Bhuvaneshwari

10 महाविद्या : जानें Maa Bhuvaneshwari का इतिहास, पौराणिक कथाएं, मंत्र, साधना, पूजा विधि, प्रसिद्ध मंदिर और मणिद्वीप का रहस्य।

मां Bhuvaneshwari का रहस्यमयी स्वरूप, मणिद्वीप का वर्णन, पौराणिक कथाएं, बीज मंत्र, पूजा-विधि, साधना और प्रमुख मंदिरों की प्रामाणिक जानकारी सरल भाषा में पढ़ें।
हिंदू धर्म में देवी मां की पूजा करने वाले शाक्त संप्रदाय में मां शक्ति को ही इस पूरे ब्रह्मांड को बनाने वाली, इसे चलाने वाली और सबसे बड़ी ताकत माना गया है।

इसकी पूरी जानकारी हमें मुख्य रूप से ‘श्रीमद् देवी भागवत महापुराण’ से मिलती है, जिसकी रचना महर्षि वेदव्यास ने की थी। इस महापुराण में कुल 12 स्कंध, 318 अध्याय और 18000 श्लोक शामिल हैं। इसी महान ग्रंथ और प्राचीन तंत्र शास्त्रों में दस महाविद्याओं का वर्णन मिलता है, जिनमें चौथे स्थान पर मां Bhuvaneshwari विराजमान हैं।

शब्द “Bhuvaneshwari” दो मुख्य संस्कृत शब्दों के मेल से बना है: “भुवन” और “ईश्वरी”। “भुवन” का सरल अर्थ है तीनों लोक (पृथ्वी, अंतरिक्ष और स्वर्ग), और “ईश्वरी” का अर्थ है मालकिन या शासन करने वाली रानी। इस प्रकार मां Bhuvaneshwari का सीधा अर्थ “संपूर्ण ब्रह्मांड की परम महारानी” या “जगत की माता” है।

वे केवल एक पौराणिक देवी नहीं हैं, बल्कि वे असीम आकाश तत्व का रूप मानी जाती हैं। जिस प्रकार खुला आसमान अपने भीतर सभी तारों, ग्रहों और जीवों को बिना किसी हलचल के थामे रखता है, ठीक वैसे ही मां Bhuvaneshwari भी इस समस्त चराचर जगत को अपनी गोद में धारण करती हैं।

Table of Contents

मां Bhuvaneshwari का दिव्य स्वरूप और प्रतीकात्मक महत्व

मां Bhuvaneshwari का स्वरूप अत्यंत सुंदर, शांत और मन को शांति देने वाला है। जहां महाविद्या परंपरा में मां काली या मां छिन्नमस्ता जैसी देवियों के स्वरूप अत्यंत उग्र और डरावने हैं, वहीं मां Bhuvaneshwari का स्वरूप ममतामयी, शांत और पूरी तरह ममता से भरा हुआ है। उनके इस सौम्य रूप में कई ऐसे प्रतीक छिपे हैं जो जीवन जीने की कला और ब्रह्मांडीय रहस्यों को उजागर करते हैं

तालिका 1: मां Bhuvaneshwari के स्वरूप का आध्यात्मिक महत्व

स्वरूप का अंगभौतिक विवरणगहरा आध्यात्मिक रहस्य और महत्व
शरीर का रंगउगते हुए सूरज जैसा चमकदार लालयह जीवन की असली ताकत, नई ऊर्जा और दुनिया को बनाने वाली शक्ति को दिखाता है।
तीन नेत्रचेहरे पर सुंदर तीन आंखेंयह बीते हुए समय, आज के समय और आने वाले कल के पूरे ज्ञान को दिखाता है।
आधे चांद का मुकुटसिर पर सजा हुआ आधा चांदयह समय के बदलावों और मन की चंचलता को काबू में रखने का इशारा है
पाशएक हाथ में पकड़ा हुआ फंदायह मां के प्रेम का वो फंदा है जो भक्तों को दुनिया की बुराइयों से खींचकर उनके पास लाता है
अंकुशदूसरे हाथ में पकड़ा हुआ तीखा अंकुशयह इंसान के भीतर के अज्ञान, गुस्से और बुरे विचारों को काबू में रखने का प्रतीक है
अभय और वरद मुद्राबाकी दोनों हाथ आशीर्वाद देते हुएयह भक्तों को हर डर से बचाने और उनकी सभी इच्छाओं को पूरा करने का संकेत है
कमल का सिंहासनखिले हुए कमल के फूल पर बैठनायह सिखाता है कि जैसे कमल कीचड़ में रहकर भी साफ रहता है, वैसे ही हमें भी दुनिया के दुखों के बीच पवित्र रहना चाहिए
रत्नों का पात्रपैर के पास रखा रत्नों का घड़ायह दिखाता है कि मां इस दुनिया के सारे धन-दौलत और सुख-सुविधाओं की अकेली मालकिन हैं

मां Bhuvaneshwari के प्राकट्य और लीलाओं की प्रामाणिक पौराणिक कहानियां (विस्तार से)

शास्त्रों और स्थापित धार्मिक ग्रंथों में मां Bhuvaneshwari की महिमा को उजागर करने वाली कई अनूठी कहानियां मिलती हैं। ये कहानियां यह स्पष्ट करती हैं कि सच्ची शक्ति केवल हथियारों या युद्ध से नहीं, बल्कि शांति, बुद्धिमत्ता और करुणा से संसार का संचालन करने में निहित है

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कहानी 1: ब्रह्मांड के निर्माण की कहानी और मां Bhuvaneshwari का प्राकट्य

सृष्टि के निर्माण की शुरुआत की यह कहानी अत्यंत महत्वपूर्ण है और ब्रह्मांड की उत्पत्ति का आधार है। तांत्रिक मान्यताओं के अनुसार, जब सृष्टि के निर्माण से पहले चारों तरफ केवल गहरा अंधकार छाया हुआ था, तब ऋषियों ने सूर्य देव की घोर आराधना की। सूर्य देव को सृष्टि की रचना करने की प्रेरणा और ऊर्जा मां त्रिपुर सुंदरी से प्राप्त हुई थी।

जब सूर्य देव ने तीनों लोकों (पृथ्वी, अंतरिक्ष और स्वर्ग) की स्थापना की, तब उन लोकों का पोषण करने और उन पर शासन करने के लिए मां त्रिपुर सुंदरी ने एक बहुत ही शांत और ममतामयी स्वरूप धारण किया। उनका यही रूप मां Bhuvaneshwari कहलाया, जो पूरे ब्रह्मांड की रक्षक और संचालिका बनीं।

शास्त्रीय संदर्भ:

  • मुख्य स्रोत: यह कथा मुख्य रूप से तांत्रिक परंपराओं (जैसे शारदा तिलक) की व्याख्याओं पर आधारित है।
  • पुराण संबंध: श्रीमद् देवी भागवत महापुराण के तीसरे स्कंध के अध्याय 30 में देवी के विराट स्वरूप और सृष्टि संचालन की शक्ति का विस्तार से वर्णन है, जो इस कथा का आधार माना जाता है।

कहानी 2: त्रिदेवों का मणिद्वीप जाना और माता की सर्वोच्च शक्ति का बोध

सृष्टि के आरंभिक काल में भगवान ब्रह्मा, भगवान विष्णु और भगवान शिव (त्रिदेव) के बीच इस बात पर विवाद खड़ा हो गया कि उन तीनों में से सबसे शक्तिशाली कौन है। जब उनका यह विवाद बढ़ने लगा, तो उनके सामने एक अत्यंत चमकीला रथ आकर रुका। जैसे ही त्रिदेव उस रथ पर बैठे, वह उन्हें उड़ाकर इस भौतिक ब्रह्मांड से बहुत दूर एक रहस्यमयी स्थान पर ले गया। वह स्थान रत्नों से बना एक सुंदर द्वीप था जो अमृत के सागर से घिरा हुआ था। वहां पहुंचते ही त्रिदेवों के शरीर स्त्रियों में बदल गए

