भाग एक में हमने नागों की उत्पत्ति जानी, गरुड़ से उनकी शत्रुता समझी, नाग लोक के सात स्तरों का वर्णन सुना और उन द्वारों को जाना जो आज भी धरती पर मौजूद हैं। लेकिन Naag Lok Rahasya की यह यात्रा अभी आधी भी नहीं हुई।
नाग लोक की नींव हमने देखी। अब उन नागों से मिलने का समय है जिन्होंने इस सभ्यता को अर्थ दिया। शेषनाग जिनकी तपस्या ने ब्रह्माजी को भी चकित कर दिया। वासुकि जिन्होंने समुद्र मंथन में जो भूमिका निभाई वह इतिहास में दर्ज हो गई। तक्षक जिनकी कथा केवल एक राजा को काटने की कथा नहीं है। कालिया नाग जिनका रहस्य रमण द्वीप से शुरू होता है। मनसा देवी जो नाग लोक की सबसे शक्तिशाली देवी हैं। उलूपी जिनका त्याग महाभारत में दब गया। और नागमणि जिसका सच अथर्ववेद में लिखा है।
॥ शेषनाग स्तुति ॥
अनन्तं वासुकिं शेषं पद्मनाभं च कम्बलम्।
शंखपालं धृतराष्ट्रं च तक्षकं कालियं तथा॥
एतानि नव नामानि नागानां च महात्मनाम्।
~ महाभारत आदिपर्व, नाग स्तोत्र
1. शेषनाग : वह तपस्या जिसने एक नाग को सृष्टि का आधार बना दिया
शेषनाग को अनंत भी कहते हैं। यह नाम इसलिए पड़ा क्योंकि उनका कोई अंत नहीं है। लेकिन यह नाम उन्हें जन्म से नहीं मिला। यह नाम उन्होंने अपनी तपस्या से कमाया।
जब कद्रू के सभी नाग पुत्र धीरे-धीरे अपने स्वभाव में आने लगे तो शेषनाग ने देखा कि उनके भाई छल, क्रोध और अहंकार में डूब रहे हैं। शेषनाग को यह पसंद नहीं था। उन्होंने अपने भाइयों से अलग होने का निर्णय लिया।
शेषनाग ने गंधमादन पर्वत पर जाकर घोर तपस्या शुरू की। वे केवल वायु पीकर रहते थे। उन्होंने अपने शरीर को इतना कृश कर लिया कि हड्डियाँ दिखने लगीं। वर्षों तक वे एक ही स्थान पर बैठे रहे। फिर वे बद्रिकाश्रम गए और वहाँ और कठोर तपस्या की।
ब्रह्माजी का वह प्रश्न और शेषनाग का उत्तर
इतनी कठोर तपस्या देखकर ब्रह्माजी प्रकट हुए। उन्होंने शेषनाग से पूछा कि तुम यह कठोर तप क्यों कर रहे हो? शेषनाग ने कहा कि मेरे भाई हमेशा क्रोध में रहते हैं, दूसरों को कष्ट देते हैं। मैं उनके साथ नहीं रहना चाहता। मैं चाहता हूँ कि मेरा मन हमेशा धर्म में लगा रहे।
यह सुनकर ब्रह्माजी बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा कि तुम्हारी यह इच्छा पूरी होगी। लेकिन मैं तुमसे एक काम करवाना चाहता हूँ। यह पृथ्वी अस्थिर है। इसे कोई थामने वाला चाहिए। क्या तुम इस पृथ्वी को अपने फन पर धारण करोगे?
