Sant Ravidas ji

Sant Ravidas ji: भक्ति, समानता और मानवता के महान प्रवक्ता रविदास जी

Sant Ravidas ji: भारतीय संत परंपरा के दिव्य भक्तों और गुरु में एक नाम हमेशा गिना जाता हैं महान संत रविदास जी का जिन्होने भक्ति को मंदिरों और कर्मकांडो से बाहर निकलकर सीधे आम मनुष्य के ह्रदय से जोड़ दिया। भक्ति आंदोलन के एक प्रमुख स्तम्भ माने जानते हैं उन्होंने अपने जीवन और अमृतवाणी से समाज को प्रेम और सत्य का सन्देश दिया। रविदास जी का नाम एक ऐसे संत के रूप में नाम लिया जाता हैं जिसमे उन्होंने सामजिक उंच-नीच को चुनौती दी और लोगो को ईश्वर तक पहुंचने का मार्ग बताया।

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संत रविदास का जन्म और परिवार (Birth and Family of Sant Ravidas)

संत रविदास जी का जन्म 15वीं शताब्दी में वाराणसी के पास गोवर्धनपुर नाम के गांव में माना जाता हैं। हालाँकि की उनके जन्म वर्ष को लेकर मतभेद हैं लेकिन अधिकतर लोग सामान्य रूप से 1450 ईस्वी के आसपास के समय में स्वीकार करते हैं। उनके पिता संतोख दास और माता कलसा देवी थे। उनका परिवार चर्मकार समुदाय से सम्बंधित था और जूते बनाने का काम था। उस समय समाज में जातिगत विभाजन बहुत ही कठोर हुआ करता था और छोटी मानी जाने वाली जातियों को कभी कभी सामाजिक अधिकारों से वंचित रखने की बातें की जाती हैं।

ऐसे कठोर वातावरण में संत रविदासजी का जन्म और आगे चलकर उनका आध्यात्मिक उत्कर्षता समाज में क्रांति का संकेत थी।

बचपन से भक्ति की ओर झुकाव (Sant Ravidas’ Early Inclination Toward Devotion)

कहा जाता है कि संत रविदास जी का स्वभाव बचपन से ही बेहद शांत और दयालु था। दूसरे बच्चों की तरह केवल खेलकूद में मन लगाने के बजाय उन्हें साधु-संतों की संगति में बैठना अच्छा लगता था। जब भी कोई संत या फकीर उनके इलाके से गुजरता, वे बड़े मन से उनकी सेवा करते। यह भी माना जाता है कि वे अपने हाथ से बनाए जूते कई बार साधुओं को बिना किसी मूल्य के दे देते थे।

घर वाले चाहते थे कि वे पारिवारिक कामकाज पर ध्यान दें और कमाई में हाथ बँटाएँ, लेकिन उनका मन सांसारिक कामों से ज्यादा भक्ति और सेवा की ओर खिंचता था।

उनके बचपन की ये बातें बताती हैं कि भीतर की श्रद्धा और करुणा उम्र देखकर नहीं आती। भक्ति का अंकुर उनके मन में बहुत जल्दी फूट चुका था।

कर्म और पेशा नहीं छोड़ा (Sant Ravidas and His Commitment to His Profession)

संत रविदास जी की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने संत बनने के बाद भी अपना पैतृक व्यवसाय नहीं छोड़ा। वे जूते बनाने का काम करते रहे। उन्होंने यह संदेश दिया कि ईश्वर की भक्ति करने के लिए संसार त्यागना आवश्यक नहीं है। व्यक्ति अपने दैनिक कार्य करते हुए भी परमात्मा से जुड़ा रह सकता है।

उनका जीवन श्रम की गरिमा का जीवंत उदाहरण है। उन्होंने बताया कि कोई भी काम छोटा नहीं होता। यदि ईमानदारी और निष्ठा से किया जाए तो हर कार्य पूजा बन सकता है।

जाति व्यवस्था पर प्रहार (Sant Ravidas’ Challenge to the Caste System)

संत रविदास जी ने जातिगत भेदभाव का खुलकर विरोध किया। उन्होंने समाज में फैली ऊँच-नीच की भावना को आध्यात्मिक अज्ञान बताया। उनके पदों में बार-बार यह संदेश मिलता है कि मनुष्य की पहचान उसके कर्म से है, जन्म से नहीं।

