Naag Lok Rahasya Part 1 – नागों की उत्पत्ति, पाताल के सात स्तर और नाग लोक के प्राचीन द्वार

Naag Lok Rahasya Part 1 – नागों की उत्पत्ति, पाताल के सात स्तर और नाग लोक के प्राचीन द्वार

Naag Lok Rahasya : इस धरती पर जितने भी रहस्यमयी प्राणी हैं उनमें नाग का स्थान सबसे ऊपर है। हजारों साल से इंसान नाग को देखकर न तो पूरी तरह डर पाया और न पूरी तरह उससे दूर जा पाया। एक अजीब सा खिंचाव है जो इंसान को नाग की तरफ बार-बार ले जाता है। दुनिया की हर सभ्यता में नाग किसी न किसी रूप में पूजनीय रहा है। मिस्र के फराओ अपने मुकुट पर नाग धारण करते थे। यूनान में चिकित्सा का प्रतीक नाग से जुड़ा है। लेकिन जहाँ नाग सबसे गहरे और सबसे विस्तृत रूप में मिलता है वह है भारत।

भारत में नाग केवल एक जीव नहीं है। यहाँ नाग एक पूरी सभ्यता है, एक पूरा लोक है, एक पूरा दर्शन है। हमारे पुराणों में नाग लोक का वर्णन इतने विस्तार से मिलता है कि पढ़ने वाला दंग रह जाए। Naag Lok Rahasya की इस यात्रा के पहले भाग में हम उस दुनिया की नींव को समझेंगे। नागों की उत्पत्ति, गरुड़ से उनकी शाश्वत शत्रुता, नाग लोक के सात स्तर, उसके द्वार और मंदिरों में नागों की उपस्थिति।

॥ नाग गायत्री मंत्र ॥
ॐ नवकुलाय विद्महे विषदन्ताय धीमहि।
तन्नो सर्पः प्रचोदयात्॥

~ अथर्ववेद

Table of Contents

कश्यप, कद्रू और विनता : वह परिवार जिससे नाग जाति बनी

नागों की उत्पत्ति की कथा महाभारत के आदिपर्व में बहुत विस्तार से दी गई है। यह कथा एक ऋषि से शुरू होती है जिनके परिवार से इस सृष्टि की कई प्रजातियाँ जन्मी थीं।

ब्रह्माजी के मानसपुत्रों में से एक थे महर्षि कश्यप। इन्हें प्रजापति कहा जाता है यानी प्रजा के पिता। कश्यप की पत्नियाँ दक्ष प्रजापति की पुत्रियाँ थीं। अदिति से देवता जन्मे, दिति से दैत्य जन्मे, विनता से पक्षी जन्मे और कद्रू से नाग जन्मे। यानी देवता और नाग दोनों एक ही पिता की संतानें हैं। Naag Lok Rahasya की जड़ें इसी एक परिवार से जुड़ी हुई हैं।

कद्रू और विनता दोनों सगी बहनें थीं और दोनों ने कश्यप से विवाह किया था। दोनों का स्वभाव बिल्कुल अलग था। विनता शांत और सरल थीं जबकि कद्रू महत्वाकांक्षी और चालाक थीं। एक बार कश्यप ने दोनों को वरदान देने की बात कही। कद्रू ने माँगे एक हजार शक्तिशाली नाग पुत्र। विनता ने माँगे केवल दो पुत्र लेकिन ऐसे जो कद्रू के सभी पुत्रों से बलवान हों।

कश्यप ने दोनों को वरदान दिया और कहा कि धैर्य रखो। समय आने पर तुम्हारी संतानें होंगी। कद्रू के अंडों से एक हजार नाग निकले। विनता के दो अंडे थे। एक से निकले अरुण जो सूर्य के सारथी बने और दूसरे से निकले गरुड़ जो विष्णु के वाहन बने।

वह बात जो कम लोग जानते हैं, विनता के पहले अंडे से अरुण इसलिए अधूरे शरीर के साथ निकले क्योंकि विनता ने धैर्य खोकर अंडा समय से पहले तोड़ दिया था। अरुण ने जन्म लेते ही विनता को श्राप दिया कि तुम दासी बनोगी। यही श्राप बाद में कद्रू के दाँव में फँसकर पूरा हुआ। अगर विनता ने धैर्य रखा होता तो शायद इतिहास अलग होता। यह कथा हमें बताती है कि अधैर्य के परिणाम बहुत दूर तक जाते हैं।

उच्चैःश्रवा का दाँव और वह छल जिसने नागों की नियति बदली

एक दिन कद्रू और विनता आकाश में उड़ते हुए एक अद्भुत दृश्य देख रही थीं। समुद्र मंथन से निकला दिव्य अश्व उच्चैःश्रवा उनके सामने से गुजरा। यह घोड़ा जैसा कोई और घोड़ा इस सृष्टि में नहीं था। उसका पूरा शरीर श्वेत था, उसकी चाल में एक राजसी गर्व था और उसकी आँखों में एक दिव्य चमक थी।

