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साल 2026 की शुरुआत होते ही भारत में जिन पर्वों का नाम सबसे पहले लिया जाता है, उनमें Makar Sankranti अपने आप आ जाती है। यह त्योहार केवल किसी परंपरा को निभाने का दिन नहीं है, बल्कि सूर्य की उस चाल से जुड़ा है जिसे भारतीय समाज सदियों से अपने जीवन का हिस्सा मानता आया है। जब सूर्य धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करता है, उसी क्षण को मकर संक्रांति कहा जाता है। भारतीय पंचांग में यही समय उत्तरायण की शुरुआत माना जाता है, जब दिन धीरे-धीरे बड़े होने लगते हैं और मौसम में बदलाव साफ़ महसूस होने लगता है।

इस समय छतों पर पतंगों की तैयारी दिखने लगती है और घरों में तिल-गुड़ जैसे साधारण लेकिन मौसम के हिसाब से चुने गए पकवान बनने लगते हैं। आज के समय में भले ही ज़िंदगी कैलेंडर और घड़ी के मुताबिक चलती हो, लेकिन मकर संक्रांति हर साल यह याद दिलाती है कि भारतीय परंपरा में समय को सूर्य, ऋतु और प्रकृति के साथ जोड़कर समझा गया है। इसी कारण 2026 की मकर संक्रांति भी सिर्फ़ एक तारीख़ नहीं, बल्कि उस पुराने रिश्ते की याद है जो इंसान और प्रकृति के बीच बना रहा है।

Table of Contents

Makar Sankranti कब है, किस समय है और इस दिन क्या करना सही माना जाता है

Makar Sankranti 2026 किस दिन पड़ रही है

हर साल की तरह 2026 में भी मकर संक्रांति जनवरी के बीच आती है। इस बार मकर संक्रांति 14 जनवरी 2026, बुधवार को है।
मकर संक्रांति की तारीख चंद्र तिथि से नहीं, बल्कि सूर्य की चाल से तय होती है। यही वजह है कि यह पर्व लगभग हर साल 14 जनवरी के आसपास ही आता है।

2026 में सूर्य मकर राशि में किस समय प्रवेश करेगा

14 जनवरी 2026 को सूर्य दोपहर लगभग 03 बजकर 13 मिनट पर मकर राशि में प्रवेश करेगा।
पंचांग की भाषा में यही क्षण “संक्रांति” कहलाता है। इसी समय के आधार पर पूरे दिन के पुण्यकाल और महा पुण्यकाल की गणना की जाती है।

मकर संक्रांति 2026 का पुण्यकाल कब से कब तक रहेगा (Makar Sankranti 2026: Start and End of the Punyakaal)

संक्रांति के बाद का समय ही पुण्यकाल माना जाता है।
2026 में मकर संक्रांति का पुण्यकाल दोपहर 03:13 बजे से शाम लगभग 05:45 बजे तक रहेगा।
इस समय में स्नान, दान, सूर्य पूजा और तिल-गुड़ से जुड़ी परंपराएँ निभाई जाती हैं। जो लोग दिनभर व्यस्त रहते हैं, उनके लिए यही समय सबसे उपयुक्त माना जाता है।

महा पुण्यकाल किस समय रहेगा

पुण्यकाल के भीतर ही एक छोटा लेकिन खास समय आता है, जिसे महा पुण्यकाल कहा जाता है।
2026 में यह समय 03:13 बजे से लगभग 04:58 बजे तक रहेगा।
कई लोग इस दौरान विशेष रूप से दान करते हैं — जैसे तिल, गुड़, कंबल, वस्त्र या अन्न का दान।

सुबह स्नान करने वालों के लिए ब्रह्म मुहूर्त

जो लोग Makar Sankranti के दिन सुबह जल्दी स्नान करने की परंपरा निभाते हैं, उनके लिए ब्रह्म मुहूर्त का समय भी देखा जाता है।
इस दिन ब्रह्म मुहूर्त सुबह करीब 05:27 से 06:21 बजे तक रहेगा।
इस समय सूर्य अर्घ्य, जप या साधारण स्नान भी किया जा सकता है।