शेषनाग ने तुरंत हाँ कर दी। ब्रह्माजी ने उन्हें पाताल में प्रवेश करने का मार्ग दिखाया। शेषनाग पाताल के सबसे निचले स्तर में पहुँचे और वहाँ से पृथ्वी को अपने एक फन पर उठा लिया। तब से शेषनाग पृथ्वी के आधार हैं।
शेषनाग और विष्णु का वह संबंध
ब्रह्माजी ने शेषनाग को पृथ्वी का आधार बनाया। लेकिन विष्णु ने उन्हें अपना शयनासन क्यों बनाया? इसके पीछे एक कथा है जो भागवत पुराण में मिलती है।
जब शेषनाग पृथ्वी को थामे हुए क्षीर सागर में बैठे थे तब विष्णु वहाँ आए। विष्णु ने शेषनाग को देखा और पूछा कि तुम इतने शांत और स्थिर कैसे हो? शेषनाग ने कहा कि जब मन में कोई इच्छा नहीं होती, जब कोई लक्ष्य नहीं होता सिवाय धर्म के, तब स्थिरता अपने आप आती है।
यह सुनकर विष्णु ने कहा कि जो पूर्ण समर्पण का प्रतीक है वही मेरा आसन हो सकता है। तब से विष्णु शेषनाग पर शयन करते हैं। यह शयन साधारण नींद नहीं है। यह योग निद्रा है। विष्णु जागते हुए सोते हैं और इस पूरी सृष्टि की देखरेख करते हैं।
शेषनाग के एक हजार फन और प्रलय की अग्नि
भागवत पुराण में शेषनाग के एक हजार फनों का वर्णन है। वेद में एक हजार का अर्थ होता है अनंत। यानी शेषनाग अनंत दिशाओं में फैले हैं। उनके हर फन पर एक रत्न है जिसकी चमक से पाताल प्रकाशित रहता है।
विष्णु पुराण यहाँ एक अलग बात कहता है। जब कल्प का अंत होता है और प्रलय आती है तब शेषनाग के मुख से संकर्षण अग्नि निकलती है। यह वह अग्नि है जो पूरी सृष्टि को भस्म कर देती है। यानी जो पूरी सृष्टि का आधार है वही उसके अंत का कारण भी बनता है। यह सृष्टि का सबसे बड़ा रहस्य है।
पुराणों का एक गुप्त संकेत :- भागवत पुराण में एक श्लोक है जिसमें कहा गया है कि शेषनाग जब अपना फन हिलाते हैं तब भूकंप आता है। प्राचीन भारत में भूकंप की यही व्याख्या थी। आज का विज्ञान टेक्टोनिक प्लेटों की बात करता है। दोनों एक ही सत्य को अलग-अलग भाषा में कह रहे हैं। टेक्टोनिक प्लेटें यानी वह शक्ति जो धरती के नीचे है और जो धरती को हिला देती है। शेषनाग उसी शक्ति का पौराणिक प्रतीक हैं।
Naag Lok Rahasya Part 1 – नागों की उत्पत्ति, पाताल के सात स्तर और नाग लोक के प्राचीन द्वार
2. वासुकि : समुद्र मंथन में वह भूमिका जो इतिहास ने नहीं देखी
Naag Lok Rahasya में वासुकि नाग लोक के राजा हैं। लेकिन उनकी सबसे प्रसिद्ध कथा नाग लोक की नहीं बल्कि समुद्र मंथन की है। जब देवताओं और असुरों ने मिलकर समुद्र मंथन का निर्णय किया तब मंदराचल पर्वत को मथानी बनाया गया और वासुकि को रस्सी।
यह सोचकर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं। एक प्रतापी नागराज ने सृष्टि के कल्याण हेतु स्वयं को रस्सी की तरह प्रस्तुत किया। वासुकि का पूरा शरीर मंदराचल पर्वत से लिपटा था। देवता एक तरफ से उनकी पूंछ पकड़कर खींचते थे और असुर दूसरी तरफ से सिर पकड़कर खींचते थे।
वासुकि के मुख से निकला विष और उनका दर्द
समुद्र मंथन में वासुकि को जो कष्ट हुआ वह अकल्पनीय था। मंदराचल पर्वत का भार उनके शरीर पर था। देवताओं और असुरों की खिंचाई से उनका शरीर घायल हो रहा था। इस असहनीय पीड़ा से वासुकि के मुख से विष निकलने लगा। यह विष इतना शक्तिशाली था कि जो भी उसके संपर्क में आता वह नष्ट हो जाता।
उसी विष से हलाहल बना जो समुद्र से निकला। पूरी सृष्टि खतरे में पड़ गई। तब शिव ने वह विष पिया और नीलकंठ बन गए। लेकिन इस पूरी कथा में यह नहीं बताया जाता कि वह विष वासुकि के कष्ट का परिणाम था। वासुकि ने अपना कष्ट सहते हुए भी अपनी जिम्मेदारी नहीं छोड़ी।