कद्रू ने कहा कि इस घोड़े की पूंछ काली है। विनता ने असहमति जताई और कहा कि पूंछ भी उतनी ही सफेद है जितना बाकी शरीर। बात बढ़ी और दोनों ने दाँव लगाया कि जो हारेगी वह जीतने वाली की दासी बनेगी। अगले दिन जाकर देखेंगे।

कद्रू जानती थीं कि घोड़े की पूंछ सफेद है इसलिए वह हारेंगी। उन्होंने रात को अपने नाग पुत्रों को बुलाया और कहा कि तुम सब जाकर उस घोड़े की पूंछ के बालों से लिपट जाओ ताकि पूंछ काली दिखे। यह सुनकर नाग पुत्रों में दो मत हो गए। कुछ ने कहा कि यह झूठ और छल है और हम यह नहीं करेंगे। कुछ ने माँ का आदेश मान लिया।

जिन नाग पुत्रों ने माँ का आदेश मानने से इनकार किया उन्हें कद्रू ने तुरंत श्राप दिया। उन्होंने कहा कि जनमेजय के नाग यज्ञ की अग्नि में तुम सबसे पहले जलोगे। यह कद्रू का वह क्रोध था जो माँ के रूप को भूलकर एक स्वार्थी स्त्री के रूप में सामने आया।

जिन नागों ने माँ की बात मानी वे रात को चुपचाप उस घोड़े के पास गए और उसकी पूंछ के बालों से लिपट गए। अगले दिन जब दोनों बहनें देखने गईं तो पूंछ काली दिखी। दाँव कद्रू के पक्ष में गया और विनता को दासी बनना पड़ा।

जब ब्रह्माजी को पूरी बात पता चली तब वे बहुत दुखी हुए। उन्होंने कहा कि नाग जाति ने छल का आश्रय लिया है इसलिए उन्हें दंड मिलेगा। उन्होंने श्राप दिया कि जब राजा जनमेजय नाग यज्ञ करेगा तब अग्नि देव तुम सबको अपने में समेट लेगी। यह श्राप नागों के ऊपर एक तलवार की तरह लटक गया।

लेकिन ब्रह्माजी ने एक आशा की किरण भी दी। उन्होंने कहा कि जरत्कारु ऋषि और नाग कन्या के पुत्र आस्तीक इस यज्ञ को रोकेंगे। यह भविष्यवाणी नाग लोक में आशा की एकमात्र किरण बन गई। इसीलिए नाग लोक में मनसा देवी ने जरत्कारु ऋषि से विवाह करने की पूरी कोशिश की ताकि आस्तीक जन्म ले सकें।

महाभारत में यह भी लिखा है कि ब्रह्माजी ने नागों को श्राप देते समय कश्यप ऋषि को साथ रखा था। कश्यप ने ब्रह्माजी से प्रार्थना की कि मेरी संतानों पर इतना कठोर श्राप न दें। तब ब्रह्माजी ने कहा कि यह श्राप नहीं बल्कि एक संतुलन है। नाग जाति बहुत शक्तिशाली है। अगर इन्हें कोई भय न हो तो ये सृष्टि के लिए खतरा बन सकते हैं। यह यज्ञ का भय उन्हें नियंत्रित रखेगा।

गरुड़ और नागों की शाश्वत शत्रुता : अमृत की वह कथा जो सब कुछ बदल गई

कद्रू की जीत के बाद विनता उनकी दासी बन गईं। लेकिन विनता के पुत्र गरुड़ को यह स्वीकार नहीं था। गरुड़ ने कद्रू के नागों से पूछा कि मेरी माँ को किस शर्त पर मुक्त करोगे। नागों ने कहा कि स्वर्ग से अमृत लाकर दो तब विनता मुक्त होंगी।

गरुड़ ने यह चुनौती स्वीकार की और स्वर्ग की ओर उड़ चले। रास्ते में उन्होंने अपने पिता कश्यप से भोजन माँगा क्योंकि इतनी लंबी यात्रा के लिए शक्ति चाहिए थी।

स्वर्ग में अमृत की रक्षा के लिए इंद्र ने घेरा लगाया हुआ था। चारों ओर देवता पहरा दे रहे थे। लेकिन गरुड़ ऐसे प्राणी थे जिन्हें देवता भी रोकने में असमर्थ थे। उनके पंखों की हवा से देवता उड़ने लगे। उनकी चोंच के सामने देवताओं के अस्त्र-शस्त्र बेकार हो गए।