क्या Makar Sankranti के दिन कोई विशेष योग बनता है

मकर संक्रांति अपने आप में सूर्य से जुड़ा पर्व है, इसलिए इस दिन सूर्य पूजा को विशेष माना जाता है।
अलग-अलग पंचांगों में योगों के नाम अलग हो सकते हैं, लेकिन सामान्य रूप से यह दिन दान और संयम के लिए श्रेष्ठ माना गया है।

इसी कारण इस दिन:

तिल-गुड़ का दान, अन्न और वस्त्र दान, जरूरतमंदों को भोजन जैसे काम परंपरागत रूप से किए जाते हैं।

क्या 15 जनवरी 2026 को भी दान करना शुभ है

कई घरों में यह सवाल रहता है।
परंपरा के अनुसार संक्रांति का पुण्य प्रभाव अगले दिन तक माना जाता है, इसलिए 15 जनवरी 2026 को भी स्नान और दान करने वाले लोग मिल जाते हैं।

हालाँकि मुख्य पर्व और संक्रांति का क्षण 14 जनवरी को ही माना जाएगा।

मकर संक्रांति का सीधा-सा अर्थ (What Makar Sankranti Simply Means)

मकर संक्रांति किसी कथा या कहानी का पर्व नहीं है। यह उस दिन की याद है, जब सूर्य उत्तरायण होता है और दिन धीरे-धीरे बड़े होने लगते हैं।
खेती, मौसम और दिनचर्या — तीनों के बीच जो रिश्ता है, मकर संक्रांति उसी को हर साल फिर से सामने रख देती है।

Makar Sankranti : सूर्य का उत्तरायण होना और इसका सीधा अर्थ

भारतीय परंपरा में Makar Sankranti को सिर्फ़ एक त्योहार नहीं माना गया। यह दिन उस समय की पहचान है, जब सूर्य अपनी चाल बदलता है। इसमें न कोई कहानी है और न कोई चमत्कार। मकर संक्रांति सीधे सूर्य की असली गति से जुड़ी हुई है, इसलिए पंचांग में इसका महत्व बताया गया है।

जब सूर्य अपनी दिशा बदलता है, तो उसका असर हमारे रोज़ के जीवन पर साफ़ दिखता है। दिन थोड़े-थोड़े लंबे होने लगते हैं, ठंड का असर धीरे-धीरे बदलता है और खेतों में काम की तैयारी शुरू हो जाती है। पहले के समय में लोग कैलेंडर नहीं देखते थे, बल्कि ऐसे बदलाव देखकर ही अपने काम और दिन तय करते थे।

मकर संक्रांति उसी बदलाव को समझने का दिन है। यह याद दिलाती है कि हमारे यहाँ समय की गिनती सिर्फ़ तारीख़ से नहीं, बल्कि सूर्य और मौसम को देखकर की जाती थी। इसलिए यह पर्व हर साल आता है और बिना ज़्यादा दिखावे के अपनी बात कह जाता है।

संक्रांति का अर्थ क्या है

संक्रांति शब्द का मतलब होता है बदलाव। भारतीय पंचांग के अनुसार, जब सूर्य एक राशि को छोड़कर दूसरी राशि में प्रवेश करता है, उसी समय को संक्रांति कहा जाता है। सूर्य साल भर में बारह राशियों से होकर गुजरता है, इसलिए एक साल में कुल बारह संक्रांतियाँ आती हैं।

हर संक्रांति अपने आप में सूर्य की चाल से जुड़ी होती है, लेकिन सभी संक्रांतियों को एक जैसा महत्व नहीं दिया गया। आम जीवन और परंपरा में Makar Sankranti को खास माना गया है। इसका कारण सिर्फ़ इतना नहीं है कि सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है, बल्कि इसलिए भी कि इसी समय सूर्य की दिशा बदलती है।

