Nirjala Ekadashi Katha 2024 : निर्जला एकादशी व्रत कथा

By | April 13, 2024
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Nirjala Ekadashi Katha 2024 : इस वर्ष निर्जला एकदशी (Bhimsen Ekadashi) 18 जून 2024 को पड़ रही है। इसलिए आज हम आपको निर्जला एकादशी की कथा (Nirjala Gyaras Katha) बता रहे हैं, दोस्तों निर्जला एकादशी कथा का भी बहुत ही महत्व है। कृपया ध्यान से पढ़िए और हमें बताएं क्या आपको इस कथा से कुछ जानकारी हासिल हुई।

एकादशी माह में दो बार आती हैं एक कृष्ण पक्ष में और एक शुक्ल पक्ष में साल में 24 एकादशी या कहे 24 ग्यारस( Ekadashi Vrat 2024 Date List ) आती हैं। हर ग्यारस का अपना अलग महत्त्व होता हैं। भगवान शंकर का विशेष आशीर्वाद पाने के लिए शिवरात्रि पर पूजा और अर्चना की जाती हैं वैसे ही भगवान विष्णु से विशेष आशीर्वाद या कहे कृपा पाने के लिए ग्यारस पर पूजन व व्रत किया जाता हैं।

निर्जला ग्यारस की कथा Nirjala Gyaras ki Katha  निर्जला एकादशी की कथा Nirjala Ekadashi Katha

Nirjala Gyaras 2024 : निर्जला ग्यारस कब हैं ?

निर्जला ग्यारस का व्रत 18 जून 2024 को रखा जाएगानिर्जला एकादशी की तिथि, व्रत विधि और सावधानियाँ व्रत करने के पूर्व जान लेना चाहिए कियुकी कभी भी व्रत विधि पूर्वक पूरी श्रद्धा से करने पर ही भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं और भक्त को व्रत व पूजन का लाभ देते हैं। निर्जला ग्यारस की कथा( Nirjala Gyaras ki Katha ) या कहे निर्जला एकादशी की कथा (Nirjala Ekadashi Katha) का पाठ भी करना चाहिए।

निर्जला एकादशी की कथा (Nirjala Ekadashi Katha) निचे दी गयी हैं जरूर पढ़ें। निर्जला एकादशी की कथा (Nirjala Ekadashi Katha) में कुछ भी संकोच हो हमें कमेंट में जरूर पूछे हम पूरी जानकारी देने का प्रयास करेंगे।

निर्जला एकादशी की कथा : Nirjala Ekadashi Katha

महाभारत काल से एक कहानी निर्जला एकादशी की व्रत ( Nirjala Ekadashi Katha ) को लेकर बहुत ही प्रचलित है। एक बार वेदव्यास ने पांडवों को चारों पुरुषार्थ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष देने वाली एकादशी व्रत का संकल्प कराया था। 

तब वेदव्यासजी कहने लगे- कृष्ण और शुक्ल पक्ष की एकादशी में अन्न खाना वर्जित है। द्वादशी को  स्नान करके पवित्र होकर फूलों से भगवान केशव की पूजा करें। फिर पहले ब्राह्मणों को भोजन देकर अन्त में स्वयं भोजन करें। यह सुनकर भीमसेन बोले- परम बुद्धिमान पितामह! मेरी उत्तम बात सुनिए। राजा युधिष्ठिर, माता कुन्ती, द्रौपदी, अर्जुन, नकुल और सहदेव, ये एकादशी को कभी भोजन नहीं करते तथा मुझसे भी हमेशा यही कहते हैं कि भीमसेन एकादशी को तुम भी न खाया करो परन्तु मैं उन लोगों से यही कहता हूँ कि मुझसे भूख नहीं सही जाएगी।

भीमसेन की बात सुनकर व्यासजी ने कहा- यदि तुम नरक को दूषित समझते हो और तुम्हें स्वर्गलोक की प्राप्ति अभीष्ट है और तो दोनों पक्षों की एकादशियों के दिन भोजन नहीं करना।

भीमसेन बोले महाबुद्धिमान पितामह! मैं आपके सामने सच कहता हूँ। मुझसे एक बार भोजन करके भी व्रत नहीं किया जा सकता, तो फिर उपवास करके मैं कैसे रह सकता हूँ। मेरे उदर में वृक नामक अग्नि सदा प्रज्वलित रहती है, अत: जब मैं बहुत अधिक खाता हूँ, तभी यह शांत होती है। इसलिए महामुनि ! मैं पूरे वर्षभर में केवल एक ही उपवास कर सकता हूँ। जिससे स्वर्ग की प्राप्ति सुलभ हो तथा जिसके करने से मैं कल्याण का भागी हो सकूँ, ऐसा कोई एक व्रत निश्चय करके बताइये। मैं उसका यथोचित रूप से पालन करुँगा।