उनका प्रसिद्ध कथन है:
“जाति जाति में जाति है, जो केतन के पात
रैदास मनुष न जुड़ सके, जब तक जाति न जात”

इस वाणी में वे समाज की उस विडंबना को उजागर करते हैं जहाँ मनुष्य ने स्वयं को अनेक खाँचों में बाँट लिया है। जब तक ये दीवारें गिरेंगी नहीं, सच्ची एकता संभव नहीं।

“मन चंगा तो कठौती में गंगा” का संदेश (Sant Ravidas and the Message of “Man Changa to Kathauti Mein Ganga”)

संत रविदास जी से जुड़ा एक अत्यंत प्रसिद्ध प्रसंग है। कहा जाता है कि एक बार कुछ लोगों ने उन्हें गंगा स्नान के लिए चलने को कहा। वे उस समय अपने काम में व्यस्त थे। उन्होंने उत्तर दिया कि यदि मन पवित्र है तो कठौती का जल भी गंगा के समान पवित्र है। इसी से यह उक्ति प्रचलित हुई:

“मन चंगा तो कठौती में गंगा”

यह वाक्य भक्ति का गहरा सिद्धांत समेटे है। बाहरी तीर्थ से अधिक महत्व आंतरिक पवित्रता का है। यदि मन स्वच्छ है, तो हर स्थान तीर्थ बन जाता है।

संतों और राजघरानों पर प्रभाव (Sant Ravidas’ Influence on Saints and Royal Families)

संत रविदास जी का प्रभाव समाज के हर वर्ग पर पड़ा। उनके भक्तों में सामान्य जन से लेकर राजघरानों तक के लोग शामिल थे। चित्तौड़ की रानी झालरानी उनकी शिष्या मानी जाती हैं। सबसे प्रसिद्ध नाम भक्त मीराबाई का है, जिन्होंने संत रविदास जी को अपना गुरु स्वीकार किया।

मीराबाई ने अपने पदों में गुरु रविदास का सम्मानपूर्वक उल्लेख किया है। एक राजघराने की महिला का उस समय एक चर्मकार संत को गुरु मानना सामाजिक दृष्टि से बहुत बड़ा संदेश था। इससे स्पष्ट होता है कि संत रविदास जी की आध्यात्मिक ऊँचाई जाति की सीमाओं से कहीं ऊपर थी।

सरल जीवन, ऊँचे विचार (Sant Ravidas’ Simple Living and High Thinking)

संत रविदास जी का जीवन अत्यंत सादा था। वे दिखावे से दूर रहते थे। उनके वस्त्र साधारण, भोजन सरल और व्यवहार विनम्र था। वे लोगों को उपदेश देने से अधिक अपने आचरण से प्रेरित करते थे। उनके पास जो भी आता, वे उसे प्रेम और सम्मान देते।

उनकी वाणी में कठोरता नहीं, स्पष्टता थी। वे विरोध भी करते थे तो करुणा के साथ। यही कारण है कि उनके विचार जन-जन तक पहुँचे और लोकजीवन में रच-बस गए।

लोकभाषा में आध्यात्मिक संदेश (Sant Ravidas’ Spiritual Teachings in the People’s Language)

संत रविदास जी ने अपनी वाणी लोकभाषा में दी। उन्होंने ऐसी भाषा का उपयोग किया जिसे आम लोग समझ सकें। इससे उनके पद और भजन सीधे जनता के हृदय तक पहुँचे। उनकी भाषा में गहराई भी है और सहजता भी।

उनकी वाणी केवल आध्यात्मिक नहीं, सामाजिक चेतना से भी भरी हुई है। वे भक्ति को जीवन से जोड़ते हैं, व्यवहार से जोड़ते हैं और मनुष्य के भीतर छिपी दिव्यता को जगाने का आह्वान करते हैं।

संत रविदास जी का जीवन इस सत्य का प्रमाण है कि भक्ति किसी विशेष वर्ग की संपत्ति नहीं, बल्कि हर उस हृदय का अधिकार है जो प्रेम, सत्य और समानता को स्वीकार करता है।

