Mauni Amavasya : हिंदू पंचांग के अनुसार, माघ मास की अमावस्या को मौनी अमावस्या कहा जाता है। इसे मौन साधना और आत्म-शुद्धि से जुड़ी एक महत्वपूर्ण तिथि माना जाता है। वर्ष 2026 में मौनी अमावस्या 18 जनवरी, रविवार को पड़ रही है। इस दिन मौन व्रत, पितृ तर्पण और दान के माध्यम से पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने की परंपरा है।
Mauni Amavasya क्या है और कब मनाई जाती है
Mauni Amavasya हिंदू पंचांग के अनुसार माघ मास की अमावस्या तिथि को मनाई जाती है। इसे माघ अमावस्या भी कहा जाता है। यह तिथि सामान्यतः जनवरी या फरवरी महीने में पड़ती है और मौन साधना, पितृ स्मरण तथा स्नान-दान की परंपराओं से जुड़ी मानी जाती है।
‘मौनी’ शब्द का अर्थ है मौन धारण करने वाला व्यक्ति। इसी कारण इस दिन मौन व्रत का विशेष महत्व माना गया है। परंपराओं में कहा गया है कि Mauni Amavasya का दिन आत्मसंयम और आत्मचिंतन के लिए उपयुक्त होता है।
इस तिथि पर पवित्र नदियों में स्नान, पितरों का तर्पण और दान-पुण्य करने की परंपरा रही है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन किए गए कर्म श्रद्धा और भावना के साथ किए जाएँ तो उनका महत्व और भी बढ़ जाता है।
Mauni Amavasya और मौन साधना का महत्व
Mauni Amavasya का संबंध केवल वाणी को रोकने से नहीं, बल्कि भीतर की चंचलता को शांत करने से जोड़ा गया है। प्राचीन परंपराओं में मौन को आत्म-संयम का सबसे सरल और प्रभावी साधन माना गया है। जब व्यक्ति बोलना कम करता है, तब उसका मन स्वाभाविक रूप से अधिक सजग और स्थिर होता है।
मौनी अमावस्या के दिन मौन साधना इसलिए विशेष मानी गई है, क्योंकि अमावस्या की शांति और मौन की साधना एक साथ मन को भीतर की ओर ले जाती है। इस दिन साधक अपने विचारों, स्मृतियों और भावनाओं को बिना टकराव के देख पाता है। ऐसा माना जाता है कि मौन के माध्यम से व्यक्ति अपने कर्मों पर विचार करता है और आत्मशुद्धि की ओर बढ़ता है।
इसी कारण यह तिथि केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि आत्म-अनुशासन और जागरूकता का अभ्यास मानी जाती है।
Mauni Amavasya और पितृ स्मरण की परंपरा
Mauni Amavasya को भारतीय परंपरा में केवल वर्तमान जीवन से नहीं, बल्कि पूर्वजों की स्मृति और उनके आशीर्वाद से जोड़कर देखा गया है। यह दिन व्यक्ति को यह याद दिलाता है कि उसका जीवन केवल उसके अपने कर्मों का परिणाम नहीं, बल्कि उन असंख्य संबंधों और बलिदानों से भी बना है, जो उसके पितरों से जुड़े रहे हैं। इसी भाव से इस तिथि पर पितृ स्मरण और तर्पण की परंपरा निभाई जाती है।
पितृ शांति और पितृ दोष से मुक्ति का भाव
परंपराओं में माना गया है कि जब पितरों का स्मरण श्रद्धा और विनम्रता के साथ किया जाता है, तो उससे मन में जमा हुआ बोझ हल्का होता है। पितृ तर्पण को केवल दोष निवारण का उपाय नहीं, बल्कि कृतज्ञता प्रकट करने का माध्यम माना गया है। ऐसा विश्वास है कि जब पितरों के प्रति सम्मान भाव जाग्रत होता है, तब जीवन में आने वाली रुकावटें धीरे-धीरे शांत होने लगती हैं और मन को स्थिरता मिलती है। यह प्रक्रिया भय से नहीं, बल्कि स्वीकार और स्मरण से जुड़ी मानी गई है।
पितृ आशीर्वाद और जीवन में संतुलन
पितृ आशीर्वाद का अर्थ केवल भौतिक सुख नहीं, बल्कि जीवन में संतुलन और दिशा का मिलना माना गया है। मौनी अमावस्या के दिन किया गया पितृ स्मरण व्यक्ति को अपने मूल से जोड़ता है। ऐसा माना जाता है कि जब व्यक्ति अपने पूर्वजों को स्मरण करता है, तो वह अपने जीवन के उद्देश्य को अधिक स्पष्ट रूप से समझ पाता है। यही स्पष्टता उसे मानसिक शांति, संयम और आगे बढ़ने की शक्ति देती है। इसी कारण यह दिन आत्मिक संतुलन और आंतरिक मुक्ति से भी जोड़ा गया है।
Mauni Amavasya पर पितृ तर्पण का महत्व
पुराने लोग यह बात जानते थे कि आदमी अकेला अपने दम पर कुछ नहीं बनता। जो घर, नाम और पहचान उसे मिली है, वह यूँ ही नहीं आ गई। उसके पीछे उसके माँ-बाप, दादा-परदादा और उनसे पहले की पीढ़ियों की मेहनत जुड़ी रहती है।Mauni Amavasya पर पितरों को याद करने की परंपरा इसी समझ से निकली है। यह किसी डर या मजबूरी का काम नहीं, बल्कि याद रखने का तरीका है।
जब कोई व्यक्ति इस दिन तिल और जल के साथ अपने पितरों को याद करता है, तो वह कोई बड़ा दिखावा नहीं करता। वह बस थोड़ी देर रुकता है और सोचता है कि जो कुछ उसके पास है, वह अकेले उसकी देन नहीं है। बहुत-से लोग कहते हैं कि इस स्मरण से मन का बोझ हल्का हो जाता है। जिन बातों को लेकर भीतर बेचैनी रहती है, वे अपने-आप शांत होने लगती हैं।
पितृ आशीर्वाद को पहले लोग किसी चमत्कार की तरह नहीं देखते थे। उनका मानना था कि जब आदमी अपने पुराने रिश्तों को भूलता नहीं, तो उसकी सोच अपने-आप ठीक दिशा में चलने लगती है। बात-बात पर गुस्सा नहीं आता, फैसले उतावले नहीं होते और रिश्तों में कड़वाहट कम रहती है। इसी को पितरों की कृपा कहा गया है।
Mauni Amavasya का मौन इस काम में मदद करता है। उस दिन कम बोलने से आदमी ज़्यादा सोचता है। जब बिना शोर-शराबे के पितरों को याद किया जाता है, तो तर्पण कोई रस्म नहीं रह जाता। वह बस अपने जीवन को थोड़ी देर ठहरकर देखने का बहाना बन जाता है।
Mauni Amavasya पर पितृ तर्पण की विधि
Mauni Amavasya पर पितृ तर्पण करते समय सामग्री और विधि को लेकर परंपरा में स्पष्ट नियम बताए गए हैं। सबसे पहले स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण किए जाते हैं। यदि संभव हो तो नदी या जलाशय के तट पर बैठकर तर्पण किया जाता है, अन्यथा घर के स्वच्छ स्थान पर भी यह कर्म किया जा सकता है।
तर्पण के लिए सामान्यतः जल, काले तिल, कुशा और जौ का प्रयोग किया जाता है। कई स्थानों पर जल में थोड़ा-सा दूध मिलाने की परंपरा भी है। तर्पण करते समय व्यक्ति दक्षिण दिशा की ओर मुख करके बैठता है, क्योंकि शास्त्रों में दक्षिण दिशा को पितरों की दिशा माना गया है।
तर्पण की प्रक्रिया में दाहिने हाथ में जल लिया जाता है और अंगूठे व तर्जनी के बीच से जल धीरे-धीरे भूमि या जल में छोड़ा जाता है। यह विधि विशेष रूप से पितृ कर्म के लिए बताई गई है। तर्पण करते समय पितरों का नाम लेकर स्मरण किया जाता है और मंत्र का जप किया जाता है।
पितृ तर्पण के लिए प्रचलित मंत्र है—
“ॐ पितृभ्यो नमः”
या
“ॐ पितृ देवतायै नमः”
कुछ स्थानों पर यह मंत्र भी बोला जाता है—
“ॐ आगच्छन्तु मे पितर इमं गृहन्तु जलाञ्जलिम्”
जिसका भाव यह है कि पितर इस जलांजलि को स्वीकार करें।
तर्पण के बाद अन्न, वस्त्र या दक्षिणा का दान करना परंपरा में शुभ माना गया है। यदि किसी कारणवश नदी तट पर जाकर तर्पण करना संभव न हो, तो घर पर श्रद्धा और नियम के साथ किया गया तर्पण भी मान्य माना गया है।
Mauni Amavasya पर स्नान का धार्मिक महत्व
