भाग एक में नागों की उत्पत्ति और नाग लोक की नींव समझी। भाग दो में शेषनाग, वासुकि, तक्षक, कालिया, मनसा देवी और उलूपी की गहरी कथाएं सुनीं। अब Naag Lok Rahasya की इस यात्रा के तीसरे और सबसे गहरे पड़ाव पर आने का समय है।
इस भाग में वह सब आएगा जो नाग को केवल एक प्राणी नहीं बल्कि एक दर्शन बनाता है। शिव के गले में नाग केवल आभूषण नहीं है। विष्णु का शेषनाग पर लेटना केवल एक दृश्य नहीं है। जनमेजय का यज्ञ केवल एक घटना नहीं है। कुंडलिनी का सर्प रूप केवल एक प्रतीक नहीं है। और नागपंचमी केवल एक त्योहार नहीं है। इन सबके पीछे एक पूरा ब्रह्मांडीय सत्य है।
॥ रुद्राष्टाध्यायी से नमक मंत्र ॥
नमो अस्तु सर्पेभ्यो ये के च पृथिवीमनु।
ये अन्तरिक्षे ये दिवि तेभ्यः सर्पेभ्यो नमः॥
~~ कृष्ण यजुर्वेद, रुद्राष्टाध्यायी
अर्थ — पृथ्वी पर, अंतरिक्ष में और स्वर्ग में जो भी नाग हैं उन सबको नमस्कार
1. शिव के गले में नाग : लिंग पुराण और शिव पुराण दोनों से वह पूरा रहस्य
शिव की हर मूर्ति में, हर तस्वीर में एक चीज हमेशा होती है। गले में लिपटा हुआ नाग। यह वासुकि हैं। लेकिन Naag Lok Rahasya के अनुसार यह संबंध कब बना, क्यों बना और इसका अर्थ क्या है यह बहुत कम लोग जानते हैं।
लिंग पुराण में एक कथा है जो शिव और नागों के संबंध की नींव बताती है। जब सृष्टि के आरंभ में ब्रह्मा और विष्णु में यह विवाद हुआ कि दोनों में कौन श्रेष्ठ है तब शिव एक अनंत ज्योति स्तंभ के रूप में प्रकट हुए। उस स्तंभ के आरंभ और अंत को ब्रह्मा और विष्णु दोनों नहीं खोज पाए। उस ज्योति स्तंभ के चारों ओर एक विशाल नाग लिपटा हुआ था। वह नाग शेषनाग थे।
यह दृश्य बताता है कि शिव और नाग का संबंध सृष्टि के पहले दिन से है। नाग केवल शिव का आभूषण नहीं बल्कि शिव की अनंतता का प्रतीक है। जिस तरह शेषनाग का कोई अंत नहीं उसी तरह शिव का भी कोई अंत नहीं।
समुद्र मंथन के बाद वह पल जब शिव ने वासुकि को गले में धारण किया
शिव पुराण में समुद्र मंथन की कथा में एक ऐसा प्रसंग है जो बहुत कम जगह बताया जाता है। जब हलाहल विष निकला और शिव ने उसे पी लिया तब पार्वती ने उनका गला दबाया ताकि विष नीचे न जाए। विष गले में ही रह गया और शिव नीलकंठ बन गए।
उसी पल वासुकि वहाँ आए। उन्होंने शिव को प्रणाम किया। शिव ने वासुकि को देखा और कहा कि तुमने समुद्र मंथन में जो बलिदान दिया वह मैंने देखा। तुम्हारे मुख से निकले विष से ही हलाहल बना था। तुम्हारा यह कष्ट मुझे याद रहेगा। शिव ने वासुकि को अपने गले में धारण किया। यह एक राजा को उसके बलिदान का पुरस्कार था।
शिव के पूरे शरीर पर नाग : हर अंग का अर्थ
शिव पुराण में लिखा है कि शिव के शरीर पर केवल वासुकि नहीं हैं। उनके कड़े नाग के हैं। उनका यज्ञोपवीत यानी जनेऊ नाग का है। उनकी भुजाओं में नाग लिपटे हैं। उनके जटाजूट में भी नाग हैं।
हर अंग का एक अलग अर्थ है। गले में वासुकि यानी जो बलिदान करे उसे शिव सबसे करीब रखते हैं। कड़ों में नाग यानी शक्ति का प्रतीक। जनेऊ में नाग यानी धर्म और कर्तव्य का प्रतीक। जटाजूट में नाग यानी ज्ञान के सर्वोच्च स्तर पर भी नाग की उपस्थिति।
यह सब मिलाकर एक संदेश देते हैं। शिव ने पूरे नाग कुल को अपने साथ रखा। यह उनकी उस प्रतिज्ञा का प्रतीक है कि जो उनकी शरण में आए उन्हें वे कभी नहीं छोड़ते चाहे वह देवता हो, मनुष्य हो या नाग।