वासुकि ने यह सब क्यों स्वीकार किया
यह सवाल यहाँ प्रासंगिक है। वासुकि नाग लोक के राजा थे। उनमें इतनी शक्ति थी कि वे इस सब से इनकार कर सकते थे। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया।
शिव पुराण में इसका उत्तर मिलता है। वासुकि शिव के परम भक्त थे। जब विष्णु ने समुद्र मंथन की योजना बनाई तब वासुकि के पास गए और उनसे प्रार्थना की। वासुकि ने सोचा कि यह मंथन पूरी सृष्टि के कल्याण के लिए है। उसमें मेरा व्यक्तिगत कष्ट क्या मायने रखता है। उन्होंने हाँ कर दी।
यही वासुकि की महानता है। वे अपने व्यक्तिगत दर्द को सृष्टि के कल्याण से छोटा मानते थे। इसीलिए शिव ने उन्हें अपने गले में धारण किया। यह केवल आभूषण नहीं था। यह उस बलिदान का सम्मान था जो वासुकि ने समुद्र मंथन में दिया था।
एक कम चर्चित प्रसंग :- शिव पुराण में लिखा है कि शिव के शरीर पर जो नाग हैं वे केवल वासुकि नहीं हैं। शिव के कड़े नाग के हैं, उनका जनेऊ नाग का है, उनकी भुजाओं में नाग लिपटे हैं और उनके जटाजूट में भी नाग हैं। यानी शिव का पूरा श्रृंगार नागों से है। इसका अर्थ है कि शिव ने पूरे नाग कुल को अपने साथ रखा। यह उनकी उस प्रतिज्ञा का प्रतीक है कि जो उनकी शरण में आए उन्हें वे कभी नहीं छोड़ते।
3. तक्षक : तक्षशिला से परीक्षित वध तक वह पूरी कथा जो कोई नहीं जानता
Naag Lok Rahasya की कथाओं में तक्षक नाग लोक का सबसे विवादास्पद नाम है। कुछ लोग उन्हें खलनायक मानते हैं क्योंकि उन्होंने राजा परीक्षित को काटा। लेकिन तक्षक की पूरी कथा जानने के बाद यह निर्णय इतना आसान नहीं रहता।
तक्षक का मूल निवास तक्षशिला में था। आज के पाकिस्तान में जहाँ तक्षशिला के खंडहर हैं वह कभी तक्षक नाग की नगरी थी। महाभारत में यह स्पष्ट लिखा है। तक्षशिला का अर्थ है तक्षक की शिला। यह नगरी बाद में एक महान विश्वविद्यालय के रूप में विकसित हुई लेकिन उसकी नींव में नागों का इतिहास था।
परीक्षित और श्राप की कथा
राजा परीक्षित अर्जुन के पोते थे। एक दिन वे शिकार पर गए और जंगल में एक ऋषि को ध्यान में बैठे पाया। परीक्षित ने ऋषि से पानी माँगा लेकिन ध्यान में लीन ऋषि ने कोई उत्तर नहीं दिया। परीक्षित को क्रोध आया। उन्होंने एक मृत सांप उठाया और ऋषि के गले में डाल दिया।
जब ऋषि के पुत्र श्रृंगी को यह पता चला तो उन्होंने क्रोध में परीक्षित को श्राप दिया कि सात दिन के भीतर तक्षक नाग उन्हें काट लेगा। परीक्षित को जब यह पता चला तो उन्होंने एक ऊँचे महल पर शरण ली जहाँ कोई सांप नहीं पहुँच सकता था।
तक्षक का वह रास्ता जो किसी ने नहीं सोचा था
तक्षक ने परीक्षित तक पहुँचने का एक अद्भुत तरीका खोजा। उन्होंने अपने कुछ साथी नागों को फल बेचने वाले ब्राह्मणों का रूप दिलवाया। वे फलों की टोकरियाँ लेकर महल में गए। परीक्षित ने उन्हें अंदर आने दिया।
उन फलों में से एक फल में तक्षक स्वयं एक छोटे कीड़े के रूप में छुपे थे। जब परीक्षित ने वह फल उठाया तो तक्षक ने अपना असली रूप लिया और परीक्षित को काट लिया। श्राप पूरा हुआ।
तक्षक और ऋषि कश्यप की वह मुलाकात
जब तक्षक परीक्षित के पास जा रहे थे तब रास्ते में उन्हें ऋषि कश्यप मिले। कश्यप ने कहा कि मैं जानता हूँ कि तुम परीक्षित को काटने जा रहे हो। मैं उन्हें बचाने जा रहा हूँ। तक्षक ने कश्यप से पूछा कि क्या तुम मेरे विष का असर खत्म कर सकते हो?
तक्षक ने एक पेड़ को काटकर भस्म कर दिया और फिर कश्यप से कहा कि अब इसे जीवित करो। कश्यप ने मंत्रों से उस पेड़ को वापस जीवित कर दिया। तब तक्षक ने कश्यप को बहुत सारा धन देकर वापस भेज दिया और कहा कि परीक्षित का जाना नियति है। उसे रोका नहीं जा सकता।
रहस्य जो कथाओं में छिप गया :- महाभारत में यह भी लिखा है कि जब जनमेजय का नाग यज्ञ हो रहा था तब तक्षक बचने के लिए इंद्र की शरण में गए। वे इंद्र के सिंहासन से लिपट गए। जब यज्ञ की आग ने तक्षक को खींचना शुरू किया तो इंद्र सहित तक्षक आग की ओर खिंचने लगे। यानी वह यज्ञ इतना शक्तिशाली था कि स्वर्ग के राजा इंद्र भी उसमें खिंच सकते थे। तब ऋत्विजों ने मंत्र बंद किए और तक्षक बचे।
4. कालिया नाग : रमण द्वीप से यमुना तक वह पूरी कथा
Naag Lok Rahasya से जुड़ी कालिया नाग की कथा भागवत पुराण के दसवें स्कंध में विस्तार से है। कृष्ण ने कालिया को नाथा और उनके फन पर नृत्य किया। यह छवि बहुत प्रसिद्ध है। लेकिन इस कथा का आरंभ बहुत कम लोग जानते हैं।
कालिया पहले रमण द्वीप में रहते थे। रमण द्वीप यमुना नदी के भीतर का एक विशेष स्थान था जिसे नागों का एक निवास माना जाता था। वहाँ गरुड़ हर महीने आकर नागों को खाता था। एक बार कालिया ने गरुड़ का प्रतिरोध किया और उसे घायल कर दिया। इससे गरुड़ क्रोधित हो गए और कालिया के पीछे पड़ गए।
ऋषि का श्राप और यमुना में शरण
कालिया को एक ऋषि का श्राप था जो उन्होंने पहले किसी कारण से दिया था। उस श्राप में कहा गया था कि अगर कालिया यमुना में जाएंगे तो गरुड़ वहाँ नहीं आएगा क्योंकि गरुड़ को उस ऋषि का भय था।
इसीलिए कालिया ने यमुना को अपना घर बनाया। वे वहाँ सुरक्षित थे। लेकिन उनके विष से यमुना का पानी इतना जहरीला हो गया कि उसके पास से गुजरने वाले पक्षी भी मर जाते थे। यमुना के किनारे के पेड़ सूखने लगे। वृंदावन के लोगों का जीवन कठिन हो गया।
कृष्ण और कालिया का वह संघर्ष
एक दिन कृष्ण की गेंद यमुना में गिर गई। वे उसे लेने यमुना में कूद गए। कालिया ने उन्हें देखा और अपने फनों से जकड़ लिया। कृष्ण के साथी किनारे पर खड़े रो रहे थे।
तब कृष्ण ने अपना असली स्वरूप दिखाया। उनका शरीर इतना विशाल हो गया कि कालिया की पकड़ ढीली पड़ गई। कृष्ण कालिया के फनों पर चढ़ गए और नृत्य करने लगे। हर थाप के साथ कालिया का एक-एक अहंकार टूटता गया।
कालिया की पत्नियों की वह प्रार्थना
जब कालिया थकने लगे तब उनकी पत्नियाँ कृष्ण के सामने आईं। उन्होंने कहा कि हे प्रभु यह हमारे पति हैं। इन्होंने गरुड़ से बचने के लिए यहाँ शरण ली थी। इन्होंने यमुना का पानी जहरीला किया यह सच है लेकिन इनका इरादा किसी को नुकसान पहुँचाना नहीं था। इन्हें क्षमा करो।
कृष्ण ने कालिया को क्षमा किया। उन्होंने कहा कि तुम रमण द्वीप वापस जाओ। अब गरुड़ तुम्हें नहीं खाएगा क्योंकि तुम्हारे फनों पर मेरे चरणों के निशान हैं। गरुड़ मेरे चरण चिह्नों का सम्मान करेगा।