उपदेश, बेगमपुरा की कल्पना और आज के समय में प्रासंगिकता (Sant Ravidas’ Teachings, the Vision of Begumpura, and Modern Relevance)

संत रविदास जी केवल एक संत कवि नहीं थे, बल्कि सामाजिक और आध्यात्मिक चेतना के प्रखर जागरणकर्ता थे। उनकी वाणी में भक्ति की गहराई, समाज सुधार की स्पष्टता और मानवता की गरिमा का अद्भुत संगम मिलता है। उन्होंने ईश्वर को किसी एक रूप, जाति या स्थान तक सीमित नहीं माना, बल्कि उसे हर जीव में विद्यमान बताया। उनका दर्शन जीवन को भीतर से बदलने का आमंत्रण देता है।

संत रविदास जी निर्गुण भक्ति धारा के प्रमुख संतों में गिने जाते हैं। निर्गुण भक्ति का अर्थ है ऐसे ईश्वर की उपासना जो निराकार, अजन्मा और सर्वव्यापी है। उन्होंने बताया कि परमात्मा को पाने के लिए बाहरी आडंबर से अधिक आवश्यक है सच्चा हृदय, निष्कपट आचरण और प्रेम से भरा मन।

भक्ति का सरल और सार्वभौमिक मार्ग (Sant Ravidas and the Simple Universal Path of Devotion)

संत रविदास जी ने भक्ति को कठिन साधना नहीं माना। उनके अनुसार भक्ति कोई गूढ़ विद्या नहीं, बल्कि जीवन जीने की सही दिशा है। वे कहते हैं कि यदि मन में दया, सत्य और प्रेम है तो वही सच्ची पूजा है। उन्होंने बार-बार इस बात पर जोर दिया कि ईश्वर तक पहुँचने के लिए किसी विशेष वेश, जाति या विधि की आवश्यकता नहीं।

उनकी वाणी में एक पद आता है जिसमें वे बताते हैं कि परमात्मा दूर नहीं, हमारे भीतर ही है। मनुष्य बाहर खोजता है जबकि स्रोत भीतर बह रहा होता है। यह विचार लोगों को आत्मचिंतन और आंतरिक साधना की ओर प्रेरित करता है।

बेगमपुरा: एक आदर्श समाज की परिकल्पना (Sant Ravidas’ Vision of Begumpura as an Ideal Society)

संत रविदास जी की सबसे प्रसिद्ध कल्पनाओं में से एक है “बेगमपुरा”। बेगमपुरा का अर्थ है ऐसा नगर जहाँ कोई गम नहीं, कोई भय नहीं, कोई अन्याय नहीं। यह केवल आध्यात्मिक लोक नहीं, बल्कि एक सामाजिक आदर्श भी है।

उनका पद कहता है:
“बेगमपुरा शहर को नाऊ
दूख अंदोह नहीं तिहि ठाऊ”

बेगमपुरा में न कर का बोझ है, न जाति का भेद, न ऊँच-नीच की दीवारें। वहाँ सभी को समान अधिकार और सम्मान प्राप्त है। यह कल्पना उस समय के समाज के लिए अत्यंत क्रांतिकारी थी। जब चारों ओर भेदभाव और असमानता थी, तब एक संत समानता के नगर का स्वप्न गढ़ रहा था।

आज के लोकतांत्रिक और समानतावादी विचारों में भी बेगमपुरा की झलक देखी जा सकती है। यह दर्शाता है कि संत रविदास जी का सामाजिक दर्शन अपने समय से बहुत आगे था।

कर्म, चरित्र और सत्य पर बल (Sant Ravidas’ Emphasis on Action, Character, and Truth)

Sant Ravidas जी ने स्पष्ट कहा कि केवल जप, तप और पूजा से कुछ नहीं होता यदि व्यक्ति का आचरण शुद्ध नहीं है। वे कर्म और चरित्र को भक्ति का आधार मानते थे। उनका मानना था कि जो व्यक्ति दूसरों को दुख देता है, छल करता है या घमंड में जीता है, उसकी भक्ति अधूरी है।

उन्होंने जीवन में सत्य, ईमानदारी और सेवा को सबसे बड़ा धर्म बताया। उनके अनुसार मानव सेवा ही ईश्वर सेवा का वास्तविक रूप है। भूखे को भोजन, दुखी को सहारा और निर्बल को सम्मान देना ही सच्चा धार्मिक आचरण है।

