इंदौर के पूर्वी हिस्से में नेमावर रोड (NH 59) के पास दुधिया गांव में बना देवगुराड़िया (Devguradia) शिव मंदिर मालवा की धार्मिक आस्था, इतिहास और प्राकृतिक सुंदरता का एक बहुत बड़ा केंद्र है। यह देवगुराड़िया (Devguradia) मंदिर इंदौर के मुख्य शहर से लगभग 8 km और इंदौर बाईपास से करीब 1–2 km की दूरी पर एक छोटी सी पहाड़ी पर बसा हुआ है। स्थानीय लोग इस देवगुराड़िया (Devguradia) मंदिर को ‘गुटकेश्वर महादेव’, ‘गुप्तेश्वर महादेव’ और पौराणिक रूप से ‘गरुड़ तीर्थ’ के नाम से जानते हैं।
देवगुराड़िया (Devguradia) केवल पूजा-पाठ की जगह नहीं है, बल्कि सैकड़ों सालों के इतिहास, मराठा साम्राज्य की सैन्य परंपराओं, पुराने ज़माने की वॉटर इंजीनियरिंग और मालवी संस्कृति की एक जीती-जागती मिसाल है। चूंकि अब सावन (श्रावण) का पवित्र महीना आ रहा है, इसलिए देवगुराड़िया (Devguradia) की रौनक और यहाँ की मान्यताएं भक्तों के लिए और भी खास हो जाती हैं।
1. देवगुराड़िया (Devguradia) मंदिर का संपूर्ण इतिहास (कदम-दर-कदम)
(a) शुरुआत और परमार काल (7th to 10th Century)
पुराने इतिहास और मान्यताओं के अनुसार, देवगुराड़िया (Devguradia) की इस पहाड़ी पर भगवान शिव की पूजा का सिलसिला 7th century या 8th century में परमार राजाओं के समय शुरू हुआ था। उस ज़माने में देवगुराड़िया का क्षेत्र घने जंगलों और पहाड़ियों से घिरा हुआ था, जहाँ पत्थरों को तराशकर एक छोटा पूजा स्थल बनाया गया था।
(b) वीरान होने का दौर और पुनर्निर्माण (13th to 15th Century)
13th century और 14th century के दौरान बाहरी हमलों और राजनीतिक उथल-पुथल की वजह से इंदौर और देवगुराड़िया (Devguradia) के आसपास का इलाका काफी समय तक सूना और वीरान पड़ा रहा। इंदौर के पास डाकाचा गांव से मिले पत्थरों और पुरानी मूर्तियों से पता चलता है कि उस दौर में यहाँ का जनजीवन काफी प्रभावित हुआ था।
साल 1401 CE में जब मांडू में मालवा सल्तनत बनी, तब इंदौर (जिसे पहले इंद्रपुर कहते थे) को दोबारा बसाने की शुरुआत हुई। इसी दौरान (11th century से 15th century के बीच) देवगुराड़िया के इस प्राचीन मंदिर का फिर से जीर्णोद्धार कराया गया।
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(c) मराठा काल और होल्कर सेना की आस्था (Pre-1766)
18th century में जब मालवा में मराठा साम्राज्य आया, तब होल्कर राज्य के संस्थापक सूबेदार मल्हारराव होल्कर के समय (1766 तक) इंदौर मुख्य रूप से एक सैनिक छावनी हुआ करता था। होल्कर सेना का पड़ाव इसी देवगुराड़िया (Devguradia) पहाड़ी के आसपास रहता था।
इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि होल्कर सैनिक जब भी किसी युद्ध या सैन्य अभ्यास के लिए निकलते थे, तो वे सबसे पहले देवगुराड़िया (Devguradia) में स्थित गुटकेश्वर महादेव के मंदिर के आगे झुककर और अपने हथियार झुकाकर सलामी दिया करते थे।
(d) देवी अहिल्याबाई होल्कर का आगमन और नया मंदिर (26 मई 1784)
26 May 1784 को जब लोकमाता देवी अहिल्याबाई होल्कर अपनी राजधानी महेश्वर से इंदौर आईं और छत्रीबाग में रुकीं, तब वे देवगुराड़िया के इस पवित्र गरुड़ तीर्थ के दर्शन करने पहुँचीं। पुराने मंदिर की हालत जर्जर देखकर उन्होंने तुरंत देवगुराड़िया मंदिर के नए सिरे से निर्माण का आदेश दिया।
मराठा इतिहास की किताबों (‘महेश्वर दरबाराची बातमी पत्रे’) में अहिल्याबाई द्वारा देवगुराड़िया गरुड़ तीर्थ के पुनर्निर्माण का साफ-साफ जिक्र मिलता है। अहिल्याबाई ने पानी में डूबे हुए पुराने मंदिर के ठीक ऊपर पत्थरों का एक नया और सुंदर बहुस्तरीय मंदिर बनवाया।
(e) महाराजा यशवंतराव होल्कर प्रथम (1799–1811)
अहिल्याबाई के बाद, महाराजा यशवंतराव होल्कर प्रथम के समय (1799–1811) देवगुराड़िया (Devguradia) मंदिर में एक खास बदलाव किया गया। छावनी में रहने वाले सैनिकों की सहूलियत और आस्था के लिए मंदिर के मुख्य दरवाजे की दिशा को मोड़कर सैनिक छावनी की तरफ कर दिया गया, ताकि सैनिकों को सुबह उठते ही सबसे पहले देवगुराड़िया महादेव के दर्शन हों। इसके बाद साल 1851 में मंदिर की फिर से मरम्मत कराई गई।
(f) अंग्रेजों के ज़माने के ऐतिहासिक रिकॉर्ड (1874–1896)
कैप्टन सी.ई. लुआर्ड की लिखी किताब ‘इंदौर स्टेट गज़ेटियर 1896’ में देवगुराड़िया से जुड़ी दो बहुत ही दिलचस्प बातें मिलती हैं:
- औरंगज़ेब के समय का टैक्स: मुगल बादशाह औरंगज़ेब के समय कंपेल के कानूनगो को देवगुराड़िया (Devguradia) में महाशिवरात्रि मेले की दुकानों से टैक्स (कर) वसूलने का अधिकार दिया गया था।
- रेलवे पटरियों के लिए पत्थर (1874): जब साल 1874 में ‘इंदौर होल्कर स्टेट रेलवे’ की पटरियां बिछाने का काम शुरू हुआ, तब उसके लिए पत्थर इसी देवगुराड़िया पहाड़ी से खोदकर निकाले गए थे।
(g) देवगुराड़िया (Devguradia) के पुजारियों की 17 पीढ़ियां
देवगुराड़िया मंदिर में पूजा-पाठ की जिम्मेदारी पिछले 16 generations से ‘पुरी’ परिवार संभालता आ रहा है, और अब उनकी 17th generation इस परंपरा को आगे बढ़ा रही है।
2. देवगुराड़िया ऐतिहासिक टाइम टेबल
| समय / साल | क्या ऐतिहासिक घटना हुई | किसने कराया / मुख्य व्यक्तित्व |
| 7th – 8th Century | देवगुराड़िया (Devguradia) पहाड़ी पर पहली बार मंदिर और शिव पूजा की शुरुआत | परमार राजवंश |
| 11th – 15th Century | मालवा सल्तनत के दौर में देवगुराड़िया मंदिर का पुनर्निर्माण | स्थानीय लोग और मालवा सल्तनत |
| Pre-1766 | सेना की छावनी; सैनिकों द्वारा देवगुराड़िया में सलामी देने की परंपरा | सूबेदार मल्हारराव होल्कर |
| 26 May 1784 | अहिल्याबाई होल्कर का आगमन, नए Devguradia Mandir का निर्माण | देवी अहिल्याबाई होल्कर |
| 1799 – 1811 | सैनिक छावनी की तरफ देवगुराड़िया मंदिर के मुख्य दरवाजे का रुख घुमाया गया | महाराजा यशवंतराव होल्कर प्रथम |
| 1851 | देवगुराड़िया मंदिर परिसर की मरम्मत और सजावट | होल्कर रियासत |
| 1874 | रेलवे लाइन बनाने के लिए देवगुराड़िया पहाड़ी से पत्थर निकाले गए | होल्कर और ब्रिटिश रेलवे इंजीनियर्स |
| 1896 | गज़ेटियर में देवगुराड़िया, मेले और औरंगज़ेबकालीन टैक्स का रिकॉर्ड | कैप्टन सी.ई. लुआर्ड |
3. देवगुराड़िया (Devguradia) मंदिर की बनावट और पानी की अनोखी व्यवस्था
देवगुराड़िया मंदिर की बनावट और पानी की निकासी का तरीका पुराने ज़माने की बेहतरीन इंजीनियरिंग का नमूना है।
(a) 12 ft नीचे पानी में डूबा हुआ देवगुराड़िया (Devguradia) का मूल मंदिर
यह देवगुराड़िया मंदिर मूल रूप से पानी के अंदर बना हुआ है। प्राचीन काल का असली मंदिर और शिवलिंग आज की ज़मीन की सतह से लगभग 12 ft नीचे पानी में डूबा रहता है। 18th century में देवी अहिल्याबाई ने देवगुराड़िया के इस डूबे हुए मंदिर के ठीक ऊपर नया बहुस्तरीय मंदिर बनवा दिया। आज का मंदिर बाहर से देखने पर किसी 5-storied इमारत जितना ऊंचा लगता है।
(b) देवगुराड़िया (Devguradia) मंदिर की मुख्य बनावट और गर्भगृह
- ऊपरी हिस्सा (शिखर): देवगुराड़िया मंदिर के ऊपर उरुश्रृंग शैली में एक बड़ा मुख्य शिखर और 2 छोटे कलश बने हुए हैं।
- राम झरोखा: मंदिर की ऊपरी मंजिल पर एक ‘राम झरोखा’ है, जिसमें देवी अहिल्याबाई होल्कर की तस्वीर और साधु-संतों की आकृतियां उकेरी गई हैं।
- गर्भगृह और शिवलिंग: गर्भगृह के मुख्य दरवाजे पर गणेश जी की सुंदर मूर्ति बनी है। अंदर शिवलिंग की जलाधारी को पीतल की परत से ढका गया है, जिसके बीच में एक छोटा शिवलिंग विराजमान है।
- संगमरमर के नंदी: गर्भगृह के बाहर प्रांगण में एक ऊंचे चबूतरे पर सफ़ेद संगमरमर से बने नंदी महाराज बैठे हैं।










(c) देवगुराड़िया (Devguradia) परिसर के 5 पानी के कुंड
देवगुराड़िया मंदिर के आसपास कुल 5 प्राचीन जलकुंड (पानी के तालाब) हैं:
- अमृतकुंड: मुख्य दरवाजे के बाहर बना कुंड, जिसमें पहाड़ी से बहकर आने वाला पानी जमा होता है।
- स्नान कुंड: इनमें से 2 कुंडों के पानी का इस्तेमाल लोग नहाने और आचमन के लिए करते हैं।
- सेंट्रल कुंड: मंदिर के बीचो-बीच बना कुंड, जिसके आसपास भगवान विष्णु, अंबा माता, गरुड़ देव और सूर्य भगवान के छोटे-छोटे मंदिर हैं।
इन कुंडों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि कड़कड़ाती गर्मी (May-June) में भी इनका पानी कभी नहीं सूखता। पुराने समय में जब शहर छोटा था, तब पूरा दुधिया गांव इन्हीं देवगुराड़िया (Devguradia) कुंडों का पानी पीता था।
4. सावन (श्रावण) का पवित्र महीना: देवगुराड़िया (Devguradia) में मान्यताएं, प्राकृतिक झरना, कांवड़ और उत्सव
अब सावन का पवित्र महीना आ रहा है, और सावन के दिनों में देवगुराड़िया का माहौल एकदम अलौकिक हो जाता है। इस दौरान यहाँ प्रकृति और शिवभक्ति का ऐसा संगम देखने को मिलता है जो पूरे इंदौर में कहीं और नहीं दिखता।
(a) देवगुराड़िया (Devguradia) की पहाड़ी और गोमुख द्वारा प्राकृतिक जलाभिषेक
सावन और भादों के महीनों में बारिश के कारण देवगुराड़िया पहाड़ी के अंदरूनी हिस्से पानी से भर जाते हैं और चट्टानों से प्राकृतिक जलधारा फूट पड़ती है।
- गर्भगृह में शिवलिंग के ठीक ऊपर पत्थरों को तराशकर बनाया गया एक गोमुख (गाय का मुख/नंदी मुख) स्थित है।
- देवगुराड़िया (Devguradia) पहाड़ी का यह ठंडा और शुद्ध पानी सीधे इस गोमुख से बहकर शिवलिंग पर लगातार गिरता रहता है।
- बिना किसी पंप या मोटर के, पूरे 2 महीने कुदरत खुद देवगुराड़िया के गुटकेश्वर महादेव का अनवरत जलाभिषेक करती है। इस अद्भुत प्राकृतिक जलाभिषेक के दर्शन करने के लिए दूर-दूर से भक्त आते हैं।
(b) सावन सोमवार, देवगुराड़िया में भक्तों का हुजूम और कांवड़ यात्रा
- सावन सोमवार की भीड़: सावन के हर सोमवार को देवगुराड़िया में तड़के 4:00 AM से ही भक्तों की लंबी-लंबी कतारें लग जाती हैं। एक-एक सोमवार को यहाँ 50,000 से लेकर 1,00,000 से भी ज्यादा श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुँचते हैं।
- कांवड़ यात्रा का मुख्य पड़ाव: उज्जैन (महाकालेश्वर), ओंकारेश्वर और नर्मदा के पावन घाटों (महेश्वर व बड़वाह) से जल लेकर आने वाले हजारों कांवड़िए देवगुराड़िया (Devguradia) पहुँचकर महादेव का जलाभिषेक करते हैं। इंदौर शहर और ग्रामीण इलाकों से निकलने वाली कई कांवड़ यात्राएं यहीं आकर संपन्न होती हैं।
- चार पहर की पूजा व भांग श्रृंगार: सावन में रोज़ रात को देवगुराड़िया (Devguradia) शिवलिंग का विशेष भांग, मेवे और ताजे फूलों से अलौकिक श्रृंगार किया जाता है। साथ ही रुद्राभिषेक और महाआरती होती है।
(c) देवगुराड़िया (Devguradia) में इमली के पेड़ों पर झूले और मालवी लोक-परंपरा
सावन में जब देवगुराड़िया की पहाड़ी और आसपास का इलाका हरा-भरा हो जाता है, तब मंदिर परिसर में लगे सदियों पुराने विशाल इमली के पेड़ों पर मोटे रस्से डालकर बड़े-बड़े झूले बांधे जाते हैं।
- मालवा की पुरानी परंपरा के अनुसार, महिलाएं, बच्चे और परिवार के लोग देवगुराड़िया आकर सावन के झूले झूलते हैं।
- यहाँ पारंपरिक मालवी लोकगीत गाए जाते हैं और चारों तरफ हंसी-खुशी का माहौल रहता है।
- देवगुराड़िया (Devguradia) मंदिर के बाहर भुट्टे (छल्ली), गरमा-गरम नाश्ता, मालवी दाल-बाटी और पूजा के सामान की दुकानें सज जाती हैं।
5. देवगुराड़िया से जुड़ी पौराणिक कथाएं और चमत्कारी मान्यताएं
(a) गरुड़ देव की तपस्या और ‘गरुड़ तीर्थ’ देवगुराड़िया
पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ देव ने इसी देवगुराड़िया (Devguradia) पहाड़ी पर बैठकर भगवान शिव की सालों तक कठोर तपस्या की थी। उनकी भक्ति से खुश होकर शिव जी प्रकट हुए और गरुड़ देव की प्रार्थना पर स्वयं एक छोटे शिवलिंग के रूप में यहाँ स्थापित हो गए।
- ‘देव’ (भगवान) और ‘गरुड़’ (विष्णु वाहन) शब्दों को मिलाकर ही इस जगह का नाम ‘देवगुराड़िया’ (Devguradia) पड़ा।
- प्राचीन धार्मिक ग्रंथों में देवगुराड़िया (Devguradia) को ‘गरुड़ तीर्थ’ लिखा गया है।
(b) देवगुराड़िया के महादेव को ‘गुटकेश्वर’ और ‘गुप्तेश्वर’ क्यों कहते हैं?