इंद्र ने स्वयं वज्र से प्रहार किया। गरुड़ को चोट लगी लेकिन वे रुके नहीं। अमृत कलश के पास पहुँचकर उन्होंने उसे उठाया और वापस उड़ चले। इंद्र हैरान रह गए। उन्होंने गरुड़ से मित्रता का हाथ बढ़ाया और कहा कि तुम जो चाहो माँगो। गरुड़ ने कहा कि नाग सदा मेरा भोजन रहें। इंद्र ने यह मान लिया।

गरुड़ ने अमृत कलश नागों को दिया और कहा कि पहले मेरी माँ को मुक्त करो। नागों ने विनता को मुक्त किया। गरुड़ ने कहा कि अमृत कुशा घास पर रखा है, तुम स्नान करके आओ फिर पियो। नाग स्नान करने चले गए। उसी बीच इंद्र ने चुपचाप अमृत कलश वापस स्वर्ग ले जाकर रख दिया।

जब नाग वापस आए तो अमृत नहीं था। केवल कुशा घास बची थी जिस पर अमृत की कुछ बूँदें गिरी थीं। नागों ने उस घास को चाटा। कुशा घास की धार इतनी तेज थी कि नागों की जीभ बीच से कट गई। तब से नागों की जीभ दो हिस्सों में बंटी है।

नागों की जीभ दो हिस्सों में क्यों है

महाभारत में यह कथा बताती है कि नागों की दो फाँक जीभ का कारण वह लालच और जल्दबाजी है जो उन्होंने अमृत पाने के लिए दिखाई। उन्होंने पहले स्नान जाना स्वीकार किया जबकि अमृत सामने था। यह उनकी भूल थी।

लेकिन इस कथा का एक और दार्शनिक अर्थ है। दो फाँक जीभ यानी दोहरा स्वभाव। नाग एक तरफ देवताओं के साथ हैं क्योंकि वे कश्यप की संतान हैं। दूसरी तरफ उनका स्वभाव छल और चालाकी की तरफ झुकता है जैसा कद्रू ने किया था। यह दोहरापन उनकी जीभ में दिख जाता है।

इसी घटना से गरुड़ और नागों की शत्रुता स्थायी हो गई। गरुड़ को नाग खाने का अधिकार मिला और नागों के लिए गरुड़ सबसे बड़ा भय बन गया। आज भी सांप गरुड़ यानी बाज जैसे पक्षियों से डरते हैं।

महाभारत में एक बहुत रोचक प्रसंग है। जब गरुड़ स्वर्ग से अमृत लेकर उड़ रहे थे तब रास्ते में विष्णु मिले। विष्णु ने गरुड़ को देखा और प्रसन्न हुए। उन्होंने गरुड़ से कहा कि तुम्हारी शक्ति और पराक्रम अद्भुत है। गरुड़ ने विष्णु को अपना स्वामी मान लिया और विष्णु ने उन्हें अपना वाहन बना लिया। इस पूरी घटना में अमृत केवल एक माध्यम था। असल में इसी यात्रा में गरुड़ और विष्णु का वह संबंध बना जो आज तक चला आ रहा है।

आठ मुख्य नाग कुल : नाग सभ्यता के आठ स्तंभ

कद्रू के एक हजार नाग पुत्रों में से आठ सबसे शक्तिशाली और सबसे प्रतापी थे। यह आठ नाग ही नाग सभ्यता के मूल स्तंभ बने। महाभारत के आदिपर्व में इन आठों का नाम और उनकी विशेषताएं अलग-अलग बताई गई हैं।

पहले हैं अनंत जिन्हें शेषनाग कहते हैं। यह नागों में सबसे बड़े हैं। इन्होंने घोर तपस्या की और ब्रह्माजी का आशीर्वाद पाया। यह पृथ्वी को अपने फन पर धारण करते हैं। इनकी पूरी कथा भाग दो में आएगी।

दूसरे हैं वासुकि जो नाग लोक के राजा हैं। यह शिव के परम भक्त हैं और इसीलिए शिव के गले में विराजमान हैं। समुद्र मंथन में इनकी भूमिका अद्वितीय थी।

तीसरे हैं तक्षक जो सबसे तेज और सबसे विषैले नाग हैं। तक्षशिला उनका मूल निवास था। परीक्षित को काटने की उनकी कथा बहुत जटिल है।

चौथे हैं कर्कोटक जो माया शक्ति के लिए जाने जाते हैं। इन्होंने राजा नल की मदद की थी। इनका विष रूप बदलने में सक्षम था।

पाँचवें हैं पद्म जो कमल के समान सुंदर थे। यह नाग लोक के दरबार में महत्वपूर्ण स्थान रखते थे और शांतिप्रिय स्वभाव के थे।