मकर संक्रांति से सूर्य उत्तरायण होता है, यानी दिन धीरे-धीरे बड़े होने लगते हैं। यही बदलाव मौसम, खेती और रोज़मर्रा के जीवन में साफ़ दिखाई देता है। इसी वजह से मकर संक्रांति को बाकी संक्रांतियों से अलग और विशेष माना गया है।

उत्तरायण और दक्षिणायन की समझ

भारतीय परंपरा में साल को दो हिस्सों में देखा गया है — उत्तरायण और दक्षिणायन। यह बँटवारा सूर्य की चाल के आधार पर किया गया है। जब माना जाता है कि सूर्य दक्षिण दिशा की ओर बढ़ रहा है, उस समय को दक्षिणायन कहा जाता है। और जब सूर्य उत्तर दिशा की ओर बढ़ने लगता है, तो उसे उत्तरायण कहा जाता है।

Makar Sankranti के दिन से उत्तरायण की शुरुआत मानी जाती है। इस समय दिन धीरे-धीरे बड़े होने लगते हैं और ठंड का असर भी बदलने लगता है। पुराने समय में लोग इन बदलावों को बहुत ध्यान से देखते थे, क्योंकि खेती, यात्रा और रोज़मर्रा के काम इसी पर निर्भर होते थे।

उत्तरायण के समय को परंपरा में काम करने, मेहनत बढ़ाने और जीवन को फिर से गति देने का समय माना गया। इसी वजह से इस काल को स्नान, दान और संयम से जोड़ा गया, ताकि शरीर और मन दोनों को ठीक दिशा में रखा जा सके।

भारतीय पंचांग में मकर संक्रांति का स्थान (Importance of Makar Sankranti in the Indian Calendar (Panchang)

अधिकांश हिंदू पर्व चंद्रमा की स्थिति पर आधारित होते हैं, इसलिए उनकी तिथियाँ हर साल बदलती रहती हैं। इसके विपरीत मकर संक्रांति पूरी तरह सूर्य आधारित पर्व है। यही कारण है कि यह हर साल लगभग एक ही तारीख के आसपास आती है।

भारतीय पंचांग में मकर संक्रांति को एक स्थिर संदर्भ के रूप में देखा गया है। यह वह बिंदु है, जहाँ सूर्य, ऋतु और मानव जीवन का तालमेल स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। इसी कारण इसे केवल धार्मिक नहीं, बल्कि कालगणना का महत्वपूर्ण आधार माना गया।

मकर संक्रांति और खगोलीय बदलाव का सीधा रिश्ता (How Makar Sankranti Is Directly Related to Astronomical Changes)

मकर संक्रांति का संबंध सीधे सूर्य और पृथ्वी की स्थिति से है। पृथ्वी साल भर सूर्य के चारों ओर घूमती रहती है। इस दौरान हर समय सूर्य की किरणें धरती पर एक जैसी नहीं पड़तीं। कभी तिरछी, तो कभी थोड़ा सीधी।

मकर संक्रांति के बाद सूर्य की किरणें धीरे-धीरे ज्यादा सीधी पड़ने लगती हैं। इसी वजह से ठंड का असर कम होने लगता है और मौसम में बदलाव दिखने लगता है। इसका असर केवल तापमान तक सीमित नहीं रहता, बल्कि खेती और रोज़मर्रा के कामों पर भी पड़ता है।

पुराने समय में लोगों ने इन बदलावों को ध्यान से देखा और समझा। उन्होंने महसूस किया कि यह केवल आकाश की घटना नहीं, बल्कि जीवन से जुड़ा बदलाव है। इसी समझ के कारण मकर संक्रांति को एक पर्व के रूप में अपनाया गया, ताकि प्रकृति के इस बदलाव को याद रखा जा सके।

