Hinglaj mata mandir

Hinglaj Mata Mandir: 15 चौंकाने वाले रहस्य, इतिहास, शक्तिपीठ और यात्रा गाइड

Hinglaj Mata Mandir : दोस्तों, जब भी हम किसी मंदिर की कल्पना करते हैं, तो हमारे मन में ऊँचे शिखर, सुंदर नक्काशी, घंटियों की मधुर आवाज और हरे-भरे पहाड़ों का दृश्य उभर आता है। लेकिन Hinglaj Mata Mandir इन सबसे बिल्कुल अलग है। यहाँ पहुँचने के लिए किसी आलीशान गाड़ी की नहीं, बल्कि अपने अहंकार को छोड़कर तपती रेत पर नंगे पैर चलने के साहस की जरूरत होती है।

बलूचिस्तान के सूखे, पथरीले पहाड़ों और अंतहीन मरुस्थल के बीच स्थित यह पवित्र धाम केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि ऐसी जाग्रत शक्ति का केंद्र है जहाँ सदियों से हिंदू और मुस्लिम दोनों श्रद्धा से सिर झुकाते आए हैं।

पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में बहने वाली हिंगोल नदी के पश्चिमी तट पर एक प्राकृतिक पहाड़ी गुफा के भीतर स्थित Hinglaj Mata Mandir 51 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। कराची से लगभग 250 किलोमीटर दूर बसे इस कठिन मरुस्थलीय क्षेत्र को शास्त्रों में ‘मरुतीर्थ’ यानी रेगिस्तान का पावन धाम कहा गया है। इस लेख में हम माँ हिंगलाज के इस दिव्य दरबार का इतिहास, इससे जुड़े रोंगटे खड़े कर देने वाले रहस्य, भगवान राम की प्रायश्चित यात्रा, बोलन दर्रे की अनसुनी कहानियाँ और इस शक्तिपीठ की पौराणिक मान्यताओं को बिल्कुल सरल और आम बोलचाल की भाषा में विस्तार से जानेंगे।

Table of Contents

आदिशक्ति की उत्पत्ति: 51 शक्तिपीठों में माँ हिंगलाज का सर्वोच्च स्थान

Hinglaj Mata Mandir का इतिहास सीधे तौर पर सनातन धर्म के सबसे प्राचीन और पवित्र प्रसंग, यानी 51 शक्तिपीठों के निर्माण से जुड़ा हुआ है। सनातनी ग्रंथों के अनुसार, सतयुग में राजा दक्ष प्रजापति (जो ब्रह्मा जी के मानस पुत्र थे) ने अपनी पुत्री सती का विवाह महादेव के साथ उनकी इच्छा के विरुद्ध होने के कारण मन में गहरी ईर्ष्या पाल ली थी।

एक बार राजा दक्ष ने एक बहुत ही भव्य ‘कनखल’ (हरिद्वार) में महायज्ञ का आयोजन किया। इस यज्ञ में संसार के सभी देवी-देवताओं, ऋषियों और गंधर्वों को आदरपूर्वक आमंत्रित किया गया, लेकिन जानबूझकर महादेव और माता सती को कोई निमंत्रण नहीं भेजा गया।

जब माता सती को इस यज्ञ के बारे में पता चला, तो उन्होंने अपने पति शिव के समझाने के बावजूद अपने पिता के घर जाने का निर्णय लिया। सती जब बिना बुलाए वहाँ पहुँचीं, तो राजा दक्ष ने न केवल उनका अपमान किया, बल्कि पूरी सभा के सामने भगवान शिव को भी अत्यंत कटु और अपमानजनक शब्द कहे। अपने आराध्य और पति का ऐसा भयानक अनादर सती बर्दाश्त नहीं कर सकीं। गहरे मानसिक आघात और ग्लानि के कारण उन्होंने यज्ञ की प्रज्वलित अग्नि कुंड में कूदकर अपने प्राणों की आहुति दे दी।

सती के आत्मदाह का समाचार सुनते ही महादेव अत्यंत क्रोधित हो उठे। उन्होंने वीरभद्र अवतार प्रकट कर राजा दक्ष का यज्ञ नष्ट कर दिया और उनका सिर धड़ से अलग कर दिया। सती के वियोग में गहरे शोक में डूबे भगवान शिव ने उनकी पार्थिव देह को अपने कंधों पर उठा लिया और ब्रह्मांड में प्रलयंकारी ‘रुद्र तांडव’ करने लगे। महादेव के इस महाक्रोध से पूरी सृष्टि के विनाश का संकट खड़ा हो गया। ब्रह्मांड को इस महाप्रलय से बचाने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के मृत शरीर को धीरे-धीरे 51 भागों में विभाजित कर दिया।