मौनी अमावस्या के दिन स्नान को लेकर कभी ज़्यादा तामझाम नहीं किया गया। पुराने समय में लोग बस इतना जानते थे कि अमावस्या का दिन वैसे ही शांत होता है और माघ का महीना ठंडा। ऐसे में सूरज निकलने से पहले उठकर स्नान कर लेना अपने-आप में एक अनुशासन माना जाता था। यही आदत धीरे-धीरे परंपरा बन गई।
नदियों में स्नान की बात भी इसी तरह चली। गंगा, यमुना या संगम का नाम इसलिए लिया जाता है क्योंकि ये सदियों से लोगों के जीवन से जुड़ी रही हैं। यह नहीं कहा जाता था कि बिना नदी के स्नान सब व्यर्थ हो जाएगा। जो लोग पास में रहते थे, वे चले जाते थे, और जो नहीं जा पाते थे, वे घर पर ही साफ़ पानी से स्नान कर लेते थे। बात जगह की नहीं, तैयारी की मानी जाती थी।
स्नान को पितृ तर्पण से पहले इसलिए रखा गया, ताकि शरीर और मन दोनों थोड़ा स्थिर हो जाएँ। गीले शरीर, साफ़ कपड़ों और शांत मन के साथ बैठने पर ध्यान अपने-आप भटकता नहीं। इसी स्थिति में तर्पण और दान किए जाते थे। यही कारण है कि लोग कहते हैं, पहले स्नान, फिर बाकी कर्म।
बहुत-से घरों में इस दिन स्नान के समय ज़्यादा बोलचाल भी नहीं की जाती थी। यह कोई नियम नहीं था, बस एक समझ थी कि चुप रहने से मन जल्दी एक जगह टिकता है। इसी मौन के कारण स्नान कोई रोज़ का काम नहीं लगता था, बल्कि दिन की शुरुआत का एक गंभीर क्षण बन जाता था। Mauni Amavasya पर स्नान को इसी वजह से पितृ स्मरण और संयम से जोड़ा गया।
Mauni Amavasya पर दान का महत्व
मौनी अमावस्या पर दान को हिंदू परंपरा में पितृ कर्म का एक आवश्यक अंग माना गया है। शास्त्रों में अमावस्या तिथि को दान के लिए उपयुक्त बताया गया है, विशेष रूप से जब यह माघ मास में पड़ती है। इसी कारण इस दिन स्नान और पितृ तर्पण के बाद दान करने की परंपरा रही है।
परंपरा के अनुसार मौनी अमावस्या पर तिल, अन्न, वस्त्र और कंबल का दान किया जाता है। तिल को पितृ कर्म से जुड़ा माना गया है, इसलिए इसका उपयोग दान में विशेष रूप से किया जाता है। माघ मास की ठंड को ध्यान में रखते हुए कंबल या ऊनी वस्त्र का दान भी परंपरागत रूप से शुभ माना गया है। अन्न दान को सामान्य लेकिन आवश्यक दान कहा गया है, क्योंकि इसे जीवन का आधार माना गया है।
दान करते समय यह ध्यान रखा जाता है कि दान स्नान और तर्पण के बाद किया जाए। कई स्थानों पर ब्राह्मण को भोजन कराने या दक्षिणा देने की परंपरा भी निभाई जाती है। शास्त्रों में यह स्पष्ट कहा गया है कि दान दिखावे के लिए नहीं, बल्कि श्रद्धा और नियम के साथ किया जाना चाहिए।
यदि कोई व्यक्ति अधिक दान करने की स्थिति में न हो, तो अपनी सामर्थ्य के अनुसार किया गया दान भी स्वीकार्य माना गया है। परंपरा में यह मान्यता रही है कि वस्तु से अधिक महत्व भाव और विधि का होता है। इसी कारण मौनी अमावस्या पर दान को पितृ तर्पण के साथ जोड़कर देखा गया है।
Mauni Amavasya और ग्रह योग: आध्यात्मिक एवं ज्योतिषीय आधार
मौनी अमावस्या का महत्व केवल धार्मिक मान्यताओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरा ज्योतिषीय और मनोवैज्ञानिक आधार भी है:
सूर्य-चंद्र का दुर्लभ मिलन: ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, अमावस्या वह तिथि है जब सूर्य और चंद्रमा एक ही राशि में गोचर करते हैं। सूर्य ‘आत्मा’ का कारक है और चंद्रमा ‘मन’ का। इन दोनों का मिलन आत्म-मंथन और पितृ कर्म के लिए सबसे उत्तम समय माना गया है।