मकर संक्रांति से जुड़ी पुरानी मान्यताएँ और धार्मिक परंपराएँ

मकर संक्रांति का महत्व सिर्फ़ सूर्य की चाल बदलने तक सीमित नहीं रहा। समय के साथ यह पर्व भारतीय समाज में धर्म, संयम और दान से जुड़ता चला गया। पुराने समय में जब इंसान का जीवन पूरी तरह प्रकृति पर निर्भर था, तब ऐसे पर्व बनाए गए ताकि मनुष्य प्रकृति के साथ तालमेल में रह सके। मकर संक्रांति उसी सोच से जुड़ा एक साफ़ उदाहरण है।

वैदिक समय में संक्रांति को कैसे देखा गया (Perception of Makar Sankranti in the Vedic Era)

वैदिक काल में समय को केवल दिन और रात में नहीं बाँटा जाता था। ऋतुएँ, यज्ञ का समय और सूर्य की गति — इन सबको ध्यान में रखकर जीवन की व्यवस्था बनाई जाती थी। उस समय संक्रांति को किसी एक दिन के उत्सव की तरह नहीं, बल्कि समय के बदलने के संकेत के रूप में देखा जाता था।

यज्ञ, हवन और दान जैसे काम खास समय पर किए जाते थे, ताकि जीवन और प्रकृति के बीच संतुलन बना रहे। धीरे-धीरे यही सोच संक्रांति को धार्मिक परंपराओं से जोड़ती चली गई।

महाभारत काल में उत्तरायण का महत्व और भीष्म पितामह की परंपरा

महाभारत के समय तक उत्तरायण और दक्षिणायन की समझ भारतीय समाज में साफ़ रूप से बन चुकी थी। इसे केवल सूर्य की चाल की जानकारी नहीं माना गया, बल्कि समय को पहचानने और जीवन को व्यवस्थित करने का आधार समझा गया। उस दौर में समय को यूँ ही बीतता हुआ नहीं देखा जाता था, बल्कि हर काल को उसके प्रभाव के साथ समझा जाता था।

उत्तरायण को वह समय माना गया, जब सूर्य की दिशा बदलने के साथ दिन लंबे होने लगते हैं और जीवन की गतिविधियाँ बढ़ने लगती हैं। इसी कारण इस काल को कर्म और संयम से जोड़ा गया। लोग अपने काम, कर्तव्य और जीवन की दिशा पर अधिक ध्यान देने लगते थे।

महाभारत में इस सोच का सबसे स्पष्ट उदाहरण भीष्म पितामह के जीवन में मिलता है। युद्ध के बाद शरशय्या पर पड़े होने के बावजूद उन्होंने तुरंत देह त्याग नहीं किया। इच्छा मृत्यु का वरदान होने के बाद भी उन्होंने उत्तरायण की प्रतीक्षा की और उसी काल में देह त्याग किया।

यह निर्णय इस बात को दिखाता है कि उस समय जीवन और मृत्यु तक को समय के नियम से जोड़ा जाता था। उत्तरायण को ऐसा समय माना गया, जब व्यक्ति शांत मन से अपने जीवन का अंत स्वीकार कर सके। भीष्म पितामह का प्रसंग इसी विश्वास का प्रमाण है।

इसी सोच के कारण मकर संक्रांति, जो उत्तरायण की शुरुआत का संकेत है, धीरे-धीरे केवल खगोलीय घटना न रहकर धार्मिक और सामाजिक महत्व का पर्व बन गई। यह दिन समय के बदलने को समझने और उसी के अनुसार जीवन को ढालने की परंपरा से जुड़ा रहा।

मकर संक्रांति पर स्नान, दान और जप क्यों किए जाते हैं (Significance of Bathing, Charity, and Chanting on Makar Sankranti)

मकर संक्रांति पर स्नान, दान और जप की परंपरा अचानक नहीं बनी। ठंड के मौसम में जब शरीर सुस्त हो जाता है, तब स्नान को शरीर और मन को जगाने का तरीका माना गया।

दान का अर्थ केवल चीज़ें देना नहीं था, बल्कि अपने भीतर के अहंकार को छोड़ना भी था। जप और ध्यान को इसलिए महत्व दिया गया, ताकि मन शांत रहे और आने वाले समय के लिए संतुलन बना रहे।

तिल और गुड़ का मतलब क्या है

मकर संक्रांति पर तिल और गुड़ का खास महत्व है। तिल को शरीर की रक्षा और शुद्धता से जोड़ा गया, जबकि गुड़ को ऊर्जा और मिठास का प्रतीक माना गया।

दोनों को साथ लेने का अर्थ यही है कि जीवन में कठोरता और मिठास दोनों का संतुलन होना चाहिए। इसी सोच से तिल-गुड़ बाँटने की परंपरा बनी और लोगों के बीच मधुरता बढ़ाने की बात कही गई।

मकर संक्रांति पर दान की परंपरा कैसे बनी (Origin of the Charity Tradition on Makar Sankranti)

मकर संक्रांति पर दान की परंपरा का कारण केवल धर्म नहीं था, बल्कि समाज भी था। यह वह समय होता था जब खेतों से अन्न आने लगता था और लोगों के पास बाँटने के लिए कुछ होता था।

जो सक्षम होता था, वह अन्न, वस्त्र या ज़रूरी चीज़ें दान करता था। इससे ज़रूरतमंदों की मदद होती थी और समाज में आपसी सहयोग और बराबरी का भाव बना रहता था।

भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में मकर संक्रांति: परंपराएँ, नाम और लोकविश्वास (Regional Celebrations of Makar Sankranti in India: Traditions, Local Names, and Beliefs)

भारत में मकर संक्रांति एक जैसी नहीं मनाई जाती। यही इस पर्व की असली पहचान है। देश के अलग-अलग हिस्सों में मौसम, खेती और लोगों की जीवनशैली के अनुसार इसका रूप बदल गया है। कहीं यह नई फसल की खुशी है, तो कहीं लोगों के आपस में मिलने का मौका। नाम अलग हैं, तरीके अलग हैं, लेकिन भावना वही रहती है — बदलाव को समझना और उसे अपनाना।

उत्तर भारत में मकर संक्रांति की परंपरा (How Makar Sankranti Is Celebrated in North India)

उत्तर भारत के कई राज्यों में मकर संक्रांति को खिचड़ी या संक्रांति कहा जाता है। यहाँ यह पर्व सादगी से जुड़ा है।
नदियों के पास रहने वाले लोग इस दिन स्नान करते हैं और फिर दान करते हैं। घरों में भारी भोजन नहीं बनता। दाल-चावल, तिल और गुड़ जैसी साधारण चीज़ें ही ज़्यादा दिखाई देती हैं।

इस क्षेत्र में Makar Sankranti का मतलब दिखावा नहीं, बल्कि बाँटना होता है। जो घर में है, वही जरूरतमंदों के साथ साझा किया जाता है।

दक्षिण भारत में पोंगल का महत्व

दक्षिण भारत में Makar Sankranti को पोंगल कहा जाता है। तमिलनाडु में यह पर्व चार दिनों तक चलता है और पूरी तरह खेती से जुड़ा होता है।
घरों के आँगन सजाए जाते हैं, नए बर्तन निकाले जाते हैं और दूध-चावल पकाते समय फसल के लिए धन्यवाद दिया जाता है।

यहाँ मकर संक्रांति केवल पूजा तक सीमित नहीं रहती। खेत, पशु और औज़ार — सबको जीवन का हिस्सा मानकर इस दिन याद किया जाता है।

गुजरात और राजस्थान में उत्तरायण पर्व

गुजरात और राजस्थान में Makar Sankranti को उत्तरायण कहा जाता है। इस दिन सुबह से पहले ही छतों पर हलचल शुरू हो जाती है।
पतंगें निकाली जाती हैं, धागे तैयार होते हैं और पूरा दिन खुले आसमान के नीचे बीतता है।