धरती के अलग-अलग कोनों में सती के जो 51 अंग और आभूषण गिरे, वे सभी स्थान परम पूजनीय ‘शक्तिपीठ’ बन गए। इस पावन भौगोलिक विभाजन में, बलूचिस्तान की दुर्गम पहाड़ियों के बीच स्थित इस गुफा में माता सती का ‘ब्रह्मरंध्र’ (यानी सिर का सबसे ऊपरी हिस्सा या ऊर्जा का मुख्य केंद्र) गिरा था। सिर का हिस्सा गिरने के कारण ही इस स्थान को अद्भुत मानसिक शक्ति, आत्मिक शांति और ध्यान लगाने के लिए सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।

शास्त्रों और पुराणों में माँ हिंगलाज के जाग्रत श्लोक और महामंत्र

माँ हिंगलाज की दिव्य महिमा केवल लोककथाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत के सबसे प्राचीन और प्रामाणिक ग्रंथों में इसके स्पष्ट प्रमाण मिलते हैं। यहाँ शास्त्रों में दिए गए कुछ ऐसे ही पावन श्लोक और मंत्र उनके सरल अर्थ के साथ दिए जा रहे हैं जो इसकी महत्ता को स्थापित करते हैं:

(क) तंत्रचूड़ामणि (पीठनिर्णय) का दिव्य श्लोक

सनातनी तंत्र ग्रंथों में ‘पीठनिर्णय’ को सबसे विश्वसनीय माना जाता है। इसमें माँ हिंगलाज की भौगोलिक स्थिति, सती के अंग और वहाँ के रक्षक भैरव का सविस्तार वर्णन इस प्रकार मिलता है:

ब्रह्मरन्ध्रं हिंगुलायां भैरवो भीमलोचनः।
कोट्टरी सा महामाया त्रिगुणा या दिगम्बरी॥

सरल हिंदी अर्थ: इस श्लोक का अर्थ है कि बलूचिस्तान के हिंगुला (हिंगलाज) क्षेत्र में सती माता का ‘ब्रह्मरंध्र’ (मस्तिष्क का सबसे ऊपरी हिस्सा) गिरा था। यहाँ की अधिष्ठात्री देवी को ‘कोट्टरी’ (जिन्हें महामाया, तीनों गुणों से युक्त त्रिगुणा और दिगम्बरी भी कहा जाता है) के नाम से पूजा जाता है और इस स्थान की रक्षा करने वाले साक्षात शिव के रूप ‘भीमलोचन’ भैरव हैं।

(ख) देवी भागवत पुराण का जाग्रत श्लोक

देवी भागवत महापुराण में भी माँ हिंगुला के करुणामयी और शक्तिशाली भीमरूपिणी स्वरूप का वर्णन इस श्लोक के माध्यम से किया गया है:

हिंगुलायां भगवती कोटराख्या भीमरूपिणी।

सरल हिंदी अर्थ: इस पावन श्लोक का अर्थ है कि हिंगुला तीर्थ में स्वयं आदिशक्ति भगवती ‘कोट्टरी’ (कोटराख्या) के नाम से विराजती हैं, जो भीमरूपिणी (भक्तों के दुखों का नाश करने के लिए अत्यंत जाग्रत, ओजस्वी और शक्तिशाली रूप धारण करने वाली) हैं।

(ग) माँ हिंगलाज का महामंत्र

साधकों और तांत्रिकों के बीच माँ हिंगलाज का यह मंत्र अत्यंत चमत्कारी माना जाता है। इसे ‘हिंगुला महामंत्र’ कहा जाता है:

ॐ हिंगुले परम हिंगुले, अमृत-रूपिणि।
तनु शक्ति मनः शिवे, श्री हिंगुलाय नमः स्वाहा॥

सरल हिंदी अर्थ: हे माँ हिंगुले! आप आदि और अंत से परे परम शक्ति हैं। आप अमृत के समान मधुर और सभी प्रकार के शारीरिक व मानसिक कष्टों का नाश करने वाली अमृत स्वरूपा हैं। आप हमारे शरीर (तनु), हमारी आंतरिक शक्ति और हमारे मन को पवित्र करके शिव की भक्ति में लीन करने वाली हैं। माँ हिंगलाज, हम आपके चरणों में बारंबार प्रणाम करते हैं और इस जीवन को आपके चरणों में समर्पित करते हैं।

असुर हिंगोल की पौराणिक कथा और नाम के पीछे का औषधीय रहस्य

माँ हिंगलाज के इस पावन स्थल के नामकरण के पीछे सतयुग के समय की एक बेहद प्रसिद्ध लोककथा भी है। कहा जाता है कि प्राचीन काल में ततारी मंगोल वंश में विचितर नाम के एक पराक्रमी राजा राज करते थे। उनके दो बेहद बलशाली लेकिन क्रूर पुत्र थे – हिंगोल और सुंदर। दोनों भाई अपनी शक्ति के अहंकार में चूर होकर प्रजा पर भयंकर अत्याचार करते थे।