Naag Lok Rahasya Part 1 – नागों की उत्पत्ति, पाताल के सात स्तर और नाग लोक के प्राचीन द्वार
2. विष्णु और शेषनाग : क्षीर सागर का वह दर्शन जो सृष्टि का सबसे बड़ा रहस्य है
विष्णु का शेषनाग पर लेटना हर हिंदू घर में दिखने वाली छवि है। लेकिन Naag Lok Rahasya की गहराई में जाने पर पता चलता है कि इस छवि में जितना दिखता है उससे कहीं अधिक है।
भागवत पुराण में शुकदेव जी ने कहा कि क्षीर सागर कोई भौतिक सागर नहीं है। यह चेतना का वह सागर है जो अनंत है, शुद्ध है और सबका आधार है। दूध जैसा सफेद, दूध जैसा पौष्टिक और दूध जैसा जीवन देने वाला। इसी चेतना के सागर में शेषनाग तैरते हैं और विष्णु उन पर विराजमान हैं।
योग निद्रा : वह अवस्था जो साधारण नींद नहीं है
विष्णु क्षीर सागर में योग निद्रा में हैं। यह अवस्था साधारण नींद नहीं है। जो सोता है वह बेहोश होता है। लेकिन जो योग निद्रा में है वह जागते हुए सोता है। वह भीतर से पूरी तरह जागरूक है लेकिन बाहर से शांत दिखता है।
यह वह अवस्था है जिसमें परमात्मा सृष्टि की देखभाल करते हुए भी उससे परे रहते हैं। वे सब कुछ देखते हैं, सब कुछ जानते हैं लेकिन किसी भी घटना से प्रभावित नहीं होते। और शेषनाग वह आधार हैं जिस पर यह पूरी व्यवस्था टिकी है।
प्रलय काल में शेषनाग की भूमिका
विष्णु पुराण में लिखा है कि जब कल्प का अंत होता है तब विष्णु की योग निद्रा टूटती है। वे जागते हैं। उसी क्षण शेषनाग के मुख से संकर्षण अग्नि निकलती है। यह वह अग्नि है जो पूरी सृष्टि को भस्म कर देती है। पहाड़ जलते हैं, समुद्र सूखते हैं, देवता अपने लोकों में विलीन होते हैं।
जब सब कुछ जल जाता है तब केवल क्षीर सागर बचता है। शेषनाग बचते हैं। और विष्णु फिर से योग निद्रा में लीन हो जाते हैं। नई सृष्टि के लिए।
यह चक्र अनंत है। शेषनाग इस चक्र के साक्षी हैं। वे न सृष्टि के आरंभ में जन्मे न प्रलय में नष्ट होते हैं। वे अनंत हैं, वे शेष हैं। इसीलिए उनका नाम शेषनाग है।
भागवत पुराण में एक श्लोक है जिसमें कहा गया है कि शेषनाग इतने शक्तिशाली हैं कि अगर वे चाहें तो एक पल में पूरी सृष्टि को निगल सकते हैं। लेकिन वे ऐसा नहीं करते क्योंकि वे विष्णु के आदेश में रहते हैं। यह शक्ति होते हुए भी समर्पण का भाव रखना शेषनाग की सबसे बड़ी विशेषता है। और यही विशेषता उन्हें विष्णु का सबसे करीबी बनाती है।
3. जनमेजय का नाग यज्ञ : वह भयंकर यज्ञ जिसमें स्वर्ग तक हिल गया
महाभारत की सबसे रोंगटे खड़े करने वाली कथाओं में से एक है जनमेजय का नाग यज्ञ। Naag Lok Rahasya के इस अध्याय में यह केवल एक राजा के बदले की कथा नहीं है। यह उस सत्य की कथा है कि जब व्यक्तिगत दुख में अंधा होकर कोई पूरी एक सभ्यता को मिटाने पर उतारू हो जाए तो क्या होता है।
राजा परीक्षित की मृत्यु तक्षक के काटने से हुई थी। उनके पुत्र जनमेजय को जब यह पता चला तो उनका दुख क्रोध में बदल गया। उन्होंने प्रतिज्ञा ली कि वे पूरी नाग जाति को नष्ट कर देंगे।
यज्ञ की तैयारी और उसकी अलौकिक शक्ति
जनमेजय ने तक्षशिला में एक विशाल यज्ञ कुंड बनवाया। देश भर के ऋत्विजों को बुलाया गया। वे ऋत्विज जो नाग यज्ञ के मंत्र जानते थे। यह मंत्र साधारण मंत्र नहीं थे। यह वे मंत्र थे जो नागों को नाम लेकर बुला सकते थे और उन्हें अग्नि में खींच सकते थे।
जब यज्ञ शुरू हुआ तो पहले छोटे नाग आने लगे। फिर बड़े नाग। फिर और बड़े। महाभारत में लिखा है कि नाग आकाश से गिरते थे, जमीन से निकलते थे और पानी से आते थे। हजारों नाग हर दिन उस यज्ञ कुंड की आग में जल रहे थे। नाग लोक में भगदड़ मच गई।
जब इंद्र भी खिंचने लगे
जब तक्षक की बारी आई तो वे बचने के लिए इंद्र की शरण में गए। तक्षक इंद्र के सिंहासन से लिपट गए। ऋत्विजों ने मंत्र जारी रखे। और तब जो हुआ वह चौंकाने वाला था। तक्षक सहित इंद्र का सिंहासन भी यज्ञ कुंड की ओर खिंचने लगा।
स्वर्ग में हाहाकार मच गया। देवता भागने लगे। इंद्र घबरा गए। उन्होंने तक्षक को छोड़ दिया। लेकिन अब तक्षक अकेले खिंच रहे थे। यज्ञ की आग उन्हें निगलने ही वाली थी।
यज्ञ में कितने नाग जले
महाभारत में इस यज्ञ का वर्णन करते हुए बताया गया है कि इस यज्ञ में हजारों-लाखों नाग जले। शेषनाग और वासुकि बचे क्योंकि शेषनाग विष्णु के आसन थे और उन्हें यज्ञ की आग नहीं छू सकती थी। वासुकि शिव के गले में थे इसलिए वे भी सुरक्षित थे। लेकिन बाकी असंख्य नाग उस यज्ञ में जले।
नाग लोक लगभग खाली हो गया था। जो नाग बचे थे वे छुप गए थे। यज्ञ और चलता रहता लेकिन तभी आस्तीक आए।
महाभारत में यह भी लिखा है कि जनमेजय के यज्ञ में एक ऋत्विज ने बीच में कहा कि यह यज्ञ रोका जाना चाहिए। उसने कहा कि जो नाग निर्दोष हैं वे भी जल रहे हैं। केवल तक्षक ने परीक्षित को काटा था, बाकी नागों का क्या दोष? जनमेजय ने उस ऋत्विज की बात नहीं सुनी। यह उस अंधे बदले की भावना को दर्शाता है जो व्यक्ति को तर्क से अंधा कर देती है।
Naag Lok Rahasya Part 2 – शेषनाग की तपस्या, वासुकि का बलिदान और नागमणि का रहस्य
4. आस्तीक की पूरी यात्रा : जन्म से लेकर नाग सभ्यता बचाने तक
आस्तीक की कथा महाभारत की सबसे प्रेरणादायक कथाओं में से एक है। Naag Lok Rahasya में एक बालक जिसने केवल अपनी विद्वत्ता और वाणी की शक्ति से एक पूरी सभ्यता को बचा लिया।
आस्तीक के पिता थे जरत्कारु ऋषि और माता थीं मनसा देवी जो वासुकि की बहन थीं। जरत्कारु ऋषि विवाह नहीं करना चाहते थे लेकिन अपने पितरों की मुक्ति के लिए उन्हें विवाह करना पड़ा। मनसा देवी से विवाह हुआ और आस्तीक का जन्म हुआ।
बालक आस्तीक की यात्रा तक्षशिला तक
जब जनमेजय का यज्ञ चल रहा था तब आस्तीक केवल एक बालक थे। लेकिन उनमें वेद और शास्त्रों का असाधारण ज्ञान था। वासुकि ने आस्तीक को बुलाया और कहा कि भांजे अब तुम्हें जाना होगा। केवल तुम ही इस यज्ञ को रोक सकते हो।
आस्तीक तक्षशिला पहुँचे जहाँ यज्ञ हो रहा था। उस यज्ञ में प्रवेश करना साधारण बात नहीं थी। द्वार पर रक्षक थे। आस्तीक ने उन्हें अपनी विद्वत्ता से चकित किया और प्रवेश पाया।
जनमेजय को कैसे मनाया
यज्ञ के भीतर पहुँचकर आस्तीक ने मंत्रों का पाठ शुरू किया। उनके मुख से जो श्लोक निकल रहे थे वे इतने शुद्ध और इतने भावपूर्ण थे कि सभी ऋत्विज रुक गए। जनमेजय भी सुनने लगे।
आस्तीक ने जनमेजय की स्तुति की। उनके पूर्वजों की प्रशंसा की। उनके धर्म और न्याय की प्रशंसा की। जनमेजय इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने कहा कि माँगो जो माँगना है।
आस्तीक ने कहा कि हे राजन् मेरी एक इच्छा है। यह यज्ञ बंद हो जाए। जनमेजय ने कहा कि यह कैसे हो सकता है? मैंने तक्षक से बदला लेने की प्रतिज्ञा ली है। आस्तीक ने कहा कि राजन् आपने कहा कि जो माँगूँ वह दोगे। अब मुझे यही चाहिए। जनमेजय के पास कोई रास्ता नहीं था। उन्होंने यज्ञ बंद करवाया।
जब यज्ञ बंद हुआ तब तक्षक जो यज्ञ कुंड के ऊपर ही थे वे बच गए। नाग लोक में जश्न मनाया गया। वासुकि ने आस्तीक को गले लगाया। मनसा देवी ने अपने पुत्र को आशीर्वाद दिया।
महाभारत में लिखा है कि उसी दिन से श्रावण शुक्ल पंचमी को नागपंचमी मनाने की परंपरा शुरू हुई। जिस दिन नागों को बचाया गया उस दिन की याद में हर साल नागों की पूजा होती है।
जनमेजय को भी बाद में पछतावा हुआ। उन्होंने महसूस किया कि उन्होंने क्रोध में जो किया वह उचित नहीं था। निर्दोष नागों का संहार किसी भी दृष्टि से न्यायसंगत नहीं था। यह पछतावा उनके बाकी जीवन में उनके साथ रहा।
महाभारत में आस्तीक के यज्ञ रोकने के बाद एक और प्रसंग है। जनमेजय ने आस्तीक से पूछा कि तुम इतने छोटे हो लेकिन तुम्हारा ज्ञान इतना विशाल कैसे है? आस्तीक ने कहा कि मेरे पिता ब्राह्मण थे और माता नाग कुल की थीं। दोनों का ज्ञान मेरे भीतर है। ब्राह्मण का धर्म और नाग की शक्ति। जब ये दोनों मिलते हैं तो जो बनता है वह किसी को भी रोक सकता है। यह बात आज भी उतनी ही सच है।
5. दक्षिण भारत में नाग : केरल के सर्पकावु और वह परंपरा जो हजारों साल पुरानी है
भारत में नाग की उपासना का सबसे जीवंत रूप अगर कहीं आज भी दिखता है तो वह है केरल। Naag Lok Rahasya से जुड़ी यहाँ सर्पकावु की परंपरा है जो दुनिया में अपनी तरह की एकमात्र परंपरा है।
सर्पकावु यानी नाग वन। केरल में परंपरागत रूप से हर घर के पिछवाड़े में या खेत के किसी कोने में एक छोटा जंगल होता था जिसे काटा नहीं जाता था। इस जंगल में नाग स्वतंत्र रूप से रहते थे। इसे सर्पकावु कहते हैं।
सर्पकावु में क्या होता है
सर्पकावु में घने पेड़ होते हैं। वहाँ कोई खेती नहीं होती, कोई निर्माण नहीं होता। केवल प्राकृतिक वनस्पति और उसमें रहने वाले नाग। सर्पकावु की देखभाल के लिए विशेष पुजारी होते हैं जिन्हें पुलुवन कहते हैं।
पुलुवन परिवार पीढ़ियों से नाग देवता की सेवा करते आए हैं। वे विशेष गीत गाते हैं जिन्हें सर्प गान कहते हैं। यह गान मलयालम में है और इनमें नागों की स्तुति होती है। यह गान इतने पुराने हैं कि कुछ विद्वानों का मानना है कि यह संस्कृत से भी पहले की भाषा में रचे गए हैं।
आयुर्वेद और नाग का वह संबंध जो दवाओं में छुपा है
केरल की आयुर्वेद परंपरा में नाग का एक विशेष स्थान है। चरक संहिता और सुश्रुत संहिता दोनों में नाग विष के औषधीय उपयोग का वर्णन है। नाग विष की सूक्ष्म मात्रा कुछ रोगों में औषधि का काम करती है।
केरल के पारंपरिक वैद्य आज भी सर्प विष से बनी औषधियाँ तैयार करते हैं। यह औषधियाँ गठिया, लकवा और कुछ त्वचा रोगों में प्रभावशाली मानी जाती हैं। सुश्रुत संहिता में लिखा है कि नाग विष की उचित मात्रा वात रोगों में बहुत लाभकारी होती है।
केरल में एक परंपरा है जिसे सर्पम तुल्लल कहते हैं। यह एक अनुष्ठान है जिसमें नाग देवता का आह्वान किया जाता है। इस अनुष्ठान में पुलुवन और उनके परिवार की महिलाएं शामिल होती हैं। अनुष्ठान के दौरान कभी-कभी ऐसी घटनाएँ होती हैं जिनकी कोई वैज्ञानिक व्याख्या नहीं है। यह अनुष्ठान रात भर चलता है और इसमें जो गीत गाए जाते हैