणों की आहुति देने को तैयार हो?”

इंद्र और सभी देवताओं ने दृढ़ संकल्प के साथ अपनी आँखें मूँद लीं और महारुद्र महायाग का संकल्प लिया।

Maa Lalita jayanti 2026: जानिए माघ पूर्णिमा का महत्व और शक्ति उपासना का रहस्य

नारद जी द्वारा बताए गए मार्ग पर चलते हुए इंद्र सहित समस्त देवताओं ने हिमालय के शिखर पर ‘चिदग्नि कुंड’ प्रज्वलित किया। यह कोई साधारण अनुष्ठान नहीं था। यह वह अग्नि थी जो लकड़ियों से नहीं, बल्कि चेतना और त्याग से जीवित रहती थी। देवताओं ने वर्षों तक अन्न-जल का त्याग कर उस अग्नि की सेवा की। समय बीतता गया, युग बदलते गए, पर यज्ञ की लौ बुझी नहीं।

ऋषियों के मुख से ‘श्री विद्या’ के गुप्त मंत्रों का घोष निरंतर गूँजता रहा। देवताओं ने अपनी सारी सिद्धियाँ, अपना वैभव और अपना सुख एक-एक करके उस अग्नि में समर्पित कर दिया। स्वर्ग की चमक मिट चुकी थी, देह थक चुकी थी, पर संकल्प अभी जीवित था। फिर भी—माँ अब तक प्रकट नहीं हुई थीं।

उधर भंडासुर अपनी मायावी दृष्टि से सब देख रहा था। जब उसे ज्ञात हुआ कि देवता उसकी मृत्यु का प्रबंध कर रहे हैं, तो उसके भीतर का क्रोध उन्मत्त हो उठा। उसने तुरंत अपने सेनापतियों और भाइयों—विशंग और विषुक्र—को आदेश दिया कि उस यज्ञ को श्मशान में बदल दिया जाए।

असुरों ने आकाश को काले बादलों से ढँक दिया। यज्ञ-कुंड पर रक्त, मांस और सड़ी हुई हड्डियों की वर्षा होने लगी। उनका उद्देश्य स्पष्ट था—देवताओं के मन में घृणा भर देना और यज्ञ को अपवित्र करना। इसके बाद उन्होंने ऐसी भयानक गर्जनाएँ कीं कि हिमालय की कंदराएँ काँप उठीं। यज्ञ-स्थल पर जहरीले साँपों और बिच्छुओं की बारिश कर दी गई, ताकि देवताओं का ध्यान भंग हो जाए।

जब इतना सब करने के बाद भी देवता टस से मस नहीं हुए, तो असुरों ने सीधे प्रहार शुरू कर दिए। गदाएँ चलीं, तीक्ष्ण बाण बरसे। कई देवताओं के शरीर लहूलुहान हो गए। दिव्य रक्त हिमालय की भूमि पर गिरने लगा, पर कोई भी देवता अपनी जगह से नहीं हिला। मंत्र जप चलता रहा, अग्नि जलती रही।

सैकड़ों वर्ष बीत गए। अब देवताओं की शक्ति जवाब देने लगी थी। वे अधमरे हो चुके थे। उनके दिव्य वस्त्र फट चुके थे, शरीर घावों से भरे थे और नेत्रों में थकान उतर आई थी। जब उन्होंने देखा कि इतने कष्ट सहने के बाद भी माता प्रकट नहीं हुईं, तो उनके हृदय में गहरी निराशा बैठ गई। उन्हें लगा कि शायद उनकी तपस्या में ही कोई कमी रह गई है।

उसी क्षण देवराज इंद्र ने अत्यंत दुखी होकर अन्य देवताओं की ओर देखा और कहा—
“हे देवगण! हमने संसार के सारे सुख त्याग दिए, वर्षों तक इस अग्नि की सेवा की, फिर भी जगदम्बा प्रकट नहीं हुईं। इसका अर्थ है कि उन्हें केवल हमारी श्रद्धा नहीं, बल्कि हमारा पूर्ण अस्तित्व चाहिए। अब समय आ गया है कि हम अपनी आत्मा की आहुति दें।”

यह कहते हुए इंद्र ने एक तेज शस्त्र उठाया और अपने ही शरीर का मांस काटकर चिदग्नि कुंड में अर्पित करने का संकल्प लिया। इंद्र को देखकर अग्नि, वरुण, वायु और यमराज ने भी अपने-अपने अंगों की हविष बनाने की तैयारी कर ली।

एक-एक करके वे अग्नि की ओर बढ़ने लगे—इस दृढ़ निश्चय के साथ कि यदि माता प्रकट नहीं होतीं, तो वे स्वयं को इस कुंड में जलाकर भस्म कर देंगे।

देवताओं की आँखों में आँसू थे, पर मुख पर केवल एक ही पुकार थी—
“हे आदि-शक्ति! हे ललिता! अब हमारे पास देने के लिए केवल हमारे प्राण बचे हैं। इन्हें स्वीकार करो और अधर्म का अंत करो!”

यह देवताओं के त्याग की पराकाष्ठा थी। पूरा ब्रह्मांड ठहर गया, क्योंकि अब वह क्षण आ चुका था—जब सृष्टि की सबसे बड़ी शक्ति को प्रकट होना ही था।

जैसे ही देवताओं ने अपने अंगों और प्राणों की अंतिम आहुति देने के लिए शस्त्र उठाए, वैसे ही ब्रह्मांड की दिशाएँ बदल गईं। आकाश स्थिर हो गया, वायु थम गई और समय मानो एक क्षण के लिए रुक गया। वह घड़ी आ चुकी थी जिसकी प्रतीक्षा ऋषि-मुनि और देवता युगों से कर रहे थे।

यहीं से आरंभ होता है माँ ललिता महात्रिपुरा सुंदरी का वह प्राकट्य, जो न केवल दिव्य था, बल्कि सृष्टि में अब तक घटित हर घटना से परे और अतुलनीय था।

जैसे ही इंद्र ने अपनी आहुति देने के लिए हाथ बढ़ाया, उसी क्षण चिदग्नि कुंड से एक दिव्य ध्वनि गूँज उठी—मानो करोड़ों शंख और वीणाएँ एक साथ बज उठी हों। यज्ञ की अग्नि अचानक इतनी विशाल हो गई कि उसकी लपटें आकाश को छूने लगीं। सम्पूर्ण हिमालय उस ध्वनि से स्पंदित हो उठा।

उसी अग्नि के बीच से एक प्रचंड प्रकाश-पुंज निकला। वह तेज इतना तीव्र था कि करोड़ों सूर्य भी उसके सामने फीके प्रतीत होने लगे। पर आश्चर्य यह था कि उस प्रकाश में कहीं भी जलन नहीं थी। उसमें चंद्रमा जैसी अद्भुत शीतलता और गहन शांति समाई हुई थी।

उस दिव्य प्रकाश के भीतर सबसे पहले श्रीचक्र का आविर्भाव हुआ—यंत्रराज, जो स्वयं शक्ति का रेखाचित्र है। और उसी श्रीचक्र के मध्य बिंदु, अर्थात् बिंदु-स्थान, से साक्षात माँ ललिता महात्रिपुरा सुंदरी का प्राकट्य हुआ।

माँ का स्वरूप ऐसा था कि उसे देखते ही ब्रह्मा, विष्णु और महेश भी क्षण भर के लिए सुध-बुध खो बैठे। वे करुणा और शक्ति का सजीव संगम थीं।

माता का वर्ण उदित होते हुए सूर्य के समान अरुण था। उनका सम्पूर्ण शरीर सिंदूरी आभा से दीप्त हो रहा था। उनके तीन नेत्र सूर्य, चंद्रमा और अग्नि के प्रतीक थे। उनका मुख-मंडल पूर्ण चंद्रमा की भाँति गोल और कांतिवान था, और उनकी मंद मुस्कान भक्तों के समस्त दुख हर लेने वाली थी।

उनके काले और घने केश पारिजात के फूलों की सुगंध से महक रहे थे। उन्होंने रत्नजड़ित मुकुट धारण किया था, जिसके मध्य अर्ध-चंद्र सुशोभित था। माँ का चतुर्भुज रूप अत्यंत दिव्य था। उनके चारों हाथों में दिव्य आयुध शोभित थे—पाश, जो राग अर्थात प्रेम का प्रतीक था; अंकुश, जो क्रोध और नियंत्रण का संकेत था; इक्षु-कोदंड, जो मन का प्रतीक था; और पंच-पुष्प बाण, जो पाँचों इंद्रियों के प्रतीक थे।

माँ के कानों में चक्राकार ताटंक सूर्य और चंद्रमा की भाँति चमक रहे थे। उनके गले में चिंतामणि का हार था, जो हर मनोकामना को पूर्ण करने वाला है।

माँ जिस सिंहासन पर विराजी थीं, वह कोई साधारण आसन नहीं था। वह पंच-ब्रह्मासन था—जो यह दर्शाता है कि समस्त त्रिदेव और ईश्वर स्वयं उनके अधीन हैं। उस दिव्य सिंहासन के चार स्तंभ साक्षात ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र और ईश्वर थे, जो माँ के सिंहासन को थामे हुए थे। जिस फलक पर माता विराजमान थीं, वह स्वयं सदाशिव थे—शांत, स्थिर और निष्कंप। और उन सदाशिव के ऊपर, श्रीचक्र के मध्य बिंदु पर, माँ ललिता विराजमान थीं।

देवताओं ने जब अपनी आँखों से इस परम दिव्य रूप के दर्शन किए, तो उनके सारे घाव उसी क्षण भर गए। भय नष्ट हो गया, हृदय हल्का हो उठा और पूरा हिमालय एक ही जयघोष से गूँज उठा—

“ललिताम्बिके पाही माम्!”

जब माँ ललिता साक्षात प्रकट हुईं, तब देवताओं की आँखों से अविरल आँसू बहने लगे। वे आनंद और भक्ति से भर उठे थे, पर उनके हृदय में अब भी भंडासुर का भय और उसके वरदान का संकट जीवित था। माता के दर्शन ने उन्हें आश्वस्त किया था, किंतु पीड़ा अभी समाप्त नहीं हुई थी।

माँ के प्रकट होते ही सभी देवताओं ने दंडवत प्रणाम किया। गंधर्वों ने दिव्य संगीत छेड़ दिया और स्वर्गीय दिशाओं में स्तुति-गान गूँज उठा। देवताओं ने एक स्वर में श्री स्तुति का उच्चारण किया—

“नमस्तेऽस्तु महामाये श्रीपीठे सुरपूजिते।
शंखचक्रगदाहस्ते महालक्ष्मी नमोऽस्तुते॥”

स्तुति के साथ देवताओं की वाणी काँप उठी—
“हे जगदम्बा! हे ललिता! आप ही इस ब्रह्मांड की आदि और अंत हैं। आपके प्रकट होते ही हमारा अंधकार मिट गया है। आप ही वह पराशक्ति हैं जिनके एक अंश से ब्रह्मा, विष्णु और महेश अपनी-अपनी शक्तियाँ धारण करते हैं। हे चिदग्नि-कुंड-संभूता! हमें अपनी शरण में ले लीजिए।”

स्तुति के पश्चात देवराज इंद्र आगे बढ़े। उन्होंने हाथ जोड़कर अत्यंत करुण स्वर में अपनी और समस्त लोकों की पीड़ा माँ के चरणों में रख दी।

इंद्र ने कहा—
“हे माँ! आज हम देवता अपने ही स्वर्ग से निर्वासित हैं। कामदेव की राख से जन्मे उस दुष्ट भंडासुर ने तीनों लोकों को शून्य बना दिया है। उसने हमारी यज्ञ-आहुतियाँ छीन ली हैं, ऋषियों के तपोवन उजाड़ दिए हैं और धर्म का लोप कर दिया है। हमारी पत्नियाँ और हमारे बच्चे असुरों के भय से कंदराओं में छिपे हुए हैं।”

इसके बाद देवताओं ने माँ को उस संकट के मूल कारण से अवगत कराया, जिसने उन्हें पूर्णतः असहाय बना दिया था।

उन्होंने बताया कि भंडासुर को महादेव से यह वरदान प्राप्त है कि उसका वध केवल वही कर सकता है जिसका जन्म किसी माता के गर्भ से न हुआ हो। देवता, मनुष्य और पशु—सब इस मर्यादा में बँधे हैं, इसलिए वे उसे स्पर्श तक नहीं कर पा रहे हैं। इतना ही नहीं, भंडासुर के सामने जो भी शत्रु जाता है, उसकी शक्ति क्षीण होने लगती है। उसकी आसुरी माया देवताओं की बुद्धि को हर लेती है।

देवताओं ने यह भी बताया कि भंडासुर के पास मायावी अस्त्र हैं और उसके भाई विशुक्र और विशंग ने मिलकर विघ्न-यंत्र नामक तांत्रिक यंत्र बनाया है, जो देवताओं की सेना को जड़ कर देता है।

इसके बाद देवताओं ने भंडासुर की सेना और उसके प्रमुख योद्धाओं का विस्तार से वर्णन किया।

उन्होंने बताया कि भंडासुर का छोटा भाई विषुक्र उसका मुख्य सेनापति है। वह अत्यंत बुद्धिमान और मायावी है और उसी ने युद्ध के समय देवताओं की सेना को रोकने के लिए विघ्न-यंत्र का निर्माण किया था। उसका दूसरा भाई विशंग छल-कपट और रात्रि युद्ध में निपुण है। वह अपनी माया से आकाश में छिपकर प्रहार करता है।

भंडासुर के तीस पुत्र हैं, जिनमें कुट्टक सबसे बड़ा और पराक्रमी है। ये तीसों पुत्र एक साथ युद्धभूमि में उतरते हैं और उन्हें हराना लगभग असंभव माना जाता है।

इसके अतिरिक्त भंडासुर के अन्य भयानक सेनापति भी हैं—
कराक्ष, जो अपनी आँखों से विषैली किरणें छोड़ता है;
बलाहक, जो बादलों को बुलाकर पत्थरों और अग्नि की वर्षा करवाता है;
उल्मुक, जो अग्नि तत्व का असुर है और अपनी श्वास से आग उगलता है;
और कुटिलक्ष, जो भंडासुर का चतुर रणनीतिकार है और पूरी सेना के व्यूह रचता है।

देवताओं ने यह भी बताया कि भंडासुर के पास स्त्रियों की एक भयानक सेना भी है, जिसका नेतृत्व दंष्ट्रिनी जैसी असुरियाँ करती हैं।

अंत में उन्होंने भंडासुर की शक्ति के मूल स्रोत का वर्णन किया। उसकी राजधानी शून्यक नगर चारों ओर से ऐसी दीवारों से घिरी है जिन्हें कोई भी शस्त्र भेद नहीं सकता। उसके माया-अस्त्र शत्रुओं को भ्रमित कर देते हैं और उसकी सत्ता को और अधिक अजेय बना देते हैं।

देवताओं ने यह सब विस्तार से इसलिए बताया ताकि माँ ललिता अपनी दिव्य सेना को उसी प्रकार तैयार कर सकें और अधर्म का पूर्ण अंत कर सकें।

देवताओं की करुण पुकार और भंडासुर के पापों का वर्णन सुनने के बाद माँ ललिता के मुख पर विराजमान वह कोमल मुस्कान धीरे-धीरे प्रलयंकारी तेज में परिवर्तित हो गई। उनके नेत्रों में करुणा अब भी थी, पर उसके भीतर न्याय की अग्नि जल उठी थी। उन्होंने अपने गन्ने के धनुष इक्षु-कोदंड को हाथ में लिया और उसकी प्रत्यंचा पर ऐसी भीषण टंकार की कि ब्रह्मांड के सातों लोक दहल उठे।

वह टंकार देवताओं के लिए अभयदान थी और असुरों के लिए काल की चेतावनी। दिशाएँ काँप उठीं, आकाश गूँज गया और उसी क्षण यह स्पष्ट हो गया कि अब अधर्म का अंत निश्चित है। इसके बाद माँ ललिता ने अपनी सेनापतियों और शक्तियों को प्रकट करना आरंभ किया।

सबसे पहले माँ ने अपनी बुद्धि और मंत्र-शक्ति से अपनी प्रधान सेनापति को प्रकट किया।

वह थीं मन्त्रिणी श्यामला, जिन्हें राज मातंगी भी कहा जाता है। वे माँ की प्रधानमंत्री और मुख्य रणनीतिकार थीं। भंडासुर के मायावी बुद्धि-स्वामी भाई विषुक्र को परास्त करने के लिए माँ ने इन्हीं को चुना था। उनका वर्ण पन्ने जैसा हरा, श्याम आभा से युक्त था। उनके चार हाथों में वीणा, धनुष, बाण और पाश सुशोभित थे। उनका रथ गेयचक्र कहलाता था—एक ऐसा दिव्य रथ जो संगीत के सात स्वरों से चलता था और जिसमें स्वयं संगीत के देवताओं का वास था।

इसके पश्चात माँ ने अपने अहं और संकल्प-शक्ति से अपनी प्रधान सेनापति, अर्थात् सम्पूर्ण सेना की अधिष्ठात्री को प्रकट किया।

वे थीं दण्डनाथा वाराही, जिन्हें वार्ताली भी कहा जाता है। माँ की पूरी सेना का नेतृत्व इन्हीं के हाथों में था और भंडासुर के दूसरे भाई विशंग का अंत इन्हीं के द्वारा होना निश्चित था। उनका मुख वराह के समान था, जो यह दर्शाता था कि वे अधर्म को जड़ से उखाड़ फेंकने वाली शक्ति हैं। उनका वर्ण गहरा काला-नीला था और उनके हाथों में हल और मुसल शोभित थे। उनका रथ किरिचक्र कहलाता था, जिसे हज़ारों शक्तिशाली सूअर खींचते थे। उस रथ की गर्जना मात्र से ही शत्रुओं के हृदय विदीर्ण हो जाते थे।

सेना को गति और विस्तार देने के लिए माँ ने दो और महान देवियों को प्रकट किया।

पहली थीं अश्वारूढ़ा देवी—माँ की घुड़सवार सेना की अध्यक्ष। वे अपराजित नामक घोड़े पर सवार थीं और उनके पीछे करोड़ों घोड़ों की सेना प्रकट हुई। उनकी गति मन के वेग से भी तीव्र थी और वे उसी वेग से युद्ध करती थीं।

दूसरी थीं संपतकरी देवी—माँ की गज-सेना की अध्यक्ष। वे रणकोलाहल नामक विशाल हाथी पर आरूढ़ थीं। उनके एक संकेत मात्र से करोड़ों मतवाले हाथियों की सेना गर्जना करती हुई रणभूमि की ओर बढ़ चली।

माँ की सेना में केवल योद्धा ही नहीं थे, बल्कि ब्रह्मांड की समस्त संपदा भी समाहित थी। माँ ने शंख निधि और पद्म निधि को प्रकट किया ताकि सेना को कभी संसाधनों की कमी न हो। साथ ही माँ के शरीर के रोम-रोम से करोड़ों योगिनियाँ और अन्य शक्तियाँ—जैसे नकुली, तिरस्करणी आदि—प्रकट हुईं, जो युद्ध के विविध कौशलों में निपुण थीं।

जब यह विराट सेना पूर्ण रूप से सज्जित होकर खड़ी हो गई, तब माँ ललिता ने गरजते हुए आदेश दिया—

“हे शक्तियों! आज से तुम्हारा लक्ष्य केवल एक है—भंडासुर का समूल विनाश।
मन्त्रिणी, तुम नीति बनाओ।
दण्डनाथा, तुम प्रहार करो।
आज इस चिदग्नि की ज्वाला में असुरों का अहंकार भस्म हो जाना चाहिए।”

हवा में ‘ह्रीं’ मंत्र की गूँज फैल गई। दिशाएँ कंपित हो उठीं और शक्तियों की सेना शून्यक नगर की ओर कूच कर गई। ऐसा प्रतीत होने लगा मानो स्वयं पूरा ब्रह्मांड ही युद्ध के लिए उठ खड़ा हुआ हो।

अब वह रणभूमि प्रकट होती है, जिसकी कल्पना मात्र से रोंगटे खड़े हो जाते हैं। एक ओर भंडासुर की काली आसुरी शक्ति खड़ी थी और दूसरी ओर माँ ललिता की दैवीय आभा। यह युद्ध केवल अस्त्रों और सेनाओं का नहीं था, बल्कि धर्म और अधर्म के सिद्धांतों का आमना-सामना था।

युद्ध का मैदान महेन्द्र पर्वत और भंडासुर की राजधानी शून्यक नगर के बीच फैला एक विशाल क्षेत्र था। एक ओर असुरों की सेना काले बादलों की तरह छाई हुई थी। उनके हाथों में गदाएँ, त्रिशूल और हड्डियों से बने अपवित्र अस्त्र थे। दूसरी ओर माँ ललिता की सेना प्रकाश के पुंज के समान चमक रही थी। स्वर्ण रथों की दीप्ति और करोड़ों शंखों की ध्वनि से आकाश गूँज उठा था।

युद्ध आरंभ होते ही माँ ललिता की दो प्रमुख देवियों ने असुरों की अग्रिम पंक्ति को तहस-नहस कर दिया।

सबसे पहले अश्वारूढ़ा देवी अपनी घुड़सवार सेना के साथ आगे बढ़ीं। उनके हाथ में अश्व-वारण नामक पाश था। उनके करोड़ों घोड़े ऐसी वेग से असुरों के बीच घुसे कि असुरों को संभलने का अवसर तक नहीं मिला। उनकी तलवारें बिजली की तरह चलीं और एक ही क्षण में हज़ारों असुरों के सिर धड़ से अलग हो गए।

उनके पीछे संपतकरी देवी अपनी गज-सेना के साथ आगे बढ़ीं। वे विशाल हाथी रणकोलाहल पर सवार थीं और उनके हाथ में अंकुश था। उनके करोड़ों हाथियों ने असुरों की पैदल सेना को अपने पैरों तले कुचलना शुरू कर दिया। असुरों के रथ खिलौनों की तरह टूटते चले गए और रणभूमि धूल और रक्त से भर गई।

जब भंडासुर के मुख्य सेनापति कुटिलक्ष ने अपनी सेना को पीछे हटते देखा, तो उसने मायावी अस्त्रों का प्रयोग आरंभ कर दिया। तभी माँ की प्रधान सेनापतियाँ स्वयं रणभूमि में उतरीं।

दण्डनाथा वाराही अपने किरिचक्र रथ पर सवार होकर प्रकट हुईं। उन्होंने अपने हल से भूमि को चीर दिया, जिससे हज़ारों असुर पाताल में धँस गए। इसके बाद उन्होंने अपने मुसल से प्रहार किया। उनके मुसल की प्रत्येक चोट से पर्वताकार असुर भी चूर्ण होकर भूमि पर गिरने लगे।

उसी समय मन्त्रिणी श्यामला अपने गेयचक्र रथ से मंत्रों और बाणों की वर्षा करने लगीं। उनके धनुष से छोड़े गए बाण शत्रु की बुद्धि को भ्रमित कर देते थे। असुरों की पंक्तियाँ टूट गईं और वे आपस में ही लड़ने लगे, उन्हें यह तक ज्ञात न रहा कि उनका शत्रु कौन है।

जब असुरों ने देखा कि वे सीधे युद्ध में पराजित हो रहे हैं, तो उन्होंने तामसिक और मायावी अस्त्रों का सहारा लिया। उन्होंने अंधतामिस्र अस्त्र छोड़कर सम्पूर्ण रणभूमि को घने अंधकार में डुबो दिया। इसके प्रत्युत्तर में माँ की शक्तियों ने चक्षुष्मती विद्या का प्रयोग किया, जिससे पूरी रणभूमि पुनः सूर्य के समान प्रकाशित हो उठी।

असुरों ने इसके बाद आकाश से बड़े-बड़े पत्थरों की वर्षा करने के लिए पाषाण अस्त्र चलाए। माँ की शक्तियों ने वज्र-बाणों से उन पत्थरों को आकाश में ही धूल में बदल दिया। फिर असुरों ने जहरीले विषबाण छोड़े, जिनका उत्तर शक्तियों ने अमृत-वर्षा करने वाले बाणों से दिया।

इसी बीच माँ ललिता के शरीर से प्रकट हुई अन्य शक्तियों ने भी अपना पराक्रम दिखाया।
नकुली देवी ने अपने विष से असुरों के जहरीले साँपों को नष्ट कर दिया।
तिरस्करणी देवी ने अपनी माया से अदृश्य होकर असुरों पर प्रहार करना शुरू किया। असुर देख ही नहीं पा रहे थे कि वार कहाँ से हो रहा है और किस दिशा में मृत्यु खड़ी है।

पहले दिन के युद्ध के अंत तक भंडासुर की सेना का एक-तिहाई भाग नष्ट हो चुका था। रणभूमि पर रक्त की नदियाँ बह रही थीं। असुरों के बड़े-बड़े सेनापति घायल अवस्था में भाग खड़े हुए थे।

माँ ललिता अब भी अपने मुख्य रथ चक्रराज पर शांत भाव से विराजमान थीं। वे सब कुछ देख रही थीं, क्योंकि अभी युद्ध का वास्तविक चरण शेष था—भंडासुर के भाई और उसके पुत्रों का मैदान में उतरना अभी बाकी था।

युद्ध अब उस मोड़ पर पहुँच चुका था जहाँ केवल बाहुबल नहीं, बल्कि माया और तंत्र का खेल आरंभ होना था। भंडासुर यह स्पष्ट देख चुका था कि उसकी करोड़ों की सेना गाजर-मूली की तरह काटी जा रही है। तभी उसे अपने सबसे चतुर और मायावी भाई की याद आई—विषुक्र

भंडासुर जानता था कि माँ ललिता की शक्ति-सेना को साधारण शस्त्रों से हराना असंभव है। इसलिए उसने विषुक्र को बुलाया, जो तंत्र और नकारात्मक शक्तियों का आचार्य था। विषुक्र ने तुरंत स्थिति को समझ लिया और एक अत्यंत तामसिक योजना रची।

रात के गहन अंधकार में, जब रणभूमि अस्थायी रूप से शांत थी, विषुक्र ने युद्ध-क्षेत्र के ठीक मध्य में एक भयानक विघ्न-यंत्र की स्थापना कर दी। यह कोई साधारण यंत्र नहीं था, बल्कि एक जादुई तांत्रिक प्लेट थी, जिसमें ऐसी नकारात्मक शक्तियाँ भरी थीं जो किसी भी शुभ कार्य, संकल्प या शक्ति को जड़ कर सकती थीं।

सूर्य के उदय के साथ ही जब माँ ललिता की शक्तियाँ पुनः युद्ध के लिए कूच करने लगीं, तभी अचानक सब कुछ बदल गया।

अश्वारूढ़ा देवी के घोड़े आगे बढ़ने से इनकार करने लगे।
दण्डनाथा वाराही का विशाल रथ किरिचक्र अपनी जगह से हिल भी नहीं पा रहा था।
मन्त्रिणी श्यामला, जो स्वयं नीति और रणनीति की अधिष्ठात्री थीं, उनकी भी सोचने-समझने की शक्ति क्षीण होने लगी।

पूरी शक्ति-सेना में एक अजीब-सी जड़ता फैल गई। आलस्य, निद्रा और व्याकुलता योद्धाओं पर छा गई। शस्त्र हाथों से गिरने लगे और कई योद्धा यह तक भूलने लगे कि वे युद्धभूमि में क्यों खड़े हैं। यह माँ की सेना पर आया अब तक का सबसे बड़ा संकट था।

अपनी दिव्य सेना को इस प्रकार असहाय और जड़ देखकर माँ ललिता ने तुरंत कारण को पहचान लिया। उन्हें ज्ञात हो गया कि यह विषुक्र द्वारा निर्मित विघ्न-यंत्र का प्रभाव है।

माँ ने न तो किसी सखी को पुकारा और न ही किसी सेनापति को आदेश दिया। उन्होंने एक अद्भुत लीला रची।

माँ ललिता ने अपने मुख-मंडल की ओर दृष्टि की और मंद-मंद मुस्कुराईं।

उस दिव्य हास्य से एक अत्यंत तेजस्वी, हाथी-मुख वाले बालक प्रकट हुए। वे कोई और नहीं, साक्षात भगवान श्री गणेश—महागणपति थे। विशेष यह था कि इस युद्ध में उनका प्राकट्य माँ के कामेश्वर-मुख से हुआ था, इसलिए वे यहाँ ललिता-पुत्र के रूप में विशेष स्थान रखते थे।

माँ के संकेत मात्र से बालक गणेश रणभूमि में कूद पड़े।

श्री गणेश ने अपनी सूंड से उस विशाल विघ्न-यंत्र को उखाड़ फेंका और अपने दाँतों से उसके टुकड़े-टुकड़े कर दिए। जैसे ही वह यंत्र नष्ट हुआ, शक्ति-सेना पर छाया हुआ सारा आलस्य, सम्मोहन और जड़ता उसी क्षण समाप्त हो गई।

माँ की शक्तियों में पहले से दस गुना अधिक ऊर्जा भर गई। गणेश जी ने केवल यंत्र का विनाश ही नहीं किया, बल्कि अपनी सेना के साथ मिलकर असुरों की पंक्तियों को कुचलना भी आरंभ कर दिया। रणभूमि पुनः जयघोष से गूँज उठी।

जब विषुक्र की योजना पूरी तरह विफल हो गई, तो भंडासुर का दूसरा भाई विशंग क्रोध से उन्मत्त हो उठा। उसने अपनी माया से आकाश को घोर अंधकार में ढँक दिया और रात्रि-चर असुरों की सेना लेकर गुप्त प्रहार शुरू कर दिया।

विशंग ने चारों ओर से माँ की सेनापतियों को घेरने का प्रयास किया। अंधकार, छल और अचानक होने वाले आक्रमणों ने युद्ध को और भी भयावह बना दिया। रणभूमि अब तीसरे और सबसे खतरनाक चरण की ओर बढ़ रही थी।

विघ्न-यंत्र के नष्ट होते ही भंडासुर उन्मत्त हो उठा। उसकी सबसे बड़ी तांत्रिक चाल विफल हो चुकी थी और अब उसके भीतर का धैर्य पूरी तरह टूट गया था। क्रोध और हताशा में उसने अपने तीसों पुत्रों को युद्ध में उतार दिया—जिन्हें कुट्टक आदि के नाम से जाना जाता था।

ये पुत्र साधारण असुर नहीं थे। वे अत्यंत शक्तिशाली, संगठित और क्रूर थे। जैसे ही वे रणभूमि में उतरे, माँ ललिता की सेना में क्षण भर के लिए हाहाकार मच गया। उनकी संयुक्त शक्ति के सामने कई योद्धा पीछे हटने लगे और युद्ध का संतुलन डगमगाने लगा।

तभी रणभूमि में एक अद्भुत दृश्य घटित हुआ।

माँ ललिता की केवल नौ वर्ष की पुत्री, बाला त्रिपुरा सुंदरी, आगे आईं।

उन्होंने माँ की ओर देखा और विनम्र किंतु दृढ़ स्वर में कहा—
“माँ! इन असुर पुत्रों के लिए आप या आपकी सेनापतियाँ कष्ट न करें। इनका अंत मैं स्वयं करूँगी।”

माँ ललिता ने अपनी पुत्री की ओर देखा। उनकी आँखों में न भय था, न संकोच—केवल पूर्ण विश्वास था।

कुमारी बाला का स्वरूप स्वयं माँ ललिता के समान था, बस आयु में छोटी। वही तेज, वही आभा, वही दिव्य सौम्यता। उन्होंने अपने छोटे से धनुष को उठाया और रणभूमि की ओर दृष्टि की।

क्षण भर में उनके बाणों की ऐसी बौछार हुई कि आकाश मानो रेखाओं से भर गया। एक-एक कर भंडासुर के तीसों पुत्र धरती पर गिरते चले गए। वे न चीख सके, न संभल सके। कुछ ही पलों में वे सभी मिट्टी में मिल चुके थे

जब यह समाचार भंडासुर तक पहुँचा कि उसके पुत्र—उसकी आँखों के तारे—एक नन्हीं कन्या के हाथों मारे गए हैं, तो उसका गर्व चकनाचूर हो गया। उसका घमंड टूट गया और वह शोक में डूब गया। रणभूमि के बीच खड़ा वह पहली बार स्वयं को असहाय अनुभव करने लगा।

अब भंडासुर को यह स्पष्ट हो गया था कि यह कोई साधारण युद्ध नहीं है। यह शक्ति का नहीं, बल्कि सत्ता और चेतना का संघर्ष है।

और उसी क्षण उसने निर्णय लिया—
अब वह स्वयं रणभूमि में उतरेगा।

अब युद्ध अपने सबसे निर्णायक मोड़ पर पहुँच चुका था। भंडासुर के तीसों पुत्रों की मृत्यु के बाद उसका क्रोध शोक में बदल चुका था। उसके दोनों भाई—विषुक्र और विशंग—प्रतिशोध की अग्नि में जल उठे। वे भली-भाँति समझ चुके थे कि अब छल और माया से काम नहीं चलेगा। अब यह युद्ध आर-पार का था।

सबसे पहले रणभूमि में उतरा विशंग—कुटिलता और छल का प्रतीक। उसने अपनी मायावी शक्ति से युद्ध-क्षेत्र में हज़ारों नकली विशंग उत्पन्न कर दिए, ताकि दण्डनाथा वाराही भ्रमित हो जाएँ और वास्तविक शत्रु तक न पहुँच सकें।

पर वाराही माँ छल से नहीं, संकल्प से युद्ध करती थीं। उन्होंने अपने विशाल रथ किरिचक्र की गति बढ़ाई। उनका क्रोध अब सीमा पार कर चुका था। उन्होंने अपने हृलेखा अस्त्र का प्रयोग किया। उस अस्त्र के प्रभाव से विशंग की समस्त माया छिन्न-भिन्न हो गई और असली विशंग सबके सामने प्रकट हो गया।