प्रजा की व्याकुल पुकार सुनकर भगवान शिव की आज्ञा से भगवान गणेश ने तीन दिनों के भीषण युद्ध के बाद छोटे भाई सुंदर का वध कर दिया। अपने भाई की मृत्यु से बौखलाए हिंगोल ने कई वर्षों तक कठिन तपस्या की और वरदान प्राप्त कर लिया कि कोई भी जीवित प्राणी उसे किसी ऐसी खुली जगह पर नहीं मार पाएगा जहाँ सूर्य की रोशनी पहुँचती हो। साथ ही उसे किसी भी पारंपरिक धातु के हथियार से न मारे जाने का वरदान भी मिला।

इस वरदान को पाकर हिंगोल खुद को भगवान मानने लगा और उसने यज्ञ-हवन सब बंद करवा दिए। तब प्रजा की रक्षा के लिए स्वयं आदिशक्ति देवी प्रकट हुईं। देवी ने हिंगोल को बलूचिस्तान की एक संकरी और घने अंधकार वाली पहाड़ी गुफा के भीतर खदेड़ दिया।

उस अंधेरी गुफा के अंदर, जहाँ सूरज की एक किरण भी नहीं पहुँच सकती थी, देवी ने अपने लकड़ी के दिव्य त्रिशूल से हिंगोल का वध कर दिया। मृत्यु के अंतिम क्षणों में हिंगोल ने रोते हुए देवी के चरणों में शीश नवाया और प्रार्थना की कि इस तीर्थ को हमेशा के लिए उसके नाम से जाना जाए। दयामयी माँ ने उसकी अंतिम इच्छा स्वीकार कर ली और इस तरह इस धाम का नाम Hinglaj Mata Mandir पड़ा।

‘हिंगुला’ का औषधीय और वैज्ञानिक अर्थ

विज्ञान और भाषा के आधार पर ‘हिंगुला’ शब्द का अर्थ बहुत गहरा है। संस्कृत में ‘हिंगुला’ का अर्थ सिनाबार (Cinnabar) या मर्क्यूरिक सल्फाइड होता है, जो गहरे सुर्ख लाल रंग का एक खनिज है। प्राचीन भारतीय आयुर्वेद में इसका उपयोग सांप के काटने, विभिन्न विषैले प्रभावों को बेअसर करने और गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए किया जाता था। देवी के इस औषधीय नाम के कारण ही भक्त उन्हें सभी प्रकार के कष्टों को दूर करने वाली ‘आरोग्य प्रदाता’ मानते हैं।

भगवान परशुराम, ऋषि दधीचि और ब्रह्मक्षत्रियों की अद्भुत गाथा

Hinglaj Mata Mandir का इतिहास भगवान विष्णु के छठे अवतार भगवान परशुराम की कथा से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, परशुराम जी के पिता महर्षि जमदग्नि ने इसी मरुभूमि की पहाड़ियों में कई वर्षों तक कठोर तपस्या की थी। आज इस स्थान को ‘जमदग्नि आश्रम’ या ‘आसाराम’ के नाम से जाना जाता है।

कथा के अनुसार, जब अत्याचारी राजा कार्तवीर्य अर्जुन के पुत्रों ने महर्षि जमदग्नि की नृशंस हत्या कर दी, तो क्रोधित होकर भगवान परशुराम ने पूरी पृथ्वी से अत्याचारी क्षत्रियों का 21 बार संहार करने का संकल्प लिया। परशुराम जी के इस प्रचंड क्रोध से डरकर सिंधु देश के सूर्यवंशी राजा रत्नसेन, सरस्वती नदी के तट पर स्थित महर्षि दधीचि के आश्रम में शरण लेने पहुँचे। महर्षि दधीचि ने उन्हें शरण देने का वचन दिया।

राजा रत्नसेन के पाँच पुत्र थे, जो आश्रम में ही ब्राह्मणों के संस्कारों के बीच पले-बढ़े। एक दिन जब राजा रत्नसेन आश्रम की सीमा से बाहर शिकार के लिए गए, तब परशुराम जी ने उनका वध कर दिया। राजा की मृत्यु के बाद उनकी रानियाँ सती हो गईं। इसके बाद महर्षि दधीचि ने उन पाँचों अनाथ राजकुमारों का पालन-पोषण अपने पुत्रों की तरह किया।

कुछ समय बाद जब परशुराम जी दोबारा महर्षि दधीचि के आश्रम पहुँचे और उन्होंने उन राजकुमारों को देखा, तो उन्हें उनके क्षत्रिय होने का संदेह हुआ। जैसे ही परशुराम जी उन पर प्रहार करने के लिए आगे बढ़े, उसी समय माँ हिंगलाज प्रकट हुईं और राजकुमारों की रक्षा करते हुए परशुराम जी को अपना क्रोध शांत करने का आदेश दिया।

माता के हस्तक्षेप के कारण ही यह वंश ‘ब्रह्मक्षत्रिय’ कहलाया, यानी ऐसे क्षत्रिय जिन्होंने ब्राह्मणों का आचरण अपनाया। आगे चलकर माता ने इन राजकुमारों को अस्त्र-शस्त्र छोड़कर बुनकर बनने का निर्देश दिया। मान्यता है कि इसी समुदाय ने आगे चलकर भारत के महान वस्त्र उद्योग की नींव रखी।

मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम, सीता और लक्ष्मण की ऐतिहासिक प्रायश्चित यात्रा

रामायण काल में जब मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम ने लंकापति रावण का वध किया, तो भले ही रावण अधर्मी था, लेकिन वह एक महान विद्वान ब्राह्मण और भगवान शिव का परम भक्त भी था। इसी कारण भगवान राम पर ‘ब्रह्महत्या’ का पाप लगा। इस पाप के प्रायश्चित और आत्मशुद्धि के लिए भगवान राम ने बलूचिस्तान के मरुस्थल में स्थित Hinglaj Mata Mandir के जाग्रत दरबार में जाकर तपस्या करने का निर्णय लिया।

जब भगवान राम अपने रथों, मंत्रियों और सेना के साथ Hinglaj Mata Mandir की सीमा पर पहुँचे, तो गुफा की रक्षा करने वाली माँ की शक्तिशाली भैरव सेना ने उनका रास्ता रोक दिया। भैरव सेना का संदेश साफ था कि माता के दरबार में कोई राजा बनकर नहीं, बल्कि एक साधारण और विनम्र तीर्थयात्री बनकर ही प्रवेश कर सकता है। यह सुनते ही भगवान राम ने अपने रथ और सेना को वहीं छोड़ दिया और माता सीता, लक्ष्मण तथा हनुमान जी के साथ नंगे पैर मरुस्थल की कठिन यात्रा पर निकल पड़े।

इस कठिन यात्रा के दौरान कई चमत्कारी घटनाएँ हुईं।

सीता कुआँ का निर्माण: तपते मरुस्थल में चलते-चलते जब माता सीता को बहुत प्यास लगी, तो लक्ष्मण जी ने अपने धनुष से पर्वत पर बाण चलाया और हनुमान जी ने पूरी शक्ति से धरती पर पैर पटका, लेकिन कहीं भी पानी नहीं निकला। तब माता सीता ने श्रद्धा से अपनी हथेली सूखी धरती पर रखी। उसी क्षण वहाँ मीठे पानी के पाँच अद्भुत कुएँ प्रकट हो गए, जिन्हें आज भी ‘सीता कुआँ’ के नाम से जाना जाता है।

सैनिकों को वरदान: जो सैनिक रेगिस्तान की कठिन राह के कारण पीछे रह गए थे और बहुत दुखी थे, उन्हें माँ हिंगलाज ने वरदान दिया कि भविष्य में उनके वंशज और आने वाली पीढ़ियाँ इस कठिन यात्रा को पूरी करेंगी और माता का आशीर्वाद प्राप्त करेंगी।

सूरज और चाँद के निशान: जब भगवान राम ने अपनी यात्रा पूरी की और ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति पाई, तब इस पवित्र घटना की याद में उन्होंने मुख्य मंदिर के सामने वाले पहाड़ पर अपने धनुष से सूर्य और चंद्रमा की आकृतियाँ बनाई। मान्यता है कि श्रद्धालु आज भी श्रद्धालु Hinglaj Mata Mandir में उन निशानों के दर्शन कर सकते हैं।

बाबा चंद्रकूप मिट्टी का ज्वालामुखी: पाप मुक्ति की कठिन परीक्षा

Hinglaj Mata Mandir ki Yatra का सबसे हैरान कर देने वाला और रोंगटे खड़े कर देने वाला पड़ाव ‘बाबा चंद्रकूप’ है। यह एशिया का सबसे बड़ा सक्रिय मिट्टी का ज्वालामुखी (Mud Volcano) है, जिसे श्रद्धालु भगवान शिव का जाग्रत रूप मानते हैं। इसमें से गर्म लावा की जगह ठंडी और गीली मिट्टी लगातार बाहर निकलती रहती है।

यहाँ तीर्थयात्रियों को एक कठिन परीक्षा से गुजरना पड़ता है, जिसके नियम इस प्रकार हैं।

रोट बनाने की विशेष रस्म

श्रद्धालु पूरी रात चंद्रकूप ज्वालामुखी की तलहटी में जागकर एक विशेष प्रकार का मीठा रोट तैयार करते हैं। इस रोट को बनाने के लिए आटा, घी, गुड़ और चीनी जैसी चीजों को एक बड़े कपड़े पर रखकर अच्छी तरह मिलाया जाता है। इस कपड़े को चारों कोनों से चार लोग हमेशा हवा में पकड़े रहते हैं, ताकि प्रसाद का एक भी हिस्सा गलती से जमीन को न छुए। यही इस रस्म का सबसे कड़ा नियम माना जाता है।