छठे हैं महापद्म जो पद्म से भी अधिक शक्तिशाली थे। यह धन के रक्षक नाग माने जाते हैं। कई पुराणों में इन्हें धन के भंडारों की रक्षा करते बताया गया है।

सातवें हैं शंख जो अपनी शीतल प्रकृति के लिए जाने जाते हैं। जहाँ बाकी नाग विषैले और उग्र थे वहाँ शंख नाग शांत और सौम्य थे।

आठवें हैं कुलिक जो नाग वंश के धार्मिक कार्यों के संरक्षक थे। यह नागों के यज्ञ और धार्मिक अनुष्ठानों की देखरेख करते थे।

इन आठ मुख्य नागों के अलावा महाभारत में कुछ और नागों का उल्लेख है जो उतने प्रसिद्ध नहीं हैं। एलापत्र नाग जो वर्षा के स्वामी माने जाते थे। धनंजय नाग जो धन और वैभव के रक्षक थे। त्रिशिरा नाग जिनके तीन सिर थे और जो तीनों लोकों की सूचना रखते थे। आर्यक नाग जो परीक्षित के नाना थे और जिनसे अर्जुन के पुत्र परीक्षित का संबंध था। यह सब मिलकर नाग लोक की पूरी प्रशासनिक व्यवस्था को चलाते थे।

नाग लोक कैसा है, तीन पुराणों से पूरा वर्णन

नाग लोक का वर्णन तीन अलग-अलग पुराणों में मिलता है और तीनों में कुछ न कुछ नया है जो दूसरे में नहीं है। तीनों को मिलाकर Naag Lok Rahasya की एक पूरी तस्वीर बनती है।

भागवत पुराण से – महल, रत्न और दिव्य वातावरण

भागवत पुराण के दूसरे स्कंध में शुकदेव जी ने परीक्षित को नाग लोक का जो वर्णन दिया है वह अत्यंत विस्तृत है। उन्होंने कहा कि पाताल के सबसे निचले स्तर में शेषनाग का महल है। यह महल सोने का बना है और उसके खंभे विभिन्न रत्नों से जड़े हैं। महल के आसपास ऐसे उद्यान हैं जहाँ दिव्य वृक्ष हैं जिनके फूलों की खुशबू इतनी तीव्र है कि एक बार सूँघने वाला मदहोश हो जाए।

वहाँ सूर्य का प्रकाश नहीं पहुँचता लेकिन नागों के मणियों की चमक से पूरा लोक प्रकाशित रहता है। यह प्रकाश सूर्य के प्रकाश से अलग है। यह मृदु है, आँखों को चुभता नहीं और मन को शांत करता है।

वहाँ की नदियों का पानी दिव्य औषधियों से भरा है। जो इसे पीता है उसके सारे रोग नष्ट हो जाते हैं। वहाँ के पत्थरों में भी औषधीय गुण हैं। नाग इन्हीं पत्थरों को पीसकर अपनी औषधियाँ बनाते थे जो मृत्यु को टाल सकती थीं।

विष्णु पुराण से – समय की गति और दीर्घायु का रहस्य

विष्णु पुराण में नाग लोक के बारे में एक बहुत महत्वपूर्ण बात लिखी है जो भागवत में नहीं है। वहाँ लिखा है कि नाग लोक में समय की गति पृथ्वी से अलग है। वहाँ का एक दिन पृथ्वी के कई वर्षों के बराबर होता है। इसीलिए जो नाग नाग लोक में रहते हैं वे पृथ्वी के प्राणियों की तुलना में बहुत दीर्घायु होते हैं।

जो नाग वहाँ सौ वर्ष जीता है वह पृथ्वी के हिसाब से हजारों वर्ष की आयु पा चुका होता है। यही कारण है कि पुराणों में नागों को हजारों-लाखों वर्ष जीवित बताया गया है। यह कोई अतिशयोक्ति नहीं बल्कि नाग लोक के समय की अलग गति का परिणाम है।

महाभारत में अर्जुन ने जो नाग लोक देखा

महाभारत में जब अर्जुन उलूपी के साथ नाग लोक गए तब वहाँ का जो वर्णन आया है वह बहुत जीवंत है। नाग लोक में प्रवेश करते ही सबसे पहले एक विशाल राजमहल दिखा। उसके खंभे सोने के थे और दरवाजे रत्नजड़ित थे। महल के बाहर नाग रक्षक पहरा दे रहे थे।

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महल के भीतर एक विशाल सभाकक्ष था जहाँ नाग राजा कौरव्य अपने दरबारियों के साथ बैठे थे। सभी नाग अलग-अलग रूपों में थे, कुछ मनुष्य रूप में, कुछ अर्धनाग रूप में और कुछ पूरे नाग रूप में। नाग लोक की नागिनें अत्यंत सुंदर थीं और उनके आभूषण दिव्य रत्नों से बने थे।