मानसिक शांति और मौन का विज्ञान: चूंकि इस दिन चंद्रमा (मन का कारक) का प्रभाव न्यूनतम होता है, इसलिए व्यक्ति का मन विचलित या अशांत हो सकता है। शास्त्रों में ‘मौन व्रत’ का विधान इसीलिए दिया गया है ताकि बाहरी शोर को बंद करके मानसिक ऊर्जा को संचित किया जा सके और ग्रहों के नकारात्मक प्रभाव को कम किया जा सके।
पितृ दोष शांति का द्वार: माघ मास की इस अमावस्या पर ग्रहों की स्थिति ‘तर्पण’ के लिए अत्यंत अनुकूल होती है। मान्यता है कि इस दिन किया गया तर्पण सीधे पितरों तक पहुँचता है, जिससे कुंडली के जटिल पितृ दोषों का शमन होता है।
सर्वार्थ सिद्धि एवं ग्रह स्थिरता: परंपराओं के अनुसार, मौनी अमावस्या पर बनने वाले शुभ योग (जैसे इस बार का चतुर्ग्रही योग) व्यक्ति के आध्यात्मिक संकल्पों को सिद्ध करते हैं। यह समय तामसिक प्रवृत्तियों को त्यागकर सात्विक ऊर्जा को बढ़ाने वाला होता है।
श्रद्धा बनाम आडंबर: जैसा कि शास्त्रों में उल्लेख है—’भावो ही विद्यते देवः’ अर्थात् ईश्वर भाव में बसते हैं। ग्रह योग अपना फल तभी देते हैं जब कर्म पूरी श्रद्धा, शुद्धता और बिना किसी आडंबर के किए जाएं। नियम और संयम ही इस तिथि की असली शक्ति हैं।
Mauni Amavasya पर किए जाने वाले प्रमुख कर्म
Mauni Amavasya के दिन किए जाने वाले ये 5 कर्म न केवल शास्त्रों में अनिवार्य बताए गए हैं, बल्कि ये जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार भी करते हैं:
- मौन व्रत (वाणी का संयम): इस दिन का सबसे प्रधान कर्म ‘मौन’ रहना है।
विधि: सुबह स्नान से लेकर पूजन समाप्त होने तक पूर्ण मौन रखें। यदि पूरा दिन संभव न हो, तो कम से कम सवा दो घंटे का मौन अवश्य रखें।
महत्व: मौन रहने से संचित ऊर्जा ‘आज्ञा चक्र’ को जाग्रत करती है और मानसिक तनाव से मुक्ति दिलाती है।
- पवित्र स्नान (कायिक शुद्धि): माघ मास में गंगा या किसी भी पवित्र नदी में स्नान का फल अश्वमेध यज्ञ के समान माना गया है।
विधि: सूर्योदय से पूर्व (ब्रह्म मुहूर्त) स्नान करें। यदि घर पर स्नान कर रहे हैं, तो जल में थोड़ा सा गंगाजल और काले तिल मिला लें।
महत्व: मान्यता है कि इस दिन जल में अमृत का अंश होता है, जो रोगों और पापों का नाश करता है।
- पितृ तर्पण (पूर्वजों का ऋण): पितृ दोष से मुक्ति के लिए यह वर्ष का सबसे विशेष दिन है।
विधि: दक्षिण दिशा की ओर मुख करके तांबे के लोटे में जल, तिल, जौ और दूध मिलाकर ‘ॐ पितृभ्यो नमः’ का जाप करते हुए जलांजलि दें।
महत्व: अमावस्या पितरों की तिथि है। इस दिन किया गया तर्पण पूर्वजों को तृप्त करता है, जिससे वंश वृद्धि और सुख-समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है।
- महादान (परोपकार): इस दिन दिया गया दान ‘अक्षय’ (कभी न समाप्त होने वाला) फल प्रदान करता है।
क्या दान करें: कड़ाके की ठंड को देखते हुए तिल, गुड़, कंबल, घी, ऊनी वस्त्र और अन्न का दान सर्वश्रेष्ठ है।
महत्व: दान करने से कुंडली के शनि और राहु जैसे पाप ग्रहों के नकारात्मक प्रभाव कम होते हैं।
- दीपदान और पीपल पूजा: अंधकार से प्रकाश की ओर जाने का संकल्प ही दीपदान है।
विधि: सायंकाल के समय पीपल के वृक्ष के नीचे और घर के मुख्य द्वार पर सरसों के तेल या घी का दीपक जलाएं।
महत्व: पीपल में त्रिदेवों और पितरों का वास होता है। दीपदान करने से घर की नकारात्मकता दूर होती है और लक्ष्मी का वास होता है।
सावधानी: इस दिन तामसिक भोजन (प्याज, लहसुन, मांस) और वाद-विवाद से पूरी तरह दूर रहना चाहिए ताकि मौन का पूर्ण फल मिल सके।
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