पाखंड और दिखावे का विरोध (Sant Ravidas’ Opposition to Hypocrisy and Showmanship)

संत रविदास जी ने धार्मिक पाखंड और बाहरी दिखावे की कड़ी आलोचना की। वे कहते थे कि यदि मन में कपट भरा है तो माथे का तिलक और हाथ की माला केवल सजावट है। उन्होंने ऐसे साधुओं और धार्मिक नेताओं को भी चुनौती दी जो बाहरी रूप से धर्म का प्रदर्शन करते थे लेकिन आचरण से विपरीत होते थे।

उनकी वाणी सीधी और स्पष्ट थी। वे कठिन सत्य को भी सरल शब्दों में कह देते थे। यही कारण है कि उनकी बात आम जनता के मन में उतर जाती थी।

भाषा और काव्य की विशेषता (Sant Ravidas’ Language and Poetic Style)

संत रविदास जी की रचनाएँ लोकभाषा में हैं। उन्होंने ब्रज, अवधी और पूर्वी हिंदी के मिश्रण में पदों की रचना की। उनकी भाषा में सहजता है, इसलिए उनकी वाणी सीधे जनमानस से जुड़ती है। वे दार्शनिक विचारों को भी रोजमर्रा के प्रतीकों से समझाते हैं।

उनके पदों में करुणा, विनम्रता और गहरी आध्यात्मिक अनुभूति दिखाई देती है। वे उपदेश नहीं थोपते, बल्कि अनुभव साझा करते हैं।

गुरु ग्रंथ साहिब में संत रविदास जी (Sant Ravidas in the Guru Granth Sahib)

संत रविदास जी की महत्ता का एक बड़ा प्रमाण यह है कि उनकी वाणी सिख धर्म के पवित्र ग्रंथ गुरु ग्रंथ साहिब में संकलित है। इसमें उनके 40 से अधिक पद शामिल हैं। इससे स्पष्ट है कि उनकी भक्ति और विचारधारा संप्रदाय की सीमाओं से परे थी।

सिख परंपरा में भी उन्हें अत्यंत सम्मान प्राप्त है और उनकी वाणी को आध्यात्मिक मार्गदर्शन के रूप में पढ़ा और गाया जाता है।

संत रविदास जयंती और परंपरा (Sant Ravidas Jayanti and Traditions)

Sant Ravidas Jayanti माघ पूर्णिमा के दिन मनाई जाती है। इस अवसर पर उनके अनुयायी भजन-कीर्तन, शोभायात्रा और सत्संग का आयोजन करते हैं। वाराणसी स्थित उनकी जन्मस्थली पर विशेष कार्यक्रम होते हैं। लोग उनके पदों का पाठ करते हैं और उनके संदेशों को याद करते हैं।

यह उत्सव केवल श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि सामाजिक समानता और भाईचारे की भावना को मजबूत करने का अवसर भी होता है।

आधुनिक समय में प्रासंगिकता (Sant Ravidas’ Relevance in the Modern Age)

आज का समाज विज्ञान और तकनीक में आगे बढ़ चुका है, लेकिन सामाजिक स्तर पर भेदभाव, अहंकार और असमानता की समस्याएँ अभी भी मौजूद हैं। ऐसे समय में संत रविदास जी के विचार नई रोशनी देते हैं। उनका संदेश है कि मनुष्य को मनुष्य के रूप में देखो, किसी लेबल के रूप में नहीं।

उन्होंने सिखाया कि आत्मसम्मान, श्रम की गरिमा और समानता किसी भी स्वस्थ समाज की नींव हैं। उनका जीवन यह प्रेरणा देता है कि साधारण परिस्थितियों में जन्म लेकर भी व्यक्ति महान बन सकता है यदि उसके विचार ऊँचे और हृदय निर्मल हों।

Sant Ravidas ji की वाणी आज भी चेतना की घंटी की तरह बजती है। जो सुन ले, उसके भीतर की धूल धीरे-धीरे बैठने लगती है और मन का दर्पण साफ दिखने लगता है। उनके शब्द केवल पढ़ने के लिए नहीं, जीने के लिए हैं।

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