भागवत पुराण में शुकदेव जी ने एक बहुत महत्वपूर्ण बात कही है। उन्होंने कहा कि पाताल में जो सुख है वह स्वर्ग के सुख से भी अधिक है। स्वर्ग में देवता जो भोग करते हैं वह पाताल के नागों के भोग के सामने साधारण है। इसीलिए कुछ देवता भी पाताल की ओर आकर्षित होते थे। लेकिन वहाँ एक कमी है जो इसे स्वर्ग से कम बनाती है। वह कमी यह है कि पाताल में ईश्वर की भक्ति नहीं होती। भोग इतना अधिक है कि प्राणी भगवान को भूल जाते हैं।

पाताल के सात स्तर अतल से पाताल तक की रहस्यमयी यात्रा

भागवत पुराण के दूसरे स्कंध में पाताल के सात स्तरों का विस्तृत वर्णन है। यह सात स्तर एक के नीचे एक हैं और हर स्तर अपने आप में एक अलग दुनिया है।

पहला स्तर है अतल। यह पाताल का सबसे ऊपरी हिस्सा है। यहाँ बल नामक असुर का राज्य है जो मय दानव का पुत्र था। यहाँ की धरती सफेद रंग की है। बल ने एक विशेष माया बनाई थी जिससे वह स्त्रियों को वश में कर लेता था। इस स्तर पर रहने वाले प्राणी सांसारिक भोग में इतने डूबे रहते हैं कि उन्हें समय का ध्यान नहीं रहता।

दूसरा स्तर है वितल। यहाँ हाटकेश्वर शिव विराजमान हैं। यह शिव का एक विशेष रूप है जो पाताल में निवास करता है। यहाँ हाटक नामक स्वर्ण पाया जाता है जो पृथ्वी के सोने से कई गुना शुद्ध और चमकीला है। यहाँ की धरती काली है और वायुमंडल में एक विशेष ऊर्जा है।

तीसरा स्तर है सुतल। यहाँ महाराज बलि का राज्य है। जब विष्णु ने वामन रूप में बलि से तीन पग भूमि माँगी और तीनों लोकों को नाप लिया तब बलि को इसी सुतल में भेजा गया। विष्णु ने बलि को वरदान दिया कि वे स्वयं सुतल के द्वार पर रक्षक बनकर खड़े रहेंगे। इसीलिए सुतल को सबसे सुरक्षित स्तर माना जाता है। यहाँ की धरती लाल रंग की है।

चौथा स्तर है तलातल। यहाँ मय दानव का राज्य है। मय दानव वास्तुकला का महान ज्ञाता था। उसने पाताल में ऐसे महल बनाए जो स्वर्ग के महलों से भी अधिक भव्य थे। पांडवों के लिए जो इंद्रप्रस्थ बनाया गया था वह भी मय दानव ने ही बनाया था। यहाँ की धरती पीली है।

पाँचवाँ स्तर है महातल। यहाँ क्रोधवश नागों का निवास है। यह वे नाग हैं जो हमेशा क्रोध में रहते हैं और जिनके कई-कई फन हैं। इनमें कुहक, तक्षक और सुषेण प्रमुख हैं। यह नाग बहुत शक्तिशाली हैं लेकिन उनका क्रोध उन्हें कभी-कभी विनाश की ओर ले जाता है।

छठा स्तर है रसातल। यहाँ पणि और निवातकवच नामक असुरों का निवास है। यह देवताओं के घोर शत्रु हैं। इन्हें कभी इंद्र ने हराया था और तब से यह रसातल में रहकर अपनी शक्ति बढ़ाते रहे हैं।

सातवाँ और सबसे नीचे का स्तर है पाताल। यह नाग लोक का मूल केंद्र है। यहाँ शेषनाग का विशाल महल है। यहाँ की धरती नीली है और पूरा वातावरण नागों के मणियों की चमक से प्रकाशित रहता है। यहाँ का वैभव इतना अधिक है कि देवता भी इसकी प्रशंसा करते हैं।

भागवत पुराण में इन सात स्तरों के अलावा एक आठवें स्तर का भी संकेत मिलता है जिसे नरक कहा गया है। यह नरक पाताल से भी नीचे है और वहाँ पापियों को दंड दिया जाता है। यमराज का साम्राज्य इसी नरक में है। इसलिए पाताल और नरक एक नहीं हैं। पाताल एक सुखद लोक है जहाँ नाग और असुर रहते हैं जबकि नरक वह स्थान है जहाँ पापों का फल भोगा जाता है।

नाग लोक के द्वार पुराणों में वर्णित प्राचीन प्रवेश मार्ग

Naag Lok Rahasya की खोज में सबसे बड़ा सवाल यह है कि नाग लोक तक पहुँचने के द्वार कहाँ हैं? पुराणों में इसका उत्तर कई जगह मिलता है। और कुछ स्थान ऐसे हैं जो आज भी धरती पर मौजूद हैं और जिनके बारे में स्थानीय परंपराएँ हजारों साल से एक ही बात कहती आई हैं।

1. गंगा का तल : महाभारत आदिपर्व

महाभारत में जब अर्जुन तीर्थयात्रा पर गंगा के तट पर थे तब उलूपी नाम की नाग राजकुमारी उनसे मिलने आई। उलूपी ने अर्जुन को गंगा की धारा के भीतर खींच लिया। वे नाग लोक पहुँचे जहाँ उलूपी के पिता कौरव्य नाग का राज्य था। महाभारत में यह स्पष्ट लिखा है कि गंगा के विशेष स्थानों पर नाग लोक का द्वार खुलता है। इन स्थानों को नागतीर्थ कहा गया है। हरिद्वार के पास गंगा में कई ऐसे स्थान हैं जहाँ नदी की धारा अचानक बहुत गहरी हो जाती है और जिनकी गहराई आज तक नहीं नापी जा सकी।

2. पाताल भुवनेश्वर गुफा : स्कंद पुराण मानसखंड

उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में गंगोलीहाट के पास पाताल भुवनेश्वर की गुफा है। स्कंद पुराण के मानसखंड में इस गुफा का स्पष्ट वर्णन मिलता है। यह गुफा धरती के भीतर लगभग 160 मीटर गहरी है। गुफा के भीतर जाने पर रास्ता इतना संकरा और इतना नीचे उतरता है कि भीतर जाने वाले को लगता है जैसे वे किसी और दुनिया में प्रवेश कर रहे हों। स्कंद पुराण में लिखा है कि इस गुफा में आदि शंकराचार्य ने साधना की थी। गुफा की दीवारों पर पत्थर में नागों की आकृतियाँ प्राकृतिक रूप से बनी हैं जो मानव निर्मित नहीं हैं।

3. शेषनाग झील : कश्मीर परंपरा

अमरनाथ यात्रा के मार्ग पर पहलगाम से आगे शेषनाग झील आती है। यह झील समुद्र तल से 3590 मीटर की ऊँचाई पर है। इस झील का पानी इतना गहरा नीला है कि देखने वाले को लगता है जैसे आकाश नीचे उतर आया हो। कश्मीर की पुरानी परंपरा में यह माना जाता है कि इस झील की तलहटी में शेषनाग का महल है। साफ रात को झील के भीतर से एक अजीब सी रोशनी दिखती है ऐसा स्थानीय लोग बताते हैं।

4. नागकूप : वृंदावन, भागवत पुराण

वृंदावन में यमुना के किनारे एक स्थान है जिसे आज भी नागकूप कहते हैं। भागवत पुराण के दसवें स्कंध में जब कृष्ण ने कालिया नाग को यमुना से बाहर निकाला और उसे रमण द्वीप जाने का आदेश दिया तब कालिया इसी स्थान से नाग लोक को गया। यह कूप आज भी वृंदावन में एक मंदिर परिसर में है। स्थानीय पंडों की परंपरा में इस कूप को नाग लोक का प्रवेश द्वार माना जाता है।

5. नागद्वार : पचमढ़ी, मध्यप्रदेश

मध्यप्रदेश की सतपुड़ा पर्वतमाला में स्थित पचमढ़ी से लगभग 14 किलोमीटर की पैदल यात्रा पर नागद्वार है। यह यात्रा घने जंगलों और पहाड़ी रास्तों से होकर जाती है। नागपंचमी पर यहाँ हजारों श्रद्धालु आते हैं। नागद्वार एक प्राकृतिक पत्थर का द्वार है जिसके भीतर एक गुफा है। गुफा के भीतर एक प्राकृतिक शिवलिंग है और उसके चारों ओर नागों की प्राकृतिक आकृतियाँ पत्थर में उभरी हैं।

6. नर्मदा का उद्गम : अमरकंटक, स्कंद पुराण रेवाखंड

स्कंद पुराण के रेवाखंड में नर्मदा के तट पर कई ऐसे स्थानों का उल्लेख है जहाँ नाग लोक का द्वार है। अमरकंटक के आसपास की गुफाओं में प्राचीन काल से नागों का निवास बताया गया है। नर्मदा जहाँ जन्म लेती है उस कुंड के नीचे एक गहरा रास्ता है जिसके बारे में स्थानीय पुजारी बताते हैं कि यह पाताल तक जाता है।

