Navagunjara Mahabharata : भारत की धरती पर महाभारत की कहानी सिर्फ एक किताब तक सीमित नहीं रही। सदियों से लोग इसे अपनी-अपनी भाषा और अंदाज़ में सुनाते और लिखते आए हैं। कश्मीर से लेकर केरल तक, और बंगाल से महाराष्ट्र तक हर जगह इस कहानी को अपनी मिट्टी की खुशबू मिली है। लेकिन कुछ कहानियाँ बस सुनाई नहीं जातीं… उन्हें नया रूप दिया जाता है।
ऐसी ही एक रचना है सारला महाभारत। इसमें सिर्फ वही पुरानी कथा नहीं दोहराई गई, बल्कि इसमें नए पात्र जोड़े गए, नई घटनाएँ रची गईं, और फिर भी इसकी आत्मा महाभारत की असली भावना जैसी की तैसी बनी रही। इसी रचना में Navagunjara Mahabharata की वह कथा मिलती है जो आज भी लोगों को हैरान कर देती है।
पंद्रहवीं शताब्दी में ओडिशा की उर्वर भूमि पर एक साधारण किसान ने वह काम किया जो उस युग के बड़े-बड़े पंडित और विद्वान नहीं कर पाए। उस किसान का नाम था सिद्धेश्वर परिडा और उनकी रचना थी ओड़िआ भाषा का पहला महाकाव्य जिसे आज हम सारला महाभारत के नाम से जानते हैं। इस ग्रंथ में सैकड़ों ऐसी कथाएं हैं जो संस्कृत के मूल ग्रंथ में कहीं नहीं मिलतीं। उन्हीं में से एक कथा है नवगुंजर की, जो आज भी ओडिशा के कण-कण में बसी है।
कौन थे सारला दास और क्यों उनकी महाभारत अलग है
सारला दास को लोग शूद्र मुनि भी कहते हैं। वह किसी राजदरबार के कवि नहीं थे, किसी विश्वविद्यालय के विद्वान नहीं थे। वह खेतों में हल चलाते थे, मिट्टी से उनका नाता था। लेकिन उनकी लेखनी में एक ऐसी शक्ति थी जो शायद इसीलिए आई क्योंकि वह सीधे जनमानस से जुड़े थे। ओडिशा में एक मान्यता प्रचलित है कि देवी सारला स्वयं उनके अंगूठे में विराजमान होकर यह कथा लिखवाती थीं। इसीलिए उनका नाम सारला दास पड़ा।
व्यास की महाभारत संस्कृत में लिखी गई थी, जो ज़्यादातर विद्वानों के लिए थी। उसे समझने के लिए अलग से समझाने वाली किताबें भी चाहिए होती हैं।
लेकिन सारला दास ने अपनी कहानी आम लोगों के लिए लिखी। उन्होंने ऐसी भाषा चुनी, जिसे ओडिशा का एक किसान भी आसानी से समझ सके, जो दिनभर खेत में काम करके रात को थका हुआ घर लौटता है।
उन्होंने कठिन संस्कृत शब्दों की जगह आसान और रोज़मर्रा की ओड़िआ भाषा का इस्तेमाल किया। कहानी के पात्रों को भी ज्यादा इंसानी बना दिया। भीम को सिर्फ ताकतवर नहीं, बल्कि एक भावुक भाई की तरह दिखाया। दुर्योधन को सिर्फ बुरा नहीं, बल्कि उसके अंदर के स्वाभिमान और दर्द को भी दिखाया।
इसी वजह से सारला महाभारत सिर्फ एक धार्मिक ग्रंथ नहीं है, बल्कि ओडिशा की पूरी संस्कृति और सोच को दिखाने वाला आईना बन जाता है।
इस ग्रंथ में ऐसी कथाएं हैं जो आपको सच में चौंका देंगी। पांडवों के वनवास के दौरान ओडिशा के जंगलों, नदियों और पहाड़ों का इतना जीवंत वर्णन मिलता है, जैसे कवि ने खुद अपनी आंखों से सब देखा हो। द्रौपदी के चीरहरण की घटना में भक्त और भगवान के बीच का जो अटूट रिश्ता दिखाया गया है, वो दिल को छू जाता है।लेकिन इन सब कहानियों में सबसे अलग, सबसे रहस्यमयी और सबसे गहरी कथा है नवगुंजर की।