- गुटकेश्वर: आकार में छोटा (गुटके के समान) होने की वजह से लोग प्यार से देवगुराड़िया (Devguradia) महादेव को ‘गुटकेश्वर’ कहते हैं।
- गुप्तेश्वर: क्योंकि असली शिवलिंग 12 ft नीचे पानी में गुप्त (छिपा हुआ) है, इसलिए देवगुराड़िया (Devguradia) के महादेव को ‘गुप्तेश्वर महादेव’ भी कहा जाता है।
(c) देवगुराड़िया में नाग-नागिन के जोड़े के दर्शन की मान्यता
मंदिर से जुड़ा एक बहुत गहरा विश्वास यह भी है कि देवगुराड़िया (Devguradia) के जलकुंडों और मंदिर की दरारों में नाग-नागिन का एक पवित्र जोड़ा रहता है।
- महाशिवरात्रि और सावन के दिनों में यह जोड़ा अक्सर जलकुंड में तैरते हुए या शिवलिंग के आसपास भक्तों को दिखाई देता है।
- लोगों का मानना है कि जिस किसी को देवगुराड़िया (Devguradia) के इस नाग-नागिन के जोड़े के दर्शन हो जाते हैं, उसकी मनोकामनाएं ज़रूर पूरी होती हैं।
(d) देवगुराड़िया (Devguradia) कुंड की मछलियां और कछुए
देवगुराड़िया (Devguradia) मंदिर के बड़े कुंड में सैकड़ों की संख्या में मछलियां और कछुए बड़े आराम से तैरते रहते हैं। यहाँ आने वाले लोग उन्हें आटे की गोलियां और दाना खिलाते हैं, जिसे बहुत पुण्य का काम माना जाता है।
6. देवगुराड़िया का महाशिवरात्रि पर 3 से 5 दिनों का भव्य मेला और अन्य त्यौहार
(a) देवगुराड़िया में महाशिवरात्रि पर 3 से 5 दिनों का विशाल मेला
देवगुराड़िया (Devguradia) मंदिर में महाशिवरात्रि का पर्व बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता है। महाशिवरात्रि के शुभ अवसर पर यहाँ केवल 1 दिन की पूजा नहीं होती, बल्कि पूरे 3 से 5 दिनों का विशाल मेला आयोजित किया जाता है।
- मेले की रौनक: इस 3 से 5 दिनों के देवगुराड़िया मेले में इंदौर शहर के अलावा आसपास के दर्जनों गांवों से हजारों-लाखों लोग पहुँचते हैं।
- दुकानें और झूले: देवगुराड़िया मेले में बड़े-बड़े चकरी झूले, मौत का कुआँ, सर्कस, बच्चों के खिलौने, कपड़े, बर्तन, हस्तशिल्प और खाने-पीने के स्टॉल (जैसे मालवी चाट, गन्ने का रस, रबड़ी-जलेबी) लगते हैं।
- औरंगज़ेब काल से जुड़ाव: देवगुराड़िया (Devguradia) के इस मेले का इतिहास इतना पुराना है कि औरंगज़ेब के समय से ही यहाँ मेले की दुकानों से कर वसूलने का रिकॉर्ड मिलता है।
- रातभर दर्शन: महाशिवरात्रि की पूरी रात देवगुराड़िया (Devguradia) मंदिर के कपाट खुले रहते हैं, जहाँ अखंड भजन-कीर्तन और चार पहर की विशेष पूजा चलती है।
(b) देवगुराड़िया (Devguradia) के अन्य त्यौहार
- अन्नकूट व कार्तिक पूर्णिमा: अन्नकूट पर देवगुराड़िया में विशाल भंडारे का आयोजन होता है और कार्तिक पूर्णिमा पर कुंडों में दीपदान किया जाता है।
7. देवगुराड़िया के आसपास घूमने की बेहतरीन जगहें
अगर आप देवगुराड़िया (Devguradia) मंदिर आ रहे हैं, तो आसपास की इन खूबसूरत जगहों पर भी घूम सकते हैं:
- रालामंडल वाइल्डलाइफ सेंचुरी (Ralamandal Wildlife Sanctuary):
- दूरी: देवगुराड़िया मंदिर से सिर्फ 2.8 km।
- खासियत: यह हिरण, नीलगाय, तेंदुए और पक्षियों का जंगल है। पहाड़ी के ऊपर होल्कर ज़माने का पुराना शिकारगाह बना है। पर्यटक यहाँ ट्रैकिंग और ई-रिक्शा सफारी का मज़ा ले सकते हैं।