300 फीट ऊँची चढ़ाई और पापों की स्वीकारोक्ति

सुबह श्रद्धालु अपने हाथों में नारियल, फूल और तैयार किया गया रोट लेकर नंगे पैर इस 300 फीट ऊँचे मिट्टी के पहाड़ की 450 से अधिक सीढ़ियाँ चढ़कर इसके मुहाने (Crater) तक पहुँचते हैं। वहाँ खड़े होकर हर यात्री को अपना पूरा नाम, पता और जीवन में किए गए अपने सभी गुप्त पापों को सबके सामने ऊँची आवाज में स्वीकार करना होता है। यदि कोई व्यक्ति अपने पाप छिपाने की कोशिश करता है, तो उसे यात्रा दल से अलग कर दिया जाता है।

दिव्य नारियल परीक्षण और चरीदार का निर्णय

पाप स्वीकार करने के बाद श्रद्धालु रोट और नारियल को ज्वालामुखी की मिट्टी में डाल देते हैं। इस यात्रा का नेतृत्व करने वाले मुख्य पुजारी, जिन्हें हाथ में त्रिशूल रखने के कारण ‘चरीदार’ कहा जाता है, मिट्टी के उबलने की गति और हवा की दिशा को ध्यान से देखते हैं। यदि नारियल डालते ही कीचड़ में बड़े-बड़े बुलबुले उठने लगते हैं और नारियल तुरंत मिट्टी में समा जाता है, तो चरीदार घोषणा करते हैं कि बाबा चंद्रकूप ने यात्री के पापों को क्षमा कर दिया है। इ

सके बाद श्रद्धालु उस पवित्र मिट्टी को अपने शरीर और चेहरे पर लगाते हैं और सीधे नीचे उतरकर अघोर (हिंगोल) नदी में स्नान करते हैं।

अंगारों पर चलने की प्राचीन “चुल” परंपरा

माँ हिंगलाज के चमत्कारों में सबसे हैरान कर देने वाली परंपराओं में से एक ‘चुल’ की रस्म थी। मंदिर के बाहर लगभग 10 फीट लंबा एक गहरा गड्ढा खोदा जाता था, जिसे पूरी तरह धधकते लाल कोयलों और अंगारों से भर दिया जाता था।

श्रद्धालु अपनी मनोकामना पूरी होने पर या माता के प्रति अपनी अटूट श्रद्धा प्रकट करने के लिए इन दहकते अंगारों पर नंगे पैर चलकर मंदिर में प्रवेश करते थे। मान्यता है कि माता की असीम कृपा से अंगारों पर चलने वाले किसी भी श्रद्धालु के पैर नहीं जलते थे और उन्हें केवल हल्की गर्माहट ही महसूस होती थी। हालांकि, सुरक्षा कारणों और प्रशासनिक नियमों के चलते पिछले कुछ वर्षों से इस प्राचीन परंपरा पर पूरी तरह रोक लगा दी गई है।

मुख्य गुफा मंदिर (महल) की अनूठी बनावट और पूजा के नियम

Hinglaj Mata Mandir पहाड़ों को काटकर बनाई गई कोई कृत्रिम इमारत नहीं है, बल्कि यह एक विशाल प्राकृतिक गुफा के भीतर स्थित है, जिसे स्थानीय लोग आदर से ‘महल’ कहते हैं। लोक मान्यताओं के अनुसार, इस अद्भुत गुफा का निर्माण इंसानों ने नहीं, बल्कि प्राचीन समय में यक्षों और देवशक्तियों ने मिलकर किया था।

गुफा का प्रवेश द्वार लगभग 50 फीट ऊँचा है, जहाँ लकड़ी या लोहे का कोई दरवाजा नहीं है। यह देवी की असीम स्वतंत्रता का प्रतीक माना जाता है। गुफा की दीवारें और छत प्राकृतिक रूप से रंग-बिरंगे कीमती पत्थरों और खनिजों से ढकी हुई हैं, जो बिना किसी कृत्रिम रोशनी के भी अद्भुत चमक बिखेरती हैं।

गुफा के बिल्कुल अंतिम छोर पर मिट्टी की बनी एक छोटी वेदी है, जिस पर सिंदूर से लिपी हुई प्राकृतिक शिला (पिंडी) स्थापित है। यहाँ देवी की कोई इंसानी मूर्ति नहीं है। गर्भगृह में स्थापित दो विशाल लाल पत्थरों को साक्षात भगवान विष्णु का ‘शालिग्राम’ रूप माना जाता है। पास में ही माताजी और भैरवनाथ के प्रतीक के रूप में पवित्र त्रिशूल भी स्थापित हैं।

Hinglaj Mata Mandir me Pooja Par चढ़ाई जाने वाली पारंपरिक पूजन सामग्री की सूची नीचे दी गई तालिका में दी गई है।