Navagunjara Mahabharata – यह क्या है और कहाँ से आया
नवगुंजर शब्द को तोड़ें तो ‘नव’ मतलब नौ और ‘गुंजर’ मतलब जीव या प्राणी। यानी नवगुंजर ऐसा जीव है, जिसके शरीर में नौ अलग-अलग जानवरों के हिस्से होते हैं। ये कोई असली दुनिया में मिलने वाला जीव नहीं है, न ही किसी शास्त्र की लिस्ट में इसका नाम आता है। ये सिर्फ सारला महाभारत में पैदा हुआ, ओडिशा की कल्पना में पला-बढ़ा, और आज वहां की पेंटिंग्स में हमेशा के लिए बस गया है।
सारला दास ने जब ये कहानी लिखी, तो उन्होंने ऐसा सीन बनाया जो किसी भी आम इंसान को हिला दे। ये समय है कुरुक्षेत्र के युद्ध से ठीक पहले का। अर्जुन खुद को युद्ध के लिए तैयार कर रहे हैं। उनके अंदर एक योद्धा का जोश है, हाथ में गांडीव है, और इंद्र के बेटे होने का गर्व भी है।
इसी दौरान वो एक पहाड़ी इलाके में तपस्या करने जाते हैं। और वहीं उनका सामना उस अजीब और रहस्यमयी जीव से होता है, जिसे देखकर उनकी सारी समझ एक पल के लिए रुक सी जाती है।
नवगुंजर केवल एक काल्पनिक जीव नहीं है। यह उस सत्य का प्रतीक है जो हमें बताता है कि ईश्वर किसी एक रूप में नहीं बंधा। वह जहाँ चाहे, जैसे चाहे प्रकट हो सकता है।
नवगुंजर का शरीर — नौ अंगों का रहस्य
जब अर्जुन ने उस जीव को पहली बार देखा, तो उनकी नजर वहीं अटक गई। सामने खड़ा प्राणी ऐसा लग रहा था, जैसे प्रकृति ने अपने अलग-अलग रूप एक ही शरीर में जोड़ दिए हों।
जब अर्जुन ने उस जीव को पहली बार देखा, तो उनकी नजर वहीं अटक गई। सामने खड़ा प्राणी ऐसा लग रहा था, जैसे प्रकृति ने अपने अलग अलग रूप एक ही शरीर में जोड़ दिए हों।
उसका सिर मुर्गे का था, वैसी तेज नजर जो सूरज निकलने से पहले ही जाग जाती है, जो अंधेरे में भी रास्ता पहचान लेती है।उसकी गर्दन मोर की थी, हल्की इठलाती हुई, रंग बिरंगी और एकदम राजसी अंदाज में। उसे देखते ही मन खुश हो जाए।
उस जीव की कमर शेर जैसी थी। वह कमर जिसमें इतनी शक्ति है कि जंगल का राजा कहलाता है। उसकी पीठ पर ऊंट का कूबड़ था। ऊंट जो रेगिस्तान की तपती रेत पर भी बिना पानी के चलता रहता है, जो कठिनाइयों को मुस्कुराकर सह लेता है। उस कूबड़ को देखकर कोई भी सोच में पड़ जाए कि यह किस संसार का प्राणी है।
उसके चार पैर थे और हर पैर किसी अलग जीव का था। एक पैर हाथी का था, विशाल और ठोस, जो धरती पर इतनी मजबूती से टिका हो कि तूफान भी न हिला पाए। दूसरा पैर बाघ का था, तेज और पैना, जो एक छलांग में शिकार को थाम ले। तीसरा पैर घोड़े का था, जो थकान नहीं जानता, जो क्षितिज तक दौड़ता चला जाए। और चौथा पैर हिरण का था, हल्का और चपल, जो हवा से भी तेज हो जाए जब प्राण बचाने की बारी आए।
उसकी पूंछ एक सांप की थी। वह जहरीला सांप जो मृत्यु का प्रतीक भी है और अमृत का रक्षक भी। जो केंचुल उतारकर नया जन्म लेता है और जो शिवजी के गले में भी शोभा पाता है। वह पूंछ हिलती रहती थी, जैसे किसी अनदेखे खतरे से सावधान कर रही हो।
लेकिन इस सारी अद्भुत देह में जो सबसे अनोखी चीज थी वह थी उसका दाहिना हाथ। वह हाथ किसी पशु का नहीं था। वह एक मनुष्य का हाथ था जो कंधे से बाहर निकला हुआ था। और उस हाथ में था एक कमल का फूल, ताजा, खिला हुआ, जैसे अभी-अभी किसी सरोवर से तोड़ा गया हो।
अर्जुन और नवगुंजर का वह निर्णायक पल
जब अर्जुन की दृष्टि पहली बार उस जीव पर पड़ी तो उनके हाथ तुरंत धनुष की ओर गए। यही तो एक योद्धा की प्रवृत्ति होती है। अज्ञात को देखो, खतरा मानो, और हमला करो। अर्जुन कोई साधारण योद्धा नहीं थे। देवताओं ने जिन्हें अस्त्र दिए, जिन्होंने खांडव वन जलाया, जिनका गांडीव स्वयं इंद्र ने दिया था। ऐसे अर्जुन के लिए उस विचित्र प्राणी को देखकर प्रहार करना एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया थी।
उन्होंने बाण चढ़ाया। प्रत्यंचा खींची। निशाना साधा। और ठीक उसी क्षण उनकी नजर उस मनुष्य हाथ में थमे कमल के फूल पर पड़ी।
कमल। वह फूल जो कीचड़ में जन्म लेता है लेकिन उससे ऊपर उठ जाता है। वह फूल जो भगवान विष्णु के हाथ में रहता है, जो लक्ष्मी के चरणों में बिछा रहता है, जो पवित्रता का सबसे पुराना प्रतीक है। उस फूल को देखकर अर्जुन का हाथ थम गया। उनकी उंगलियों की पकड़ ढीली पड़ गई।
भीतर से एक आवाज आई। यह जीव जो भी है, यह हिंसक नहीं है। यह कमल लेकर खड़ा है। यह शांति का संदेश लेकर आया है। अर्जुन ने धनुष नीचे कर लिया और उस जीव को ध्यान से देखने लगे। और जितना देखते गए उतना ही उन पर यह बात स्पष्ट होती गई कि यह कोई राक्षस नहीं, यह तो स्वयं भगवान श्रीकृष्ण का एक अनोखा विराट स्वरूप है।
अर्जुन ने अपना गांडीव पृथ्वी पर रख दिया और दोनों हाथ जोड़कर उस नवगुंजर को प्रणाम किया। उनकी आँखें भर आईं। कितने वर्षों से वह अपने धनुष को ही सब कुछ मानते आए थे। कितने युद्धों में जीत की ललक ने उनकी बुद्धि पर परत जमा दी थी। आज उस कमल के फूल ने वह परत उतार दी।
Navagunjara Mahabharata – नौ अंगों का आध्यात्मिक रहस्य
सारला दास ने नवगुंजर की रचना करते समय कोई यादृच्छिक चुनाव नहीं किया। हर अंग एक विशेष संकेत देता है। अगर इन नौ अंगों को ध्यान से देखें तो पता चलता है कि इनमें जल, थल और नभ तीनों का प्रतिनिधित्व है।
मुर्गा और मोर आकाश से जुड़े प्राणी हैं। भले ही वे पूरी तरह उड़ नहीं सकते लेकिन उनका संबंध ऊर्ध्व जगत से है। सांप भूमि के भीतर की दुनिया का प्रतीक है, पाताल का जीव। शेर, हाथी, बाघ, घोड़ा, हिरण और ऊंट ये सब थल के प्राणी हैं। इस प्रकार नवगुंजर पूरे ब्रह्मांड को एक देह में समेटता है।
मुर्गे का सिर सतर्कता और दिशाबोध का प्रतीक है। मोर की गर्दन सौंदर्य और कला की पहचान है। शेर की कमर साहस और नेतृत्व का प्रतीक है। ऊंट का कूबड़ धैर्य और संसाधन संचय का संकेत है। हाथी का पैर स्थिरता और ज्ञान की जड़ों को दर्शाता है। बाघ का पैर निर्णय की तेजी और कार्यक्षमता को दिखाता है। घोड़े का पैर निरंतर प्रयास और गति का संदेश देता है। हिरण का पैर लचीलेपन और चपलता का प्रतीक है। सांप की पूंछ मृत्यु, पुनर्जन्म और रहस्य को दर्शाती है।
और वह मनुष्य हाथ जिसमें कमल है वह इन सब अंगों को एकता का सूत्र देता है। मनुष्य ही वह प्राणी है जो इन सबको समझ सकता है, इन सबसे सीख सकता है और इन सबको अपने भीतर समेट सकता है।
Navagunjara Mahabharata : पट्टचित्र में जीवित है नवगुंजर
ओडिशा की पट्टचित्र कला संसार की प्राचीनतम चित्रकला परंपराओं में से एक है। इस कला में कपड़े या ताड़ के पत्तों पर प्राकृतिक रंगों से चित्र बनाए जाते हैं। पुरी के जगन्नाथ मंदिर से लेकर राघवपुर के गांवों तक पट्टचित्र के कारीगर सदियों से यह परंपरा निभाते आए हैं।
इस कला में नवगुंजर का चित्रण एक अनिवार्य विषय माना जाता है। कारीगर जब नवगुंजर बनाते हैं तो उनके हाथ में एक खास जिम्मेदारी होती है। हर अंग को उसके वास्तविक प्राणी की तरह दिखाना, नौ अलग-अलग देहों को एक सुसंगत रूप में पिरोना और फिर उस दाहिने हाथ में कमल को इतनी सुंदरता से रखना कि देखने वाले का मन ठहर जाए। यह काम आसान नहीं है लेकिन पीढ़ी दर पीढ़ी यह कौशल हस्तांतरित होता रहा है।
आज जब आप पुरी या भुवनेश्वर के किसी बाजार में जाएं तो नवगुंजर की छवि आपको हर जगह मिलेगी। कपड़े पर, मिट्टी की मूर्तियों में, दीवारों के भित्तिचित्रों में। यह ओडिशा की पहचान का एक अटूट हिस्सा बन गया है।
जगन्नाथ परंपरा और नवगुंजर का गहरा रिश्ता
भगवान जगन्नाथ की उपासना परंपरा और सारला महाभारत के बीच एक बहुत गहरा संबंध है। जगन्नाथ स्वयं एक ऐसे देवता हैं जिनका स्वरूप किसी पारंपरिक मूर्ति जैसा नहीं है। उनकी काष्ठ प्रतिमा, वे गोल बड़ी आँखें, वे बिना स्पष्ट भुजाओं के विशाल हाथ, यह सब मिलकर एक ऐसे देवता की छवि बनाते हैं जो सभी रूपों से परे है।
सारला दास का नवगुंजर इसी दर्शन का विस्तार है। जगन्नाथ कहते हैं कि मैं किसी एक जाति, एक वर्ण, एक रूप में नहीं बंधा। और नवगुंजर दिखाता है कि ईश्वर नौ अलग-अलग प्राणियों में एक साथ विराजमान है। दोनों एक ही सत्य को अलग-अलग भाषा में कह रहे हैं।
ओडिशा में यह भी मान्यता है कि नवगुंजर के दर्शन अर्जुन को यह समझाने के लिए हुए थे कि आने वाले युद्ध में जो होगा वह केवल मनुष्यों की लड़ाई नहीं होगी। इसमें पूरी सृष्टि की शक्तियां हिस्सा लेंगी। और उन सबका संचालन करने वाला वही एक परम तत्व है जो नवगुंजर के रूप में प्रकट हुआ था।
Navagunjara Mahabharata : अर्जुन की परीक्षा का अर्थ क्या था
सारला महाभारत में यह प्रसंग केवल एक चमत्कारी घटना नहीं है। यह एक परीक्षा थी। अर्जुन के लिए, उनके अहंकार के लिए, उनके योद्धा-बोध के लिए।
अर्जुन पूरे जीवन यही मानते आए थे कि जो दिखे उसे पहचानो, जो खतरा लगे उसे नष्ट करो। उनका धनुष उनकी सबसे बड़ी पहचान था। लेकिन नवगुंजर ने उन्हें एक ऐसी स्थिति में डाल दिया जहाँ धनुष उठाना गलत था और धनुष न उठाना उनकी प्रवृत्ति के विरुद्ध था।
जब उन्होंने कमल देखा और रुक गए तो वह क्षण बहुत महत्वपूर्ण था। उन्होंने अपनी पुरानी आदत को उसी पल तोड़ा। उन्होंने पहले सोचा, फिर देखा, फिर समझा। यही तो ज्ञान का मार्ग है। आदत नहीं, विवेक।
कुरुक्षेत्र में जब वह द्रोणाचार्य और भीष्म पितामह को सामने देखकर धनुष छोड़ देते हैं तो वह क्षण भी इसी परीक्षा का विस्तार है। दोनों बार अर्जुन के सामने वही संकट आया, परिचित और अपरिचित के बीच का द्वंद्व। और दोनों बार भगवान ने उन्हें राह दिखाई।
Navagunjara Mahabharata : सारला महाभारत की वे बातें जो और कहीं नहीं मिलतीं
सारला महाभारत में केवल नवगुंजर नहीं है। इसमें अनगिनत ऐसे प्रसंग हैं जो पढ़ने वाले को चकित कर दें। उदाहरण के लिए इस ग्रंथ में कर्ण और अर्जुन के संवाद इतने विस्तृत और मार्मिक हैं कि पाठक की आँखें नम हो जाएं। यहाँ कर्ण केवल एक दुखी योद्धा नहीं हैं, वह एक ऐसे मनुष्य हैं जो जानते हुए भी अपना भाग्य नहीं बदल सकते।
इस ग्रंथ में चक्रव्यूह का वर्णन मूल महाभारत से कहीं अधिक विस्तृत है। अभिमन्यु का पराक्रम, उसकी माँ सुभद्रा का विलाप और अर्जुन की प्रतिज्ञा इन सबको सारला दास ने इतनी तीव्रता से लिखा है कि शब्द पढ़ते हुए वे दृश्य आँखों के सामने जीवंत हो उठते हैं।
पांडवों के स्वर्गारोहण का वर्णन भी यहाँ बिल्कुल अलग है। उनकी यात्रा के दौरान जो घटनाएं होती हैं, जो संवाद होते हैं वे पाठक को एक अलग ही लोक में ले जाते हैं। सारला दास ने मृत्यु और मोक्ष के विषय को भी उतनी ही सहजता से लिखा है जितनी सहजता से वह किसी युद्ध का वर्णन करते हैं।
नवगुंजर का संदेश आज भी उतना ही जरूरी है
पांच सौ साल बीत गए। दुनिया बदल गई। गाँव शहर बन गए, बैलगाड़ियाँ हवाई जहाज बन गईं। लेकिन मनुष्य का स्वभाव नहीं बदला। हम आज भी पहले दिखावट देखते हैं। जो अजीब लगे उसे दूर करना चाहते हैं। जो अपने जैसा न हो उसे स्वीकार करने में हिचकते हैं।
Navagunjara Mahabharata हमें बताता है कि विविधता एक कमजोरी नहीं है। नौ अलग-अलग प्राणियों के अंग मिलकर एक ऐसे जीव को बनाते हैं जो किसी एक अंग से कहीं अधिक शक्तिशाली है। ठीक वैसे ही जैसे हमारे समाज की अलग-अलग जातियाँ, धर्म, भाषाएं और परंपराएं मिलकर एक ऐसे राष्ट्र की रचना करती हैं जो अकेले किसी एक समुदाय से कहीं महान है।
अर्जुन का धनुष रखना यह भी सिखाता है कि शक्ति का उपयोग हमेशा सही नहीं होता। कभी-कभी रुकना, सोचना और फिर प्रणाम करना सबसे बड़ी वीरता होती है। आज जब दुनिया हर समस्या का समाधान हिंसा या टकराव में खोजती है तब नवगुंजर की यह कथा एक अलग रास्ता दिखाती है।
सारला दास — एक किसान जिसने इतिहास रच दिया
जब हम सारला दास के बारे में सोचते हैं तो एक बात बार-बार मन में आती है। इस व्यक्ति के पास कोई पद नहीं था, कोई राजाश्रय नहीं था, कोई विश्वविद्यालय की उपाधि नहीं थी। उनके पास था तो केवल अपनी माटी से प्रेम, अपनी भाषा पर विश्वास और अपने देवी-देवताओं के प्रति अटूट श्रद्धा।
उन्होंने जो लिखा वह आज भी ओडिशा के हर घर में जीवित है। उनकी रचना आज भी उत्सवों में गाई जाती है, पट्टचित्र में चित्रित की जाती है और मंदिरों में पाठ की जाती है। एक साधारण किसान का यह असाधारण योगदान हमें बताता है कि महान रचनाएं केवल महान लोग नहीं करते। महान रचनाएं वे करते हैं जिनका दिल सच्चा हो और जिनके शब्दों में जनमानस की पीड़ा और आनंद दोनों समाए हों।
उनकी लेखनी की एक और बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने किसी भी पात्र को पूरी तरह अच्छा या पूरी तरह बुरा नहीं बनाया। हर पात्र में एक इंसान है जो अपने हालात से लड़ रहा है। यही वह गुण है जो सारला महाभारत को एक धार्मिक ग्रंथ से आगे ले जाकर एक जीवन का दर्पण बना देता है।
आज की पीढ़ी को क्यों जाननी चाहिए यह कथा
आज हम एक ऐसे समय में जी रहे हैं जब हर चीज तेज है। खबरें तेज हैं, जिंदगी तेज है, फैसले तेज हैं। इस भागमभाग में हम अपनी उन जड़ों से कट जाते हैं जो हमें असल में मजबूत बनाती हैं। Navagunjara Mahabharata की यह कथा उन्हीं जड़ों की याद दिलाती है।
यह कथा बताती है कि ज्ञान केवल किताबों में नहीं है। यह प्रकृति में है, कला में है, उन कहानियों में है जो दादी-नानी के मुंह से सुनाई जाती थीं। नवगुंजर को देखकर जिस तरह अर्जुन रुके, उसी तरह हमें भी अपनी जड़ों को देखकर रुकने की जरूरत है। पहचानने की जरूरत है। और फिर उन्हें आगे ले जाने की जरूरत है।
सारला महाभारत केवल ओडिशा का गौरव नहीं है। यह पूरे भारत की उस अद्भुत रचनात्मक शक्ति का प्रमाण है जो हर क्षेत्र में, हर भाषा में अलग-अलग रंग लेकर प्रकट होती है। जिस दिन हम इन सब रंगों को पहचानेंगे और उनका सम्मान करेंगे उस दिन हम सच्चे अर्थों में एक सूत्र में बंध जाएंगे।
नवगुंजर के नौ अंग हमें यही तो सिखाते हैं। अलग-अलग होकर भी एक होना। अपने-अपने स्वभाव में रहते हुए भी एक विराट सत्य का हिस्सा होना। Navagunjara Mahabharata का यह दर्शन पाँच सौ साल पहले एक किसान कवि ने दिया था और आज भी यह उतना ही ताजा है जितना उस खिले हुए कमल का फूल जो नवगुंजर के हाथ में था।
Link : Lalita Jayanti 2026 : माँ ललिता त्रिपुरसुन्दरी की कथा