मणिद्वीप के भीतर चिंतामणि गृह में उन्होंने साक्षात आदि पराशक्ति मां Bhuvaneshwari को विराजमान देखा। मां के इस परम रूप को देखकर त्रिदेवों का अहंकार पूरी तरह से टूट गया और उन्हें समझ आया कि उनकी अपनी शक्तियां वास्तव में इसी परम जननी से आती हैं

शास्त्रीय संदर्भ:

  • मुख्य स्रोत: श्रीमद् देवी भागवत महापुराण – स्कंध 3, अध्याय 3 और 4 (त्रिदेवों का मणिद्वीप गमन और देवी दर्शन)।

कहानी 3: राजकुमार सुदर्शन और ‘ह्रीं’ बीज मंत्र की महिमा

अयोध्या के राजा ध्रुवसंधि के निधन के बाद राजा बनने के लिए युद्ध छिड़ गया। लीलावती के पिता राजा युधाजित ने छल से मनोरमा के पुत्र सुदर्शन को मारने की योजना बनाई। अपनी जान बचाने के लिए मनोरमा अपने नन्हें पुत्र सुदर्शन के साथ भारद्वाज ऋषि के आश्रम में वन में छिप गई

एक दिन आश्रम में एक बालक ने दूसरे बालक को चिढ़ाते हुए ‘क्लीब’ (जिसका अर्थ कमजोर होता है) कहा। सुदर्शन ने इस शब्द के पहले अक्षर ‘क्लीं’ और ‘ह्रीं’ की ध्वनि को सुन लिया। उसने इस दिव्य ध्वनि को माँ Bhuvaneshwari का बीज मंत्र समझकर बिना किसी औपचारिक गुरु के ही निरंतर जपना शुरू कर दिया। उसकी इस निश्छल साधना से प्रसन्न होकर मां भुवनेश्वरी सिंह पर सवार होकर प्रकट हुईं। उन्होंने सुदर्शन को अपना अभय वरदान दिया और एक दिव्य धनुष-बाण प्रदान किया, जिसकी मदद से सुदर्शन ने विरोधियों को परास्त कर अपना राज्य वापस पाया

शास्त्रीय संदर्भ:

  • मुख्य स्रोत: श्रीमद् देवी भागवत महापुराण – स्कंध 3, अध्याय 18 से 25 (राजकुमार सुदर्शन की पूरी कथा और ह्रीं मंत्र की महिमा)।

कहानी 4: मधु-कैटभ का वध और महामाया की शक्ति

जब संपूर्ण सृष्टि प्रलय काल में डूबी हुई थी और भगवान विष्णु गहरी नींद (योगनिद्रा) में थे, तब उनके कान के मैल से मधु और कैटभ नाम के दो बलशाली राक्षस पैदा हुए। इन असुरों ने ब्रह्मा जी को मारने का प्रयास किया। ब्रह्मा जी ने घबराकर भगवान विष्णु की आंखों और हृदय में निवास करने वाली आदि शक्ति योगनिद्रा (मां Bhuvaneshwari) की स्तुति की

प्रार्थना सुनकर मां Bhuvaneshwari भगवान विष्णु के शरीर से बाहर प्रकट हुईं, जिससे भगवान विष्णु की निद्रा टूटी। विष्णु जी और उन राक्षसों के बीच 5000 वर्षों तक घोर युद्ध चला। अंत में मां भुवनेश्वरी ने अपनी महामाया से उन राक्षसों को काम और अहंकार से अंधा कर दिया। घमंड में आकर असुरों ने विष्णु जी से कहा कि वे उनसे कोई भी वरदान मांग लें। विष्णु जी ने चतुराई से उनकी ही मृत्यु मांग ली और इस प्रकार सृष्टि की रक्षा हुई

शास्त्रीय संदर्भ:

  • मुख्य स्रोत: श्रीमद् देवी भागवत महापुराण – स्कंध 1, अध्याय 6 से 9 (मधु-कैटभ वध की विस्तृत कथा)।

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कहानी 5: देवराज इंद्र का अहंकार, राजा नहुष का पतन और रानी शची की रक्षा