पूजन सामग्री का नामआध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व
सूखे मेवे और मिठाई (शिरिनी)देवी को लगाया जाने वाला मुख्य भोग, जिसे हिंदू और मुस्लिम दोनों समान रूप से बांटते हैं।
सिंदूर (कुमकुम) और इत्रदेवी के श्रृंगार और गुफा को सुवासित रखने के लिए अर्पित किया जाता है।
ताजा नारियलबलि प्रथा के विकल्प के रूप में चढ़ाया जाने वाला सबसे पवित्र फल।
कांच की चूड़ियां और लाल चुनरीसुहाग की लंबी उम्र और वैवाहिक सुख-शांति की कामना के लिए देवी को चढ़ाई जाने वाली मुख्य भेंट।

बोलन दर्रे में दफन ‘बीबी नानी’ और पीर गायब का रहस्य

बलूचिस्तान के इतिहास और लोक कथाओं में Hinglaj Mata Mandir के ‘नानी मंदिर’ के साथ-साथ क्वेटा और सिबी के बीच स्थित बोलन दर्रे में ‘बीबी नानी’ और उनके भाई ‘पीर गायब’ की एक बेहद रहस्यमयी कहानी भी प्रचलित है।

मान्यता के अनुसार, प्राचीन समय में जब बलूचिस्तान पर आग की पूजा करने वाले एक राजा का शासन था, तब बीबी नानी और उनके भाई इस क्षेत्र में शांति और धर्म का संदेश देने आए थे। राजा ने क्रोधित होकर अपनी सेना को उन दोनों को पकड़कर लाने का आदेश दिया। सैनिकों को अपने पीछे आता देख दोनों भाई-बहन अपनी जान बचाकर भागे, लेकिन बोलन दर्रे के पास पहुँचकर उन्होंने अलग-अलग दिशाओं में जाने का फैसला किया।

सैनिकों ने भाई का पीछा किया। जब वे उनके बिल्कुल करीब पहुँच गए, तो उन्होंने ईश्वर से प्रार्थना की। मान्यता है कि उसी समय सामने खड़ी विशाल पहाड़ी दो हिस्सों में फट गई। भाई उस पहाड़ी के भीतर समा गए और हमेशा के लिए अदृश्य हो गए। इसी कारण उन्हें ‘पीर गायब’ (अदृश्य संत) कहा गया। पहाड़ी के फटने से वहाँ पानी का एक लगातार बहने वाला चश्मा (झरना) भी फूट पड़ा, जो आज भी मौजूद है।

दूसरी ओर, उनकी बहन बीबी नानी दक्षिण दिशा की ओर बोलन दर्रे के निचले हिस्से में चली गईं, जहाँ बाद में उनकी मृत्यु हो गई और उन्हें वहीं दफनाया गया। आज उनकी कब्र बोलन दर्रे के पास सड़क के एक पुल (Bibi Nani Pull) के नीचे स्थित है, जहाँ हरे रंग की चादर चढ़ाई जाती है।

इस कब्र से जुड़ा सबसे बड़ा चमत्कार यह बताया जाता है कि अक्टूबर 1986 में आई भीषण बाढ़ के दौरान, जब लगभग 30 फीट ऊँची लहरों ने बोलन दर्रे के आसपास की कई मजबूत इमारतों और पुलों को नष्ट कर दिया था, तब बीबी नानी की यह साधारण मिट्टी की कब्र पूरी तरह सुरक्षित और अछूती रही। इसी कारण स्थानीय लोग इस स्थान को बेहद चमत्कारी मानते हैं।

आज भी Hinglaj Mata Mandir की यात्रा करने वाले कई श्रद्धालु इस ऐतिहासिक और रहस्यमयी स्थान को श्रद्धा के साथ देखने पहुँचते हैं।

नाथ संप्रदाय और गोरखनाथ पंथ से गहरा आध्यात्मिक संबंध

Hinglaj Mata Mandir का संबंध केवल आम भक्तों से ही नहीं है, बल्कि यह भारत के सबसे रहस्यमयी और शक्तिशाली तांत्रिक संप्रदायों में से एक, नाथ संप्रदाय का भी एक प्रमुख आध्यात्मिक केंद्र माना जाता है।

गोरखनाथ योगी दीक्षा: गोरखनाथ पंथ के ‘कानफटे’ (कान छिदवाने वाले) योगियों की दीक्षा तब तक पूरी नहीं मानी जाती, जब तक वे Hinglaj Mata Mandir की यात्रा न कर लें।

गोरखनाथ दूनी: मंदिर के मार्ग पर गुरु गोरखनाथ की एक तपोस्थली और पवित्र धूनी (Gorakhnath Dooni) स्थित है, जहाँ साधक विशेष ध्यान और साधना करते हैं।

Hinglaj Branding: Hinglaj Mata Mandir की यात्रा सफलतापूर्वक पूरी करने के बाद जब नाथ संप्रदाय के साधक वापस लौटते हैं, तो कच्छ के ‘कोटेश्वर’ मंदिर में उनके शरीर पर गर्म धातु से एक विशेष निशान (ब्रांड) लगाया जाता है। यह निशान उनके हिंगलाजी योगी होने का प्रमाण माना जाता है।