यहाँ पतंग सिर्फ़ खेल नहीं है। यह लोगों को एक साथ बैठने और दिन भर साथ रहने का बहाना बन जाती है।

महाराष्ट्र में तिलगुल और सामाजिक परंपरा

महाराष्ट्र में Makar Sankranti की पहचान तिलगुल से होती है। लोग एक-दूसरे को तिलगुल देते हुए कहते हैं —
“तिलगुल घ्या, गोड गोड बोला।”

इसका मतलब सीधा है — पुराने झगड़े छोड़ो और बात मीठी रखो। कई लोग इस दिन उन रिश्तों को भी ठीक करने की कोशिश करते हैं, जिनमें समय के साथ दूरी आ गई हो।

पंजाब और आसपास के क्षेत्रों में लोहड़ी

पंजाब और उसके आसपास के इलाकों में मकर संक्रांति से एक दिन पहले लोहड़ी मनाई जाती है। यह पर्व सर्दी के मौसम और खेतों से जुड़ा होता है। शाम को आग जलाई जाती है, लोग उसके चारों ओर बैठते हैं और मूंगफली, रेवड़ी, तिल व मक्का अर्पित करते हैं। जिन घरों में नई शादी या बच्चे का जन्म हुआ हो, वहाँ लोहड़ी विशेष रूप से मनाई जाती है। लोहड़ी सर्दी के अंत और अगले दिन आने वाली Makar Sankranti की तैयारी का संकेत मानी जाती है।

असम में भोगाली बिहू

असम में Makar Sankranti के आसपास भोगाली बिहू मनाया जाता है। यह पर्व फसल कटने के बाद की खुशी से जुड़ा होता है। लोग सामूहिक रूप से भोजन बनाते हैं, खुले स्थान पर आग जलाते हैं और रात साथ बिताते हैं। चावल और तिल से बने पकवान इस पर्व की पहचान होते हैं। भोगाली बिहू मेहनत के बाद मिलने वाले सुख और सामूहिक जीवन का प्रतीक माना जाता है।

ओडिशा, बिहार और झारखंड में मकर संक्रांति (Celebration of Makar Sankranti in Odisha, Bihar, and Jharkhand)

इन क्षेत्रों में Makar Sankranti खेती और नए अन्न से जुड़ी होती है। घरों में चूड़ा, तिल, गुड़ और चावल से बने व्यंजन बनाए जाते हैं। नदियों में स्नान और दान की परंपरा भी देखी जाती है। गाँवों में लोग एक-दूसरे के घर जाते हैं और भोजन साझा करते हैं। यहाँ यह पर्व सादगी और आपसी मेल-जोल से जुड़ा रहता है।

उत्तराखंड और हिमालयी क्षेत्रों में मकर संक्रांति (How Makar Sankranti Is Celebrated in Uttarakhand and Himalayan Regions)

उत्तराखंड और हिमालयी इलाकों में Makar Sankranti को घुघुतिया जैसे नामों से जाना जाता है। ठंड के मौसम में इस दिन विशेष पकवान बनाए जाते हैं और बच्चों को बाँटे जाते हैं। पक्षियों को दाना डालने की परंपरा भी यहाँ देखी जाती है। यह पर्व प्रकृति के साथ जुड़ाव और कठोर मौसम में जीवन को सहज बनाए रखने की सोच से जुड़ा माना जाता है।

बंगाल और पूर्वी भारत में संक्रांति

बंगाल और पूर्वी भारत के कुछ हिस्सों में Makar Sankranti को पौष संक्रांति कहा जाता है।
यहाँ तिल और चावल से बने पकवान ज़्यादा बनाए जाते हैं। गाँवों में मेलों का आयोजन होता है, जहाँ लोकगीत, हस्तशिल्प और देसी भोजन साथ दिखाई देता है।

यह पर्व यहाँ पूजा से ज़्यादा लोकजीवन से जुड़ा लगता है।

भारत के लोकजीवन में मकर संक्रांति की भूमिका (Importance of Makar Sankranti in India’s Folk Traditions)