एक बार देवराज इंद्र ने क्रोध में आकर त्वष्टा ऋषि के पुत्र विश्वरूप का वध कर दिया। इससे दुखी होकर ऋषि ने इंद्र से बदला लेने के लिए शक्तिशाली असुर वृत्रासुर को पैदा किया। इंद्र ने वृत्रासुर का वध तो कर दिया, लेकिन उन पर “ब्रह्महत्या” का भयानक पाप चढ़ गया। इस पाप के डर से इंद्र स्वर्ग छोड़कर भाग गए और मानसरोवर झील के एक छोटे से कमल के डंठल के भीतर 1000 वर्षों के लिए छिप गए

उनके अभाव में पृथ्वी के राजा नहुष को स्वर्ग का राजा बनाया गया। लेकिन असीम अधिकार पाकर नहुष अहंकारी हो गया और उसने इंद्र की पत्नी रानी शची को पाने की इच्छा जताई। दुखी शची ने मां Bhuvaneshwari की शरण ली। मां ने शची को एक बुद्धिमान योजना बताई

शची ने नहुष से कहा कि वह उससे विवाह करेगी, बशर्ते नहुष ऐसी पालकी में बैठकर आए जिसे सप्तर्षि (सात महान ऋषि) अपने कंधों पर उठाएं। नहुष ने ऐसा ही किया, लेकिन पालकी में बैठकर वह ऋषियों की धीमी गति से चिढ़ गया। उसने गुस्से में आकर ऋषि अगस्त्य को लात मार दी। ऋषि अगस्त्य ने नहुष को तुरंत अजगर बनने का श्राप दे दिया, जिससे नहुष का पतन हो गया और बिना किसी युद्ध के स्वर्ग की रक्षा हुई

शास्त्रीय संदर्भ:

  • मुख्य स्रोत: श्रीमद् देवी भागवत महापुराण – स्कंध 6, अध्याय 8 और 9 (इंद्र का पलायन, नहुष का पतन और शची की प्रार्थना)।

कहानी 6: शताक्षी और शाकंभरी अवतार की कथा

जब दुर्गमासुर नाम के असुर ने चारों वेदों को चुराकर छिपा दिया, तो पृथ्वी पर धर्म का लोप हो गया और लगातार 100 वर्षों तक अकाल पड़ गया। नदियां सूख गईं और लोग भूख-प्यास से मरने लगे। तब देवताओं ने हिमालय पर मां Bhuvaneshwari की स्तुति की। मां ने प्रकट होकर जब संसार की यह हालत देखी, तो उनका हृदय करुणा से भर गया और उनकी आंखों से लगातार आंसुओं की धारा बहने लगी

इन आंसुओं से पूरी पृथ्वी पर फिर से जल भर गया और उन्हें “शताक्षी” कहा गया। इसके बाद मां ने अपने शरीर से उत्पन्न विभिन्न प्रकार की हरी सब्जियां और अनाज लेकर सभी भूखे लोगों को भोजन दिया, जिससे उनका नाम “शाकंभरी” पड़ा। अंत में मां ने दुर्गमासुर का वध किया और वेदों को वापस दिलाया, जिसके बाद वे “दुर्गा” नाम से प्रसिद्ध हुईं

शास्त्रीय संदर्भ:

  • मुख्य स्रोत: श्रीमद् देवी भागवत महापुराण – स्कंध 7, अध्याय 28 (शताक्षी और शाकंभरी चरित्र का वर्णन)।

मां Bhuvaneshwari का परम धाम: मणिद्वीप का अद्भुत और रहस्यमयी स्वरूप

श्रीमद् देवी भागवत महापुराण के अनुसार, मां Bhuvaneshwari का दिव्य निवास स्थान “मणिद्वीप” कहलाता है। यह स्थान कैलाश, वैकुंठ और गोलोक से भी श्रेष्ठ और सर्वोच्च माना गया है, जिसे “सर्वलोक” भी कहा जाता है

मणिद्वीप की वास्तविक रचना और उसके रहस्य इस प्रकार हैं:

  • अठारह (18) सुरक्षा परकोटे: मणिद्वीप चारों ओर से असीम अमृत सागर से घिरा हुआ है। इसके भीतर सुरक्षा के लिए धातुओं और बहुमूल्य रत्नों के 18 अलग-अलग विशाल परकोटे बने हुए हैं। इनमें क्रमशः लोहा, कांस्य, पीतल, तांबा, सीसा, रांगा, चांदी, सोना जैसी धातुओं की दीवारें हैं। इनके बाद पुखराज, पद्मराग, गोमेद, हीरा, वैदुर्य, इंद्रनील, पन्ना, मूंगा, माणिक्य और अंत में नवरत्नों का परकोटा आता है।
  • शाश्वत ऋतुएं और कल्पवृक्ष: इन परकोटों के भीतर कल्पवृक्षों के वन हैं, जहाँ हमेशा वसंत, वर्षा और शरद जैसी ऋतुएं अपने साक्षात रूप में निवास करती हैं। यहाँ के फूलों की सुगंध कई योजनों तक फैलती है।
  • चिंतामणि गृह और सिंहासन: मणिद्वीप के सबसे केंद्र में “चिंतामणि गृह” स्थित है, जिसके भीतर मां भुवनेश्वरी का परम सिंहासन है। इस सिंहासन के चार पैर भगवान ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र और ईश्वर हैं, जबकि इसका मुख्य फलक सदाशिव हैं। इस सिंहासन की 10 सीढ़ियां साक्षात दस महाविद्याओं का प्रतिनिधित्व करती हैं।

शास्त्रीय संदर्भ:

  • मुख्य स्रोत: श्रीमद् देवी भागवत महापुराण – स्कंध 12, अध्याय 10, 11 और 12 (मणिद्वीप का संपूर्ण भौगोलिक और आध्यात्मिक वर्णन)।

मां Bhuvaneshwari के प्रसिद्ध ऐतिहासिक और जागृत मंदिर

भारत और विदेशों में मां Bhuvaneshwari के कई ऐतिहासिक और स्थापित मंदिर स्थित हैं, जिनका अपना एक प्रामाणिक इतिहास है

तालिका 2: मां Bhuvaneshwari के विश्व प्रसिद्ध मंदिर

मंदिर का नामभौगोलिक स्थिति (स्थान)ऐतिहासिक काल / संस्थापकमुख्य ऐतिहासिक और प्रामाणिक विशेषता
श्री भुवनेश्वरी पीठगोंडल, राजकोट जिला, गुजरातवर्ष 1946 (राजवैद्य आचार्य चरण तीर्थ)मंगला और संध्या आरती के समय मां की मूर्ति के ऊपर लगा भारी छत्र अपने आप डोलने लगता है
भुवनेश्वरी देवी मंदिरभुवनागिरी, सिद्धपुर, कर्नाटकवर्ष 1692 (बिलागी राजवंश के राजा बसवेंद्र)कर्नाटक की राज्य देवी (कन्नड़ माते) के रूप में पूजनीय, 300 फीट ऊंची पहाड़ी पर स्थित
नैनातिवु नागपूषणीनैनातिवु द्वीप, जाफना, श्रीलंकाअति प्राचीन काल (ऐतिहासिक शक्तिपीठ)51 शक्तिपीठों में से एक, जहाँ देवी सती की पायल गिरी थी। रावण की 10 सिरों वाली प्रतिमा यहाँ स्थित है
श्री भुवनेश्वरी मंदिरसौटरपेट, मंगलुरु, कर्नाटकवर्ष 2007 (श्री प्रवीण मत्स्येंद्रनाथ बाबा)गोरखनाथ जी के शिष्य द्वारा स्थापित प्राचीन शिला के ऊपर निर्मित, गर्भगृह के ऊपर त्रि-आयामी श्री चक्र है
टेल्को भुवनेश्वरी मंदिरजमशेदपुर, झारखंडवर्ष 1978 (स्वामी रंगराजन)द्रविड़ स्थापत्य शैली का उदाहरण, 64 फीट ऊंचा पांच मंजिला राजगोपुरम
भुवनेश्वरी मंदिरउदयपुर, त्रिपुरा17वीं शताब्दी (महाराजा गोविंद माणिक्य)रवींद्रनाथ टैगोर के नाटक ‘विसर्जन’ और उपन्यास ‘राजर्षि’ में अमर। नरबलि की प्रथा को यहाँ राजा ने कानूनन बंद करवाया था
भुवनेश्वरी मंदिरगुवाहाटी, असमप्राचीन कालकामाख्या देवी मंदिर से 1 किलोमीटर ऊंचाई पर नीलाचल पहाड़ी पर स्थित, ब्रह्मपुत्र का सुंदर दृश्य

मां Bhuvaneshwari की साधना, विस्तृत पूजा विधि और ज्योतिषीय महत्व

शास्त्रों के अनुसार मां Bhuvaneshwari की पूजा मनुष्य को भौतिक समृद्धि के साथ-साथ मोक्ष भी प्रदान करती है। ऐसी मान्यता है कि यदि कोई साधक अपने घर पर इस पूजा को विधि-विधान से करता है, तो उसके घर की नकारात्मक ऊर्जाएं समाप्त हो जाती हैं

पूजा की आवश्यक तैयारी और सामग्री

पूजा शुरू करने से पहले पूजा स्थान को पूरी तरह साफ करें। लकड़ी की एक चौकी पर लाल या पीले रंग का सूती कपड़ा बिछाएं। चौकी के ऊपर मां Bhuvaneshwari का चित्र, प्रतिमा या सिद्ध Bhuvaneshwari यंत्र स्थापित करें। पूजा सामग्री में रोली, अक्षत, हल्दी, ताजे लाल फूल, धूपबत्ती, शुद्ध घी का दीपक, कपूर, ताजे फल, दूध से बनी मिठाई या घी की खीर अवश्य रखें

न्यास और पवित्रीकरण की विधि

साधना शुरू करने से पहले ऋष्यादि न्यास और करन्यास करना अत्यंत आवश्यक माना जाता है, जिससे साधक के शरीर में देवी की दिव्य ऊर्जा का प्रवाह सुचारू रूप से हो सके

  • ऋष्यादि न्यास:
    • सदाशिव ऋषये नमः – सिर पर स्पर्श करें।
    • त्रिष्टुप छन्दसे नमः – मुख पर स्पर्श करें।
    • श्री भुवनेश्वरी देवतायै नमः – हृदय पर स्पर्श करें।
    • ह्रीं बीजाय नमः – गुह्य स्थान पर स्पर्श करें।
    • ऐं शक्तये नमः – दोनों पैरों पर स्पर्श करें।
    • श्रीं कीलकाय नमः – नाभि पर स्पर्श करें।
  • करन्यास:
    • ॐ ह्रां अंगुष्ठाभ्यां नमः – दोनों अंगूठों को स्पर्श करें।
    • ॐ ह्रीं तर्जनीभ्यां नमः – तर्जनी उंगलियों को स्पर्श करें।
    • ॐ हूं मध्यमाभ्यां नमः – मध्यमा उंगलियों को स्पर्श करें।
    • ॐ हैं अनामिकाभ्यां नमः – अनामिका उंगलियों को स्पर्श करें।
    • ॐ ह्रौं कनिष्ठिकाभ्यां नमः – कनिष्ठिका उंगलियों को स्पर्श करें।
    • ॐ ह्रः करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः – हथेलियों के आगे और पीछे के हिस्से को स्पर्श करें।

राशि अनुसार मां Bhuvaneshwari के मंत्र और हवन विधि

ज्योतिष शास्त्र में मां Bhuvaneshwari को चंद्रमा और शुक्र ग्रह की नियंत्रक देवी माना गया है। ऐसी मान्यता है कि यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में मानसिक तनाव, धन की कमी या पारिवारिक कलह की समस्या हो, तो वे अपनी राशि के अनुसार मां के मंत्रों का जाप कर सकते हैं

तालिका 3: राशि अनुसार मंत्र और हवन सामग्री

राशिअनुशंसित मंत्रहवन की समिधा / सामग्रीज्योतिषीय और व्यावहारिक लाभ (धार्मिक मान्यतानुसार)
मेष“ॐ ह्रीं भुवनेश्वर्ये नमः”पीपल की समिधाऐसी मान्यता है कि जीवन में आ रही रुकावटें दूर होती हैं
वृष“ॐ ह्रीं भुवनेश्वर्ये नमः”दूध और चावल से बनी खीरमाना जाता है कि आर्थिक संकट दूर होने में मदद मिलती है
मिथुन“ॐ ह्रीं भुवनेश्वर्ये नमः”ब्राह्मी और घी का मिश्रणविश्वास है कि इससे बुद्धि और एकाग्रता का विकास होता है
कर्क“ॐ ह्रीं भुवनेश्वर्ये नमः”बरगद की समिधामाना जाता है कि वाद-विवाद और कलह से राहत मिलती है
सिंह“ॐ ह्रीं भुवनेश्वर्ये नमः”गूलर की समिधाऐसी मान्यता है कि अज्ञात भय दूर होता है
कन्या“ॐ ह्रीं भुवनेश्वर्ये नमः”पीली सरसोंमाना जाता है कि समाज में मान-सम्मान और यश बढ़ता है
तुला“ॐ ह्रीं भुवनेश्वर्ये नमः”घी, शहद और चीनी युक्त खीरऐसी मान्यता है कि कार्यक्षेत्र में प्रगति के अवसर मिलते हैं
वृश्चिक“ॐ ह्रीं भुवनेश्वर्ये नमः”लाल चंदन की समिधामाना जाता है कि पुरानी शारीरिक दुर्बलताओं से राहत मिलती है
धनु“ॐ ह्रीं भुवनेश्वर्ये नमः”पीले फूल और केसर की खीरविश्वास है कि ज्ञान और आध्यात्मिक चेतना का विकास होता है
mkar“ॐ ह्रीं भुवनेश्वर्ये नमः”काले तिल और घीमाना जाता है कि शनि देव के बुरे असर को कम करने में मदद मिलती है
कुंभ“ॐ ह्रीं भुवनेश्वर्ये नमः”नीले फूल और काले तिलऐसी मान्यता है कि व्यापार और काम में स्थिरता आती है
मीन“ॐ ह्रीं भुवनेश्वर्ये नमः”पीली सरसों और घीमाना जाता है कि वैवाहिक जीवन के कष्ट दूर होते हैं

Maa Bhuvaneshwari FAQ

प्रश्न 1: मां Bhuvaneshwari कौन हैं और उनके नाम का सीधा अर्थ क्या है?

उत्तर: मां Bhuvaneshwari हिंदू धर्म की दस महाविद्याओं में चौथे स्थान पर आने वाली एक अत्यंत सौम्य और करुणामयी देवी हैं। उनके नाम का निर्माण दो मुख्य शब्दों से हुआ है – “भुवन” (जिसका अर्थ है संपूर्ण ब्रह्मांड) और “ईश्वरी” (जिसका अर्थ है स्वामिनी या शासक)। इस प्रकार, मां Bhuvaneshwari का शाब्दिक अर्थ “संपूर्ण ब्रह्मांड की परम महारानी या पूरे जगत का संचालन करने वाली माता” है। देवी भागवत पुराण में उन्हें सृष्टि की मूल प्रकृति और आदि पराशक्ति के रूप में स्वीकार किया गया है।

प्रश्न 2: मां Bhuvaneshwari का मुख्य बीज मंत्र कौन सा है और इसके जाप से क्या लाभ होते हैं?

उत्तर: मां Bhuvaneshwari का सबसे मुख्य और चमत्कारी एकाक्षरी बीज मंत्र “ह्रीं” है। इस मंत्र को तंत्र शास्त्र में “हृल्लेख मंत्र” या “माया बीज” भी कहा गया है। ऐसी मान्यता है कि इस मंत्र के नियमित जाप से मनुष्य का मन शांत होता है, तनाव दूर होता है और निर्णय लेने की क्षमता में सुधार होता है। यह मंत्र शरीर के मणिपुर चक्र (नाभि चक्र) को जागृत करने में अत्यंत सहायक माना जाता है।

प्रश्न 3: गुजरात के गोंडल में स्थित भुवनेश्वरी मंदिर की सबसे बड़ी और अनोखी विशेषता क्या है?