इसके बाद दोनों के बीच भीषण युद्ध हुआ। विशंग ने अपनी गदा से वाराही माँ पर प्रहार किया, किंतु माँ ने उसे अपने मुसल से आकाश में ही रोक दिया। वाराही माँ ने अपने हल से विशंग को अपनी ओर खींच लिया और फिर वज्र के समान कठोर मुसल से उसके मस्तक पर प्रहार किया। विशंग का सिर पके हुए फल की भाँति फट गया और वह तड़पता हुआ भूमि पर गिर पड़ा। रणभूमि में उसकी लीला वहीं समाप्त हो गई।

अपने भाई का अंत देखकर विषुक्र पागल हो उठा। वह तंत्र और मंत्र का ज्ञाता था, इसलिए वह सीधे मन्त्रिणी श्यामला की ओर बढ़ा। उसने उन पर ब्रह्म-पाश और सर्प-अस्त्र छोड़े, ताकि उन्हें जकड़ सके और उनकी शक्ति को बाँध दे।

माँ श्यामला ने इस सबको देखकर केवल मंद मुस्कान दी। उन्होंने अपनी वीणा का एक तार छेड़ा। उस संगीत की दिव्य ध्वनि से विषुक्र के सारे अस्त्र उसी क्षण निष्प्रभावी हो गए। तंत्र मंत्र टूट गया, माया बिखर गई।

जब विषुक्र ने देखा कि उसकी विद्या काम नहीं कर रही, तो उसने तलवार उठाई और सीधा आक्रमण किया। उत्तर में माँ श्यामला ने अपने इक्षु-धनुष से एक साथ पाँच पुष्प-बाण छोड़े। वे बाण विषुक्र की छाती को चीरते हुए निकल गए। मरते समय विषुक्र ने माँ श्यामला के दिव्य स्वरूप को देखा, और उसी क्षण उसके प्राण-पखेरू उड़ गए।

जब यह समाचार भंडासुर तक पहुँचा कि उसके दोनों भाई—जो उसकी दो भुजाओं के समान थे—भी मारे जा चुके हैं, तो उसका विवेक पूरी तरह नष्ट हो गया। अब उसके भीतर न शोक बचा था, न संयम। उसके पास खोने के लिए कुछ भी शेष नहीं था।

उसने अपनी अंतिम और सबसे घातक सेना—सर्व-शून्य सेना—को तैयार किया। स्वयं अपने विशाल रथ पर सवार होकर वह रणभूमि में उतरा। उसके आते ही चारों ओर अंधकार छा गया। पृथ्वी फटने लगी और दिशाएँ काँप उठीं।

उसी क्षण पहली बार माँ ललिता महात्रिपुरा सुंदरी अपने सिंहासन से उठीं। उन्होंने अपने दिव्य रथ चक्रराज पर आरूढ़ होने का संकल्प लिया।

अब युद्ध अपने अंतिम सत्य की ओर बढ़ चुका था।

अब युद्ध अपने उस बिंदु पर पहुँच चुका था जहाँ स्वयं सृष्टि की सीमाएँ काँपने लगी थीं। भंडासुर ने अपनी समस्त आसुरी शक्ति को समेटा और अपना सबसे भयानक अस्त्र छोड़ा—अंध-तामिस्र

उस अस्त्र के प्रहार से पूरी सृष्टि घोर अंधकार में डूब गई। सूर्य का प्रकाश लुप्त हो गया, दिशाएँ विलीन हो गईं और देवताओं की दृष्टि जड़ हो गई। ऐसा प्रतीत हुआ मानो चेतना स्वयं शून्य में गिर रही हो। उसी क्षण माँ ललिता ने अपने हाथ में स्थित महाचक्र का प्रयोग किया। उस चक्र से करोड़ों सूर्यों का प्रकाश फूटा और उसने उस अंधकार को चीरते हुए पुनः सृष्टि को प्रकाशित कर दिया।

अंध-तामिस्र की विफलता के बाद भंडासुर ने वे मायावी अस्त्र छोड़े, जिन्हें पहले कभी किसी ने देखा नहीं था। उसने ऐसे अस्त्र चलाए जो प्राचीन पापियों और असुरों को पुनर्जीवित कर सकते थे।

उसने हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप नामक अस्त्र छोड़े। रणभूमि में पहले से मरे हुए हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप जैसे दैत्य फिर से खड़े होने लगे। यह दृश्य देखकर देवता भी क्षण भर के लिए स्तब्ध रह गए।

इस माया को काटने के लिए माँ ललिता ने एक अद्भुत लीला रची। उन्होंने अपने दाएँ और बाएँ हाथ की उँगलियों के नाखूनों की ओर दृष्टि की। जैसे ही माँ ने अपने नाखूनों की आभा बिखेरी, उनके दसों नाखूनों से भगवान विष्णु के दसों अवतार—मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध और कल्कि—एक साथ प्रकट हो गए।

माँ के नाखूनों से निकले इन अवतारों ने भंडासुर द्वारा उत्पन्न किए गए पुराने असुरों का क्षण भर में वध कर दिया। उसी कारण माँ को दशावतार-स्वरूपिणी कहा जाता है।

अपनी प्रत्येक माया के टूटते जाने के बाद भंडासुर ने अंततः अपना सबसे विनाशकारी अस्त्र निकाला—महा-मोह अस्त्र। यह अस्त्र जीवित प्राणियों की चेतना को शून्य कर देता था। इसके प्रत्युत्तर में माँ ललिता ने नारायणास्त्र और महा-पाशुपत अस्त्रों का संधान किया। दोनों शक्तियों के टकराव से आकाश फटने लगा और समय स्वयं ठहर गया।