- टिंचा फॉल (Tincha Waterfall):
- दूरी: देवगुराड़िया मंदिर से लगभग 12 से 15 km।
- खासियत: यह लगभग 300 ft ऊंचा सुंदर प्राकृतिक झरना है। सावन और बारिश के मौसम में यहाँ का नज़ारा पिकनिक मनाने के लिए बेस्ट होता है।
- पातालपानी झरना (Patalpani Waterfall):
- दूरी: देवगुराड़िया से लगभग 33 km।
- खासियत: 300 ft की ऊंचाई से गिरता हुआ इंदौर का सबसे मशहूर झरना और हेरिटेज ट्रेन का रूट।
- खजराना गणेश मंदिर (Khajrana Ganesh Mandir):
- दूरी: देवगुराड़िया से लगभग 7.7 km।
- खासियत: अहिल्याबाई होल्कर द्वारा बनवाया गया इंदौर का सबसे प्रसिद्ध और सिद्ध गणेश मंदिर।
- बिलावली झील (Bilavali Lake):
- दूरी: देवगुराड़ियासे लगभग 4.1 km।
- खासियत: शाम के समय सुकून से बैठने और झील का नज़ारा देखने के लिए बहुत अच्छी जगह।
- छत्रीबाग और राजवाड़ा (Chhatribag & Rajwada):
- दूरी: शहर के केंद्र में, देवगुराड़िया (Devguradia) मंदिर से लगभग 7 से 8 km।
- खासियत: होल्कर राजाओं की ऐतिहासिक छत्रियां और 7-storied राजवाड़ा महल।
8. देवगुराड़िया (Devguradia) दर्शन और यात्रा की आसान गाइड (Travel Details Table)
| बात / विषय | आवश्यक जानकारी |
| मंदिर का पता | ग्राम दुधिया, नेमावर रोड (NH 59), इंदौर, मध्य प्रदेश 452016 |
| शहर से दूरी | इंदौर जंक्शन से ~9 km | इंदौर बाईपास से ~1.5 km | एयरपोर्ट से ~18 km |
| एंट्री फीस | सभी के लिए एकदम मुफ़्त (Free Entry) |
| मंदिर खुलने का समय | रोज़ सुबह 6:00 AM से रात 9:00 PM तक (शनिवार और सावन सोमवार को रात 10:00 PM तक) |
| आरती का समय | सुबह की आरती: 7:00 AM | शाम की आरती: 7:00 PM |
| घूमने का सबसे सही समय | सावन का महीना (जुलाई से सितंबर) और ठंड का मौसम (अक्टूबर से मार्च) |
| कितना समय लगेगा | सामान्य दिनों में 1 से 2 घंटे (सावन सोमवार और महाशिवरात्रि मेले में 3 से 4 घंटे) |
| कैसे पहुंचे | इंदौर सिटी बस, ऑटो, टैक्सी या बाइक से नेमावर रोड होकर आसानी से देवगुराड़िया (Devguradia) जा सकते हैं |
| सुविधाएं | नि:शुल्क पार्किंग, पीने का पानी, पूजा व प्रसाद की दुकानें |
9. निष्कर्ष
इंदौर का देवगुराड़िया मंदिर सिर्फ एक धार्मिक स्थान नहीं है, बल्कि यह प्रकृति, इतिहास और लोक-संस्कृति का एक अनोखा संगम है। 7th century के परमार काल से लेकर अहिल्याबाई होल्कर के समय तक का इतिहास, 12 ft नीचे छिपा गुप्त मंदिर, सावन में पहाड़ के गोमुख से गिरता प्राकृतिक जल, महाशिवरात्रि का 3 से 5 दिनों का भव्य मेला और पास ही स्थित रालामंडल व टिंचा फॉल जैसे खूबसूरत स्थान इसे इंदौर का एक बेहद अनमोल रत्न बनाते हैं ।
Disclaimer: यह जानकारी इंटरनेट सोर्सेज के माध्यम से ली गयी है। जानकारी की सटीकता या विश्वसनीयता की गारंटी नहीं है। धर्मकहानी का उद्देश्य सटीक सूचना आप तक पहुंचाना है, इसके उपयोगकर्ता सावधानी पूर्वक पढ़ और समझकर ही लें। इसके अतिरिक्त, इस जानकारी का उपयोग की जिम्मेदारी स्वयं उपयोगकर्ता की ही रहेगी। अगर इसमें आपको कोई गलती लगती है तो कृपया आप हमें हमारे ऑफिसियल ईमेल पर जरूर बताये
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