7. नागवासुकि मंदिर : प्रयागराज, मत्स्य पुराण

प्रयागराज में गंगा और यमुना के संगम के पास नागवासुकि का मंदिर है। मत्स्य पुराण में इस स्थान का उल्लेख मिलता है। कहा जाता है कि वासुकि यहाँ पृथ्वी पर आते थे और गंगा में स्नान करके पुनः नाग लोक लौट जाते थे। नागपंचमी पर यहाँ एक विशेष पूजा होती है जो पीढ़ियों से चली आ रही है।

मंदिरों में नाग : प्राचीन भारतीय वास्तुकला का वह रहस्य जो पत्थरों में उकेरा है

भारत के प्राचीन मंदिरों में जाएं तो एक चीज हर जगह दिखेगी। नाग। कहीं द्वार पर, कहीं खंभों पर, कहीं छत पर और कहीं देवताओं के आसपास। यह केवल सजावट नहीं है। इन नाग मूर्तियों के पीछे एक गहरी वास्तु विज्ञान की समझ है।

खजुराहो और भुवनेश्वर के मंदिरों में नाग

मध्यप्रदेश के खजुराहो के मंदिरों में नाग मूर्तियाँ बहुत विस्तृत रूप में मिलती हैं। यहाँ के चंदेल राजाओं ने जब यह मंदिर बनवाए तब उन्होंने हर द्वार पर नाग की आकृति उकेरी। खजुराहो के लक्ष्मण मंदिर के बाहरी भाग पर नागों की पंक्तियाँ हैं जो नाग बंध बनाती हैं। यह नाग बंध मंदिर की रक्षा के लिए माना जाता था।

ओडिशा के भुवनेश्वर में लिंगराज मंदिर और मुक्तेश्वर मंदिर में नाग द्वार की परंपरा है। मंदिर के प्रवेश द्वार पर दोनों तरफ नाग की मूर्तियाँ होती हैं। यह नाग रक्षक के रूप में खड़े हैं। उनका काम है कि जो अशुभ शक्तियाँ मंदिर में प्रवेश करना चाहें उन्हें रोकना।

नाग स्तंभ : मंदिरों के खंभों में नाग

दक्षिण भारत के मंदिरों में नाग स्तंभ की एक विशेष परंपरा है। यहाँ मंदिर के खंभों पर नाग की आकृतियाँ उकेरी जाती हैं। कांचीपुरम के मंदिरों में यह नाग स्तंभ बहुत प्रसिद्ध हैं। इन खंभों पर नाग इस तरह उकेरा जाता है जैसे वह खंभे को थामे हुए है। यह दर्शाता है कि जैसे शेषनाग पृथ्वी को थामे हुए हैं वैसे ही यह नाग मंदिर को थामे हुए है।

घरों की नींव में नाग होने की लोक मान्यता

भारत के कई हिस्सों में यह मान्यता आज भी जीवित है कि घर के नीचे एक नाग रहता है जो उस परिवार की रक्षा करता है। इसे वास्तु नाग या गृह नाग कहते हैं। जब कोई नया घर बनाया जाता है तो नींव खोदते समय एक विशेष पूजा की जाती है जिसमें नाग देवता से प्रार्थना की जाती है कि वे इस घर की रक्षा करें।

महाराष्ट्र में नागपंचमी पर इसी घर के नाग की पूजा होती है। घर की महिलाएं नाग की मिट्टी की मूर्ति बनाकर उसे दूध और लावा चढ़ाती हैं। यह परंपरा हजारों साल पुरानी है।

वास्तुशास्त्र में नाग का स्थान बहुत महत्वपूर्ण है। मयमतम् जो एक प्राचीन वास्तुशास्त्र ग्रंथ है उसमें लिखा है कि किसी भी भवन की नींव में पहले नाग की पूजा की जानी चाहिए। अगर किसी स्थान पर नाग का बिल हो तो वहाँ निर्माण नहीं करना चाहिए। अगर करना पड़े तो पहले नाग को सम्मानपूर्वक दूसरी जगह जाने की प्रार्थना करनी चाहिए। यह केवल अंधविश्वास नहीं था बल्कि इसके पीछे यह समझ थी कि नाग पर्यावरण संतुलन के लिए जरूरी हैं।

बौद्ध और जैन धर्म में नाग : मुचलिंद और धरणेंद्र की कथाएं

नाग केवल हिंदू धर्म का हिस्सा नहीं हैं। बौद्ध और जैन धर्म में भी नागों की उपस्थिति उतनी ही गहरी है। और दोनों में नाग की भूमिका एक जैसी है। रक्षक की भूमिका।

मुचलिंद नाग : जिसने गौतम बुद्ध की रक्षा की

बौद्ध ग्रंथों में एक बहुत प्रसिद्ध कथा है। जब गौतम बुद्ध बोधगया में ज्ञान प्राप्त कर चुके थे और ध्यान में बैठे थे तब अचानक भयंकर तूफान आया। तेज बारिश, बिजली और आँधी। उस समय मुचलिंद नाम का एक महानाग अपने बिल से निकला।