Hinglaj Mata Mandir यात्रा के कड़े नियम और आवश्यक मार्गदर्शिका

बलूचिस्तान का यह मरुस्थलीय क्षेत्र अत्यंत शुष्क, गर्म और पथरीला है, Hinglaj Mata Mandir Yatra को शारीरिक और मानसिक दोनों रूपों में अत्यंत कठिन माना जाता है। यात्रा को सुरक्षित और मर्यादापूर्ण बनाए रखने के लिए कुछ कड़े नियमों का पालन करना अनिवार्य है:

मुख्य नियम और निर्देशश्रद्धालुओं के लिए महत्व और विवरण
पहचान पत्र की अनिवार्यताHinglaj Mata Mandir me Yatra ke Dauran यात्रा के दौरान पाकिस्तान के सुरक्षा बलों और फ्रंटियर कॉर्प्स द्वारा जगह-जगह स्थापित चेक-पोस्टों पर अपनी पहचान सत्यापित कराने के लिए वैध आईडी कार्ड या पासपोर्ट साथ रखना अनिवार्य है।
मर्यादित वस्त्र और मौसम की तैयारीमरुस्थल की अत्यधिक गर्मी और तेज हवाओं से बचने के लिए शरीर को पूरी तरह ढकने वाले और आरामदायक सूती कपड़े पहनना आवश्यक है।
कठिन परिस्थितियों के लिए मानसिक तैयारीभीषण गर्मी, पानी की कमी और ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर कई किलोमीटर पैदल चलने के लिए खुद को मानसिक रूप से मजबूत रखना होता है।
Hinglaj Mata Mandir वर्जित वस्तुएं और प्रतिबंधHinglaj Mata Mandir यात्रा के पूरे मार्ग और मंदिर परिसर में शराब, नशीले पेय पदार्थों और किसी भी प्रकार के पटाखों या आतिशबाजी का उपयोग पूरी तरह प्रतिबंधित है।

यात्रा मार्ग में आने वाले मुख्य तीर्थ और पूजनीय स्थल

कराची से शुरू होकर Hinglaj Mata Mandir तक जाने वाले ऐतिहासिक मार्ग पर कई अन्य महत्वपूर्ण और चमत्कारी पूजा स्थल आते हैं, जिन्हें Hinglaj Mata Mandir की यात्रा का आवश्यक हिस्सा माना जाता है:

  • गणेश देव मंदिर: विघ्नहर्ता भगवान गणेश का यह स्थान यात्रा की शुरुआत में आता है, जहां यात्री अपनी यात्रा के निर्विघ्न पूरा होने की प्रार्थना करते हैं।
  • माता काली मंदिर: शक्ति की संहारक देवी काली का अत्यंत जाग्रत स्थान, जहां यात्री पूजा-आराधना करते हैं।
  • ब्रह्म कुंड और तीर कुंड: पवित्र जलस्रोत, जिनके जल को अत्यंत चमत्कारी और पापों का नाश करने वाला माना जाता है।
  • गुरु नानक खड़ाऊं: सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक देव जी की इस क्षेत्र की यात्रा की पावन स्मृति में बना स्थल।
  • राम झरोखा बैठक: वह स्थान जहां भगवान श्री राम ने अपनी यात्रा के दौरान विश्राम किया था।
  • आशापुरा सराय (विश्राम गृह): Hinglaj Mata Mandir ke Paas स्थित मुख्य धर्मशाला जहां यात्री स्नान करते हैं, अपने पुराने वस्त्रों को दान करते हैं और नए स्वच्छ वस्त्र धारण कर दर्शन के लिए तैयार होते हैं।

सामाजिक-सांस्कृतिक प्रभाव, फिल्में, पुस्तकें और वर्तमान व्यवस्था

Hinglaj Mata Mandir सदियों से कला, साहित्य और समाज को प्रभावित करता आ रहा है। भारत और पाकिस्तान के विभाजन के बाद भी इस मंदिर के प्रति लोगों की दीवानगी कम नहीं हुई, बल्कि समय के साथ और बढ़ती गई है।

सांस्कृतिक क्षेत्रकलाकृति / संस्था का नाममुख्य विषयवस्तु और ऐतिहासिक महत्व
बंगाली सिनेमाफिल्म ‘मरुतीर्थ हिंगलाज’ (1959)महान निर्देशक बिकास रॉय द्वारा निर्देशित इस क्लासिक फिल्म में बलूचिस्तान के भीषण मरुस्थल को पार कर Hinglaj Mata Mandir tirthyatra के कठिन संघर्ष और अटूट भक्ति को दिखाया गया है।
तेलुगु सिनेमाफिल्म ‘साहसम’ (2013)अभिनेता गोपीचंद और अभिनेत्री तापसी पन्नू अभिनीत इस रोमांचक फिल्म की पूरी कहानी हिंगलाज देवी मंदिर के तहखानों में छिपे प्राचीन खजाने की खोज पर आधारित है।
साहित्य और पुस्तकेंपुस्तक ‘हिंगलाज शक्तिपीठ’ (2011)लेखक ओंकार सिंह लखावत द्वारा लिखी गई यह पुस्तक 2006 में उनकी वास्तविक Hinglaj Mata Mandir यात्रा के अनुभवों और मंदिर के प्राचीन इतिहास का महत्वपूर्ण दस्तावेज मानी जाती है।
प्रबंधन और सेवाहिंगलाज सेवा मंडली5 जनवरी 1986 को स्थापित यह मंदिर समिति आज भी वार्षिक मेले के दौरान लाखों यात्रियों के लिए भोजन, टेंट, जनरेटर और चिकित्सा सुविधाओं की व्यवस्था संभालती है।