अब अंत का क्षण निकट था।

माँ ललिता ने अपना अमोघ शस्त्र महाकामेश्वर धनुष उठाया और उस पर महा-संवर्त बाण चढ़ाया। जैसे ही माँ ने वह बाण छोड़ा, वह अग्नि की एक प्रचंड ज्वाला में परिवर्तित हो गया। उस बाण ने भंडासुर के रथ, उसके ध्वज और उसके कवच को जलाकर राख कर दिया।

अंततः वह दिव्य बाण भंडासुर की छाती को चीरता हुआ निकल गया। जिस ‘भंड’ का जन्म कामदेव की राख से हुआ था, वह अंत में उसी चिदग्नि की ज्वाला में विलीन होकर पूरी तरह भस्म हो गया।

भंडासुर के वध के साथ ही उसका मायावी नगर शून्यक ताश के पत्तों की तरह ढह गया। आकाश से पुष्प-वर्षा होने लगी। ब्रह्मा, विष्णु और महादेव प्रकट हुए और माँ ललिता की स्तुति की। देवताओं को उनका स्वर्ग पुनः प्राप्त हुआ और संसार में फिर से प्रेम और सृजन का संचार हुआ।

माँ ललिता ने अपनी कृपा से कामदेव को पुनः जीवित किया। वे केवल रति को दिखाई देते थे, इसलिए उन्हें अनंग कहा गया।

भंडासुर के वध के साथ ही रणभूमि का कोलाहल थम गया। जहाँ अभी कुछ क्षण पहले अस्त्रों की गर्जना और रक्त की गंध थी, वहाँ अब केवल मौन फैल गया। दिशाएँ स्थिर हो गईं, आकाश शांत हो गया और पृथ्वी ने पहली बार चैन की साँस ली।

माँ ललिता महात्रिपुरा सुंदरी अपने रथ चक्रराज पर विराजमान थीं। उनके चेहरे पर न क्रोध था, न विजय का गर्व—केवल वही सहज करुणा, जो सृष्टि को थामे रहती है। उनकी दृष्टि में यह युद्ध न विजय था, न पराजय—यह केवल धर्म की पुनःस्थापना थी।

देवताओं की कृतज्ञता

देवताओं ने एक-एक कर अपने अस्त्र भूमि पर रख दिए। इंद्र, वरुण, अग्नि, वायु, यम—सभी ने माँ के चरणों में दंडवत प्रणाम किया। जिन हाथों ने कभी वज्र और पाश उठाए थे, वे अब काँपते हुए जुड़े हुए थे।

देवराज इंद्र ने आगे बढ़कर कहा—
“हे जगदम्बा! आपने हमें केवल स्वर्ग ही नहीं लौटाया, आपने हमें फिर से धर्म का स्मरण कराया है। हम भूल चुके थे कि शक्ति का अर्थ केवल शासन नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व है।”

ब्रह्मा ने सिर झुकाकर कहा—
“हे माँ! सृष्टि मेरी रचना है, पर उसका संतुलन आपकी करुणा से ही चलता है।”

विष्णु ने शांत स्वर में कहा—
“हे ललिता! आप ही वह चेतना हैं, जिसके बिना पालन भी शून्य है।”

महादेव कुछ नहीं बोले। वे केवल माँ की ओर देखते रहे—वह दृष्टि, जिसमें आदि और अंत दोनों समाहित थे।

ललिता सहस्रनाम का उद्भव

उसी क्षण देवर्षि नारद आगे आए। उनकी वीणा के स्वर अपने आप गूँज उठे। उन्होंने देखा कि देवताओं के हृदय में केवल कृतज्ञता नहीं, बल्कि माँ के स्वरूप को शब्दों में बाँधने की तीव्र इच्छा जन्म ले चुकी है।

नारद बोले—
“हे देवगण! आज जो हमने देखा है, उसे कोई एक नाम नहीं बाँध सकता। माँ का प्रत्येक रूप, प्रत्येक लीला, प्रत्येक करुणा—अपने आप में एक नाम है।”

तभी ब्रह्मा के मुख से एक नाम फूटा—
“श्री माताः”

फिर विष्णु ने कहा—
“श्री महराज्ञी”

इंद्र बोले—
“श्री चिदग्निकुंडसंभूता”

इस प्रकार एक-एक कर माँ के नाम प्रकट होते चले गए। कोई नाम उनके तेज से निकला, कोई करुणा से, कोई उनके युद्ध-पराक्रम से, तो कोई उनकी शांति से। देवताओं ने अनुभव किया कि ये नाम वे गढ़ नहीं रहे—ये नाम स्वयं प्रकट हो रहे हैं।

इस प्रकार ललिता सहस्रनाम का उद्भव हुआ—
हज़ार नाम, पर एक ही सत्य।

नारद ने उन नामों को अपने हृदय में संजो लिया, ताकि वे आगे चलकर ऋषियों तक, साधकों तक और युगों तक पहुँच सकें।

माँ ललिता ने एक दृष्टि से अपनी सेनाओं को शांत किया। योगिनियाँ, शक्तियाँ, सेनापति—सब अपने-अपने स्वरूप में लीन होने लगे। बाला त्रिपुरा सुंदरी माँ के पास आईं और पुनः बालिका रूप में शांत खड़ी हो गईं। गणपति ने मुस्कुरा कर माँ को प्रणाम किया और अंतर्ध्यान हो गए।

माँ ने अंत में देवताओं से कहा—
“जब-जब धर्म डगमगाएगा, तब-तब मैं प्रकट नहीं होऊँगी—
बल्कि स्मरण के रूप में जाग्रत रहूँगी।”

यह कहकर माँ ललिता धीरे-धीरे श्रीचक्र में लीन हो गईं। चिदग्नि कुंड शांत हो गया, हिमालय स्थिर हो गया और सृष्टि फिर से अपने सहज प्रवाह में लौट आई।

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