मुचलिंद ने बुद्ध के चारों ओर अपना शरीर सात बार लपेट लिया और अपने सात फनों को छाते की तरह बुद्ध के ऊपर फैला दिया ताकि बारिश और आँधी बुद्ध को परेशान न कर सके। सात दिन तक तूफान चला और सात दिन तक मुचलिंद नाग ने बुद्ध की रक्षा की।

जब तूफान थमा और आकाश साफ हुआ तब मुचलिंद ने अपना नाग रूप छोड़ा और एक सुंदर युवक का रूप लेकर बुद्ध के सामने हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। यह दृश्य बौद्ध कला में बहुत प्रचलित है। जो मुचलिंद बुद्ध की मूर्तियाँ बनाई जाती हैं उनमें बुद्ध के पीछे सात फनों वाला नाग दिखाया जाता है।

बौद्ध धर्म में नागों को बुद्ध के रक्षक माना जाता है। थेरवाद बौद्ध परंपरा में नाग राजाओं को धम्म के रक्षक कहा गया है। श्रीलंका, थाईलैंड और म्यांमार के बौद्ध मंदिरों में नाग की मूर्तियाँ अनिवार्य रूप से मिलती हैं।

धरणेंद्र नाग : पार्श्वनाथ के रक्षक

जैन धर्म में पार्श्वनाथ चौबीसवें तीर्थंकर से पहले के तेईसवें तीर्थंकर हैं। पार्श्वनाथ की कथा में एक नाग का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है।

जैन ग्रंथों के अनुसार जब पार्श्वनाथ तपस्या में लीन थे तब एक दुष्ट व्यक्ति ने उन पर पत्थर, बाण और अन्य चीजें फेंककर उन्हें परेशान करने की कोशिश की। उसी समय धरणेंद्र नाम के नाग राजा प्रकट हुए। धरणेंद्र ने अपनी पत्नी पद्मावती के साथ पार्श्वनाथ के चारों ओर सुरक्षा घेरा बना दिया। धरणेंद्र ने अपने फनों को छाते की तरह फैलाकर पार्श्वनाथ की रक्षा की।

जैन मंदिरों में पार्श्वनाथ की जो मूर्तियाँ बनाई जाती हैं उनमें हमेशा पीछे सात या ग्यारह फनों वाले नाग की आकृति होती है। यह धरणेंद्र का प्रतीक है। जैन धर्म में धरणेंद्र और पद्मावती दोनों को नाग देवता के रूप में पूजा जाता है।

बौद्ध और जैन दोनों धर्मों में नाग की रक्षक भूमिका एक जैसी है। दोनों में नाग सात फनों वाला है। दोनों में नाग ध्यानस्थ तपस्वी की रक्षा करता है। यह कोई संयोग नहीं है। दोनों धर्म भारत की उसी प्राचीन परंपरा से जन्मे हैं जिसमें नाग को एक दिव्य और रक्षक प्राणी माना जाता था। यह परंपरा हिंदू, बौद्ध और जैन तीनों से पहले की है और तीनों में जीवित है।

Naag Lok Rahasya की इस रोमांचक यात्रा का पहला पड़ाव यहाँ समाप्त होता है। हमने जाना कि नाग कहाँ से आए, गरुड़ से उनकी शत्रुता कैसे शुरू हुई, उनकी जीभ दो हिस्सों में क्यों है, उनका लोक कैसा है, उसके सात स्तर क्या हैं, उसके द्वार कहाँ हैं और मंदिरों और बौद्ध-जैन परंपराओं में नाग कैसे जीवित हैं।

भाग दो में मिलेंगे उन नागों से जो इस पूरी सभ्यता के स्तंभ हैं। शेषनाग की वह तपस्या जिसे सुनकर ब्रह्माजी भी चकित रह गए। वासुकि की वह भूमिका जो समुद्र मंथन में किसी ने नहीं देखी। तक्षक का वह सच जो केवल एक राजा को काटने की कथा नहीं है। कालिया नाग का वह रहस्य जो रमण द्वीप से शुरू होता है। मनसा देवी की अनसुनी कथा। उलूपी का वह त्याग जो महाभारत में दब गया। और नागमणि का वह सच जो अथर्ववेद में लिखा है।

॥ सर्प सूक्त – अथर्ववेद ॥
ये दिव्या ये च पार्थिवाः
ये अन्तरिक्षे ये च दिशः सर्पाः।
तेभ्यः सर्पेभ्यो नमो अस्तु॥

अर्थ – जो नाग स्वर्ग में हैं, जो पृथ्वी पर हैं, जो अंतरिक्ष में हैं और जो दिशाओं में हैं, उन सभी नागों को नमस्कार

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