Makar Sankranti भारत में केवल धार्मिक पर्व नहीं है।
यह मौसम के बदलने को समझने का दिन है।
खेती और मेहनत को सम्मान देने का समय है।
और लोगों के बीच बैठने, मिलने और एक-दूसरे को याद करने का मौका भी है।

हर क्षेत्र ने इसे अपनी ज़रूरत और जीवनशैली के अनुसार अपनाया है। इसी वजह से यह पर्व पीढ़ियों से चलता आ रहा है।

मकर संक्रांति हर साल एक ही तारीख़ के आसपास क्यों आती है? (Why Is Makar Sankranti Celebrated Around the Same Date Each Year?)

क्योंकि यह पर्व चंद्र तिथि पर नहीं, बल्कि सूर्य की चाल पर आधारित है। सूर्य की गति अपेक्षाकृत स्थिर होती है, इसलिए इसकी तारीख़ ज़्यादा आगे-पीछे नहीं होती।

क्या मकर संक्रांति केवल पूजा-पाठ से जुड़ा पर्व है? (Does Makar Sankranti Only Involve Worship and Rituals?)

नहीं, यह केवल पूजा तक सीमित नहीं है। इसमें मौसम, खेती, सामाजिक व्यवहार और जीवन की दिनचर्या — सबका जुड़ाव देखने को मिलता है।

क्या मकर संक्रांति पर दान करना ज़रूरी माना गया है? (Is Donation Mandatory During Makar Sankranti?)

परंपरा में दान को महत्व दिया गया है, लेकिन इसका मतलब मजबूरी नहीं है। जितना संभव हो, उतना साझा करने की भावना ही इसका मूल भाव है।

कई घरों में तिल और गुड़ ही क्यों बाँटे जाते हैं?

क्योंकि ये दोनों चीज़ें मौसम के हिसाब से चुनी गई थीं। साथ ही, इन्हें मिलाकर बाँटने का भाव जीवन में मिठास और संतुलन बनाए रखने से जुड़ा माना गया।

क्या मकर संक्रांति सिर्फ़ ग्रामीण जीवन से जुड़ा पर्व है?

नहीं, भले ही इसकी जड़ें खेती और प्रकृति से जुड़ी हों, लेकिन समय के साथ यह शहरों और आधुनिक जीवन का भी हिस्सा बन गया है।

क्या मकर संक्रांति पर कोई विशेष नियम बहुत सख़्ती से माने जाते हैं?

इस पर्व में सख़्त नियमों से ज़्यादा सरलता पर ज़ोर दिया गया है। शांत रहना, संयम रखना और रिश्तों में मिठास बनाए रखना — यही मुख्य बात मानी गई है।

कई लोग जानना चाहते हैं कि क्या इस दिन सुबह स्नान करना ज़रूरी है?

सुबह स्नान की परंपरा कई जगह निभाई जाती है, लेकिन यह अनिवार्य नहीं है। सुविधा और परिस्थिति के अनुसार लोग अपने तरीके से पर्व मनाते हैं।

क्या मकर संक्रांति का महत्व आज के समय में भी उतना ही है?

हाँ, आज के तेज़ जीवन में भी यह पर्व रुककर सोचने, परिवार के साथ समय बिताने और जीवन को संतुलित रखने की याद दिलाता है।

क्या मकर संक्रांति किसी एक धर्म या वर्ग तक सीमित है? (Does Makar Sankranti Belong Exclusively to a Particular Faith or Group?)

नहीं, यह पर्व किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं रहा। अलग-अलग क्षेत्रों और समाजों ने इसे अपने तरीके से अपनाया है।

अंत में, मकर संक्रांति का सबसे सरल संदेश क्या है?

पुरानी कड़वाहट छोड़कर आगे बढ़ना, मेहनत का सम्मान करना और जीवन में संतुलन बनाए रखना — यही इसका सबसे सीधा संदेश माना जाता है।

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