उत्तर: गुजरात के गोंडल शहर में स्थित “श्री भुवनेश्वरी पीठ” मां का एक अत्यंत प्रसिद्ध और जाग्रत मंदिर है। इस मंदिर की स्थापना वर्ष 1946 में गोंडल के राजवैद्य आचार्य चरण तीर्थ महाराज द्वारा की गई थी। इस मंदिर का सबसे बड़ा और प्रत्यक्ष चमत्कार यह है कि जब भी सुबह (मंगला) या शाम (संध्या) की आरती की जाती है, तो मां की मूर्ति के ठीक ऊपर लगा हुआ भारी धातु का छत्र अपने आप आरती के सुर, ताल और लय के अनुसार हिलने (झूलने) लगता है। इस विस्मयकारी दृश्य को देखने के लिए हर साल लाखों भक्त वहां आते हैं।

प्रश्न 4: त्रिपुरा के उदयपुर में स्थित भुवनेश्वरी मंदिर का रवींद्रनाथ टैगोर से क्या संबंध है?

उत्तर: त्रिपुरा के उदयपुर में गोमती नदी के तट पर स्थित भुवनेश्वरी मंदिर का निर्माण 17वीं शताब्दी (1660 से 1675 ईस्वी के बीच) में महाराजा गोविंद माणिक्य द्वारा करवाया गया था। यह मंदिर ऐतिहासिक रूप से इसलिए प्रसिद्ध है क्योंकि नोबेल पुरस्कार विजेता रवींद्रनाथ टैगोर ने अपने प्रसिद्ध नाटक ‘विसर्जन’ और उपन्यास ‘राजर्षि’ की रचना इसी मंदिर की पृष्ठभूमि पर की थी। इस मंदिर में प्राचीन समय में इंसानों की बलि दी जाती थी, जिसे महाराजा गोविंद माणिक्य ने पूरी तरह से बंद करवा दिया था।

प्रश्न 5: क्या गृहस्थ लोग भी मां Bhuvaneshwari की साधना आसानी से कर सकते हैं?

उत्तर: हां, मां Bhuvaneshwari अत्यंत दयालु, शांत और ममतामयी देवी हैं, इसलिए उनकी पूजा और साधना गृहस्थ लोगों के लिए पूरी तरह से सुरक्षित और फलदायी मानी जाती है। उग्र देवियों की तरह उनकी साधना में किसी कड़े दंड का भय नहीं होता है। गृहस्थ साधक अपने घर के पूजा घर में मां की तस्वीर स्थापित करके बहुत ही सरल विधि से (धूप, दीप, लाल फूल और प्रसाद चढ़ाकर) उनके मंत्रों का जाप कर सकते हैं।

इस विस्तृत शोध रिपोर्ट के विश्लेषण से यह पूरी तरह स्पष्ट होता है कि मां Bhuvaneshwari केवल एक पौराणिक चरित्र नहीं हैं, बल्कि वे ब्रह्मांडीय ऊर्जा और असीम आकाश का सजीव स्वरूप हैं जो पूरे चराचर जगत को स्थिरता प्रदान करती हैं। उनकी पूजा और साधना मनुष्य को सांसारिक सुखों (जैसे धन, संपत्ति, सुखी परिवार और सफलता) के साथ-साथ मोक्ष के मार्ग पर भी आगे बढ़ाता है

गुजरात के गोंडल मंदिर में आरती के समय डोलने वाले छत्र से लेकर त्रिपुरा की ऐतिहासिक सिद्धपीठ तक फैले उनके मंदिर इस बात का जीवंत प्रमाण हैं कि आज भी इस धरती पर उनकी दिव्य ऊर्जा साक्षात रूप से जाग्रत है। प्रत्येक मनुष्य और साधक को चाहिए कि वे अपने जीवन में कम से कम 21 दिनों तक मां के चमत्कारी बीज मंत्र “ह्रीं” का स्मरण अवश्य करें, जिससे उनके जीवन के सभी मानसिक और भौतिक कष्ट समाप्त हो सकें और उन्हें असीम शांति की प्राप्ति हो सके

Read The Link : Maa Kamakhya Shaktipith

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