वर्तमान समय में बलूचिस्तान की सरकार ने Hinglaj Mata Mandir के महत्व को स्वीकार करते हुए इसके विकास के लिए विशेष बजट आवंटित किया है। बलूचिस्तान के मुख्यमंत्री सरफराज बुगती और सीनेटर दानेश कुमार के नेतृत्व में इस पूरे क्षेत्र को एक अंतरराष्ट्रीय धार्मिक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की योजना पर काम चल रहा है।

14. Hinglaj Mata Mandir से जुड़े महत्वपूर्ण FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले सवाल)

Q1. Hinglaj Mata Mandir का मुख्य पता (Location) क्या है?

उत्तर: माँ हिंगलाज का यह ऐतिहासिक मंदिर पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत के लासबेला जिले में स्थित है। यह कराची से लगभग 250 किलोमीटर दूर उत्तर-पश्चिम दिशा में, हिंगोल राष्ट्रीय उद्यान (Hingol National Park) की पहाड़ियों के बीच हिंगोल नदी के पश्चिमी तट पर एक प्राकृतिक पहाड़ी गुफा के अंदर बना हुआ है।

Q2. इस मंदिर को स्थानीय बलूच मुसलमान “नानी का मंदिर” क्यों कहते हैं?

उत्तर: स्थानीय बलूच और सिंधी मुस्लिम समुदाय के लोग माँ हिंगलाज के प्रति अत्यंत गहरी श्रद्धा और आदर रखते हैं। वे आदरपूर्वक देवी को “बीबी नानी” (जिसका अर्थ सम्मानित मातृ दादी होता है) कहकर पुकारते हैं, जिसके कारण इस मंदिर को “नानी का मंदिर” और यहाँ की यात्रा को “नानी का हज” कहा जाता है।

Q3. क्या कोई भी भारतीय नागरिक पाकिस्तान जाकर Hinglaj Mata Mandir के दर्शन कर सकता है?

उत्तर: हाँ, भारतीय नागरिक भी विशेष धार्मिक वीजा (Pilgrim Visa) प्राप्त करके Hinglaj Mata Mandir के दर्शन के लिए पाकिस्तान जा सकते हैं। दोनों देशों के बीच हुए द्विपक्षीय समझौतों के तहत विशेष जत्थों को यात्रा की अनुमति दी जाती है, जिसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी स्थानीय प्रशासन और फ्रंटियर कॉर्प्स संभालते हैं।

Q4. बाबा चंद्रकूप मिट्टी के ज्वालामुखी का धार्मिक और वैज्ञानिक महत्व क्या है?

उत्तर: बाबा चंद्रकूप (Baba Chandragup) को भगवान शिव का ही एक विस्मयकारी रूप माना जाता है। धार्मिक नियमों के अनुसार, जब तक कोई तीर्थयात्री इस 300 फीट ऊँचे मिट्टी के ज्वालामुखी पर चढ़कर अपने पापों को स्वीकार नहीं करता और बाबा को नारियल अर्पित नहीं करता, तब तक उसे मुख्य मंदिर में प्रवेश की अनुमति नहीं मिलती। वैज्ञानिक रूप से यह एशिया का सबसे सक्रिय मड वोल्केनो है।

Q5. माँ हिंगलाज किस समुदाय की कुलदेवी (Family Deity) मानी जाती हैं?

उत्तर: माँ हिंगलाज को भारत और पाकिस्तान के कई महत्वपूर्ण हिंदू समुदायों द्वारा अपनी कुलदेवी के रूप में पूजा जाता है। इनमें विशेष रूप से ब्रह्मक्षत्रिय (खत्री), भानशाली, लोहाना, भावसार, चरण (देवीपुत्र), राजपुरोहित और बंजारा समुदाय के लोग शामिल हैं।

Q6. क्या इस मंदिर में कोई मानव-निर्मित मूर्ति या प्रतिमा स्थापित है?

उत्तर: नहीं, Hinglaj Mata Mandir की मुख्य प्राकृतिक गुफा के भीतर कोई मानव निर्मित मूर्ति या प्रतिमा स्थापित नहीं है। यहाँ एक प्राकृतिक शिला (पत्थर) स्थापित है, जो सिंदूर से लिपी हुई है और इसे ही माँ का पिंडी स्वरूप मानकर पूजा जाता है।

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