व्यासजी ने कहा- भीम! ज्येष्ठ मास में सूर्य वृष राशि पर हो या मिथुन राशि पर, शुक्लपक्ष में जो एकादशी हो, उसका यत्नपूर्वक निर्जल व्रत करो। केवल कुल्ला या आचमन करने के लिए मुख में जल डाल सकते हो, उसको छोड़कर किसी प्रकार का जल विद्वान् पुरुष मुख में न डालें, अन्यथा व्रत भंग हो जाता है।

एकादशी को सूर्योदय से लेकर दूसरे दिन के सूर्योदय तक मनुष्य जल का त्याग करे तो यह व्रत पूर्ण होता है। इसके बाद द्वादशी को प्रभातकाल में स्नान करके ब्राह्मणों को विधिपूर्वक जल और सुवर्ण का दान करे। इस प्रकार सब कार्य पूरा करके जितेन्द्रिय पुरुष ब्राह्मणों के साथ भोजन करें। वर्षभर में जितनी एकादशियां होती हैं, उन सबका फल इस निर्जला एकादशी  से मनुष्य प्राप्त कर लेता है, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है। शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान केशव ने मुझसे कहा था कि ‘यदि मानव सबको छोड़कर एकमात्र मेरी शरण में आ जाय और एकादशी को निराहार रहे तो वह सब पापों से छूट जाता है।”

आगे पढ़े : सम्पूर्ण निर्जला एकादशी की कथा (Nirjala Ekadashi Katha)

कुन्तीनन्दन! निर्जला एकादशी के दिन श्रद्धालु स्त्री पुरुषों के लिए जो विशेष दान और कर्त्तव्य विहित हैं, उन्हें सुनो। उस दिन जल में शयन करने वाले भगवान विष्णु का पूजन और जलमयी धेनु यानी पानी में खड़ी गाय का दान करना चाहिए, सामान्य गाय या घी से बनी गाय का दान भी किया जा सकता है। इस दिन दक्षिणा और कई तरह की मिठाइयों से ब्राह्मणों को सन्तुष्ट करना चाहिए। उनके संतुष्ट होने पर श्रीहरि मोक्ष प्रदान करते हैं। 

जिन्होंने श्रीहरि की पूजा और रात्रि में जागरण करते हुए इस निर्जला एकादशी का व्रत किया है, उन्होंने अपने साथ ही बीती हुई सौ पीढ़ियों को और आने वाली सौ पीढ़ियों को भगवान वासुदेव के परम धाम में पहुँचा दिया है। निर्जला एकादशी के दिन अन्न, वस्त्र, गौ, जल, शैय्या, सुन्दर आसन, कमण्डलु तथा छाता दान करने चाहिए। जो श्रेष्ठ तथा सुपात्र ब्राह्मण को जूता दान करता है, वह सोने के विमान पर बैठकर स्वर्गलोक में प्रतिष्ठित होता है।

जो इस एकादशी की महिमा को भक्तिपूर्वक सुनता अथवा उसका वर्णन करता है, वह स्वर्गलोक में जाता है। चतुर्दशीयुक्त अमावस्या को सूर्यग्रहण के समय श्राद्ध करके मनुष्य जिस फल को प्राप्त करता है, वही फल इस कथा को सुनने से भी मिलता है। 

भीमसेन! ज्येष्ठ मास में शुक्ल पक्ष की जो शुभ एकादशी होती है, उसका निर्जल व्रत करना चाहिए। उस दिन श्रेष्ठ ब्राह्मणों को शक्कर के साथ जल के घड़े दान करने चाहिए। ऐसा करने से मनुष्य भगवान विष्णु के समीप पहुँचकर आनन्द का अनुभव करता है। इसके बाद द्वादशी को ब्राह्मण भोजन कराने के बाद स्वयं भोजन करे। जो इस प्रकार पूर्ण रूप से पापनाशिनी एकादशी का व्रत करता है, वह सब पापों से मुक्त हो आनंदमय पद को प्राप्त होता है। यह सुनकर भीमसेन ने भी इस शुभ एकादशी का व्रत आरम्भ कर दिया। 

दोस्तों, आशा है आप भी यह निर्जला एकादशी की कथा (Nirjala Ekadashi Katha) पढ़ कर भीमसेनी एकादशी का व्रत( Bhimsen Ekadashi Vrat ) करने की इच्छा जरूर जाग्रत होगी होगी। यदि हुई हैं तो हमें कमेंट में जरूर बताये आपसे एक और निवेदन है आपको निर्जला एकादशी की कथा (Nirjala Ekadashi Katha) अपने दोस्तों और परिवार में जरूर शेयर करें ताकि वे भी निर्जला एकादशी कर के भगवान विष्णु कि कृपा प्राप्त करें।

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