लोककथाओं से परे का सच :- भागवत पुराण में लिखा है कि जब कृष्ण कालिया के फन पर नृत्य कर रहे थे तब उनके पैरों की छाप कालिया के फनों पर पड़ गई। इसीलिए कालिया के वंशजों के फनों पर श्रीचक्र का चिह्न होता है। रमण द्वीप में जो नाग रहते हैं उनके फनों पर यह चिह्न होता है। स्थानीय परंपरा में रमण द्वीप को आज के श्रीलंका के पास का एक द्वीप माना जाता है।
5. मनसा देवी — शिव की पुत्री जिनकी कथा बंगाल से नेपाल तक जीवित है
Naag Lok Rahasya मनसा देवी नाग लोक की सबसे शक्तिशाली देवी हैं। वे वासुकि की बहन हैं और शिव की पुत्री मानी जाती हैं। उनकी कथा पूर्वोत्तर भारत और बंगाल में इतनी गहरी जड़ें जमाए हुए है कि वहाँ मनसा पूजा एक प्रमुख त्योहार है।
मनसा देवी की उत्पत्ति की कथा देवी भागवत पुराण में मिलती है। एक बार शिव ध्यान में बैठे थे। उनके मन में एक विचार आया और उस विचार की ऊर्जा से एक कन्या का जन्म हुआ। यह कन्या थी मनसा। शिव ने उन्हें नाग लोक में रखा और वासुकि ने उनकी देखभाल की।
मनसा देवी और जरत्कारु ऋषि का विवाह
नागों को ब्रह्माजी के श्राप से बचाने के लिए आस्तीक का जन्म जरूरी था। और आस्तीक के जन्म के लिए मनसा देवी का विवाह जरत्कारु ऋषि से होना जरूरी था। लेकिन जरत्कारु ऋषि विवाह नहीं करना चाहते थे।
मनसा देवी ने अपने पितरों को तर्पण करने वाले जरत्कारु ऋषि को खोजा। उन्होंने ऋषि के सामने आकर कहा कि मैं आपसे विवाह करना चाहती हूँ। ऋषि ने कहा कि मैं विवाह केवल तब करूँगा जब मेरी पत्नी का नाम मेरे जैसा हो और जब वह मेरा बोझ न बने। मनसा का नाम था जरत्कारु। इसलिए विवाह हो गया।
मनसा देवी का वह त्याग
विवाह के बाद एक दिन ऋषि जरत्कारु सो रहे थे और सूर्यास्त होने वाला था। मनसा ने उन्हें जगाया ताकि वे संध्यावंदन कर सकें। ऋषि क्रोधित हो गए। उन्होंने कहा कि तुमने मुझे जगाया यानी तुमने मुझ पर विश्वास नहीं किया। मैं तुम्हें छोड़कर जाता हूँ।
मनसा देवी ने कोई प्रतिरोध नहीं किया। वे जानती थीं कि आस्तीक उनके गर्भ में है और उसका जन्म होना जरूरी है। उन्होंने ऋषि को जाने दिया और अकेले आस्तीक को जन्म दिया। आस्तीक वही बने जिन्होंने जनमेजय के यज्ञ को रोका और नाग जाति को बचाया।
एक अनकहा तथ्य :- मनसा देवी की पूजा केवल बंगाल में नहीं होती। नेपाल में भी मनसा देवी का एक प्रसिद्ध मंदिर है। असम में उन्हें बिषहरी कहते हैं यानी जो विष को हर ले। उड़ीसा में उन्हें पद्मावती कहते हैं। झारखंड में आदिवासी समुदाय में मनसा देवी की पूजा एक अलग रूप में होती है। यह बताता है कि मनसा देवी की उपासना परंपरा पूरे पूर्वी और उत्तर-पूर्वी भारत में एक साथ चली आ रही है और यह केवल एक क्षेत्र की देवी नहीं हैं।
6. उलूपी : नागराज कौरव्य की पुत्री जिनका त्याग महाभारत में दब गया
Naag Lok Rahasya के पन्नों में, उलूपी महाभारत के उन पात्रों में से हैं जिनके बारे में बहुत कम बात होती है। लेकिन उनकी भूमिका उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी द्रौपदी या सुभद्रा की।
उलूपी नाग लोक के राजा कौरव्य की पुत्री थीं। उनका पहले विवाह हुआ था लेकिन उनके पति का देहांत हो गया था। जब अर्जुन तीर्थयात्रा पर गंगा के तट पर थे तब उलूपी ने उन्हें गंगा की धारा में खींचकर नाग लोक ले गईं।
उलूपी और अर्जुन का विवाह
नाग लोक में उलूपी ने अर्जुन से कहा कि मैं तुमसे प्रेम करती हूँ। तुम मुझसे विवाह करो। अर्जुन ने कहा कि मैं तो युधिष्ठिर के आदेश से तीर्थयात्रा पर हूँ और मेरा एक वर्ष का ब्रह्मचर्य का नियम है। उलूपी ने कहा कि तुम्हारा नियम द्रौपदी के साथ है। मेरे साथ विवाह उस नियम का उल्लंघन नहीं होगा।
अर्जुन ने विवाह किया। उनके पुत्र हुए इरावन जो नाग और मनुष्य दोनों के संयोग से जन्मे थे। इरावन महाभारत के युद्ध में लड़े और वीरगति को प्राप्त हुए।
उलूपी का वह उपकार जो किसी ने नहीं देखा
महाभारत युद्ध के बाद एक घटना हुई जो उलूपी के बारे में सब कुछ कह देती है। अश्वत्थामा ने जब ब्रह्मास्त्र छोड़ा तो भीष्म पितामह के श्राप के कारण अर्जुन की मृत्यु हो गई। चित्रांगदा जो अर्जुन की दूसरी पत्नी थीं और उलूपी दोनों वहाँ पहुँचीं।
उलूपी ने अपने पास रखा एक दिव्य मणि अर्जुन के शरीर पर रखी। इस मणि की शक्ति से अर्जुन जीवित हो गए। उलूपी ने नाग लोक की अपनी सबसे बड़ी शक्ति अर्जुन के लिए खर्च कर दी। यह प्रसंग महाभारत में है लेकिन इसके बारे में बहुत कम बात होती है।
दक्षिण भारत की जीवित परंपरा :- उलूपी के पुत्र इरावन की कथा तमिलनाडु में बहुत प्रसिद्ध है। वहाँ उन्हें अरावन कहते हैं और उनकी पूजा होती है। कुवागम गाँव में हर साल अरावन उत्सव मनाया जाता है। इस उत्सव में अरावन के बलिदान को याद किया जाता है। यह परंपरा दो हजार साल से अधिक पुरानी मानी जाती है। उलूपी की कथा दक्षिण भारत में इस रूप में आज भी जीवित है। और नागमणि का वह रहस्य जो अथर्ववेद में लिखा है
7. महाभारत के प्रमुख नाग पात्र — एक संदर्भ तालिका
| नाग का नाम | पुराण/ग्रंथ | भूमिका |
| शेषनाग/अनंत | भागवत, विष्णु पुराण | पृथ्वी का आधार, विष्णु का शयनासन |
| वासुकि | महाभारत, शिव पुराण | नाग लोक के राजा, समुद्र मंथन में रस्सी |
| तक्षक | महाभारत आदिपर्व | तक्षशिला के स्वामी, परीक्षित वध |
| कालिया | भागवत पुराण दसवाँ स्कंध | यमुना में निवास, कृष्ण द्वारा नाथा गया |
| कर्कोटक | महाभारत वनपर्व | राजा नल की सहायता |
| आर्यक | महाभारत | परीक्षित के नाना, नाग लोक के प्रमुख |
| कौरव्य | महाभारत | उलूपी के पिता, नाग राजा |
| अश्वसेन | महाभारत | तक्षक का पुत्र, अर्जुन का शत्रु |
| एलापत्र | महाभारत | वर्षा के स्वामी नाग |
| धनंजय नाग | महाभारत | धन और वैभव के रक्षक |
8. नागमणि — अथर्ववेद और गरुड़ पुराण में क्या लिखा है
Naag Lok Rahasya का अंतिम पड़ाव है नागमणि। यह नाम सुनते ही लोगों के मन में एक चमकती हुई पत्थर की छवि आती है। फिल्मों और लोक कथाओं ने इसे इतना रहस्यमय बना दिया है कि असल सच कहीं दब गया है। तो पुराणों और वेदों में नागमणि के बारे में क्या लिखा है?
अथर्ववेद में नाग रत्न का उल्लेख
अथर्ववेद के नाग सूक्त में नाग रत्न का उल्लेख मिलता है। वहाँ लिखा है कि कुछ विशेष नागों के पास एक दिव्य रत्न होता है। यह रत्न उस नाग की शक्ति का केंद्र होता है। जब नाग पानी पीता है या भोजन करता है तब वह मणि उसके मुँह से बाहर रखता है।
अथर्ववेद में यह भी लिखा है कि जो इस मणि को देख ले वह नाग के प्रकोप से मुक्त हो जाता है। इसका अर्थ है कि नागमणि देखने मात्र से एक शक्ति का संचार होता है।
गरुड़ पुराण में नागमणि का विस्तृत वर्णन
गरुड़ पुराण में नागमणि का वर्णन मिलता है। वहाँ लिखा है कि यह मणि हर नाग के पास नहीं होती। केवल वे नाग जो सैकड़ों वर्ष तपस्या करते हैं या जो अत्यंत शक्तिशाली कुल से होते हैं उनके पास यह मणि होती है। इसे नागहार भी कहा जाता है।
गरुड़ पुराण में नागमणि के गुण बताए गए हैं। यह मणि अंधेरे में चमकती है। इसके पास रखने से विष का असर नहीं होता। इसे धारण करने वाला रोगमुक्त रहता है। और जो इसे पा लेता है उसे धन और ऐश्वर्य की कमी नहीं रहती।
नागमणि का दार्शनिक अर्थ
पुराणों में नागमणि का जो वर्णन है वह केवल एक भौतिक पत्थर का वर्णन नहीं है। यह एक दिव्य शक्ति का प्रतीक है। नाग सैकड़ों वर्षों की तपस्या से जो ऊर्जा अर्जित करता है वह उसकी मणि में संचित हो जाती है। यह ऊर्जा भौतिक नहीं बल्कि आत्मिक है। यही नागमणि का असली रहस्य है।
महाकाव्य का एक और रहस्य :- महाभारत में अश्वत्थामा के माथे की मणि का उल्लेख है। जब कृष्ण ने अश्वत्थामा को दंड दिया तब उनके माथे से मणि निकाली गई। उस मणि के बारे में कहा गया कि यह नागमणि के समतुल्य है। इसके कारण अश्वत्थामा को कभी किसी जीव का भय नहीं था, कभी भूख प्यास नहीं लगती थी और कोई रोग नहीं होता था। जब मणि निकाली गई तब ये सारे गुण नष्ट हो गए। यह नागमणि की शक्ति का सबसे स्पष्ट उदाहरण है जो महाभारत में मिलता है।
Naag Lok Rahasya भाग दो की यह यात्रा यहाँ समाप्त होती है। हमने शेषनाग की वह तपस्या जानी जिसने उन्हें सृष्टि का आधार बनाया। वासुकि का वह बलिदान देखा जो समुद्र मंथन में हुआ। तक्षक की पूरी कथा सुनी जो तक्षशिला से शुरू होती है। कालिया नाग का वह सच जाना जो रमण द्वीप से यमुना तक फैला है। मनसा देवी की अनसुनी कथा सुनी। उलूपी का वह त्याग देखा जो महाभारत में दब गया था। और नागमणि का वह सच समझा जो वेदों में लिखा है।
भाग तीन में जानेंगे शिव और नाग का वह गहरा रिश्ता, विष्णु और शेषनाग का क्षी सागर दर्शन, जनमेजय के नाग यज्ञ की पूरी कथा, आस्तीक की यात्रा, कुंडलिनी और नाग का संबंध, कालसर्प दोष का पौराणिक आधार और नागपंचमी का असली रहस्य।
॥ अनंत शयन स्तोत्र ॥
आदिशेषं महाविष्णुं शेषशायिनमच्युतम्।
अनन्तं पुरुषं ध्यायेत् सर्वपापविनाशनम्॥
अर्थ :- आदिशेष पर शयन करने वाले महाविष्णु अच्युत और अनंत का ध्यान करने से समस्त पापों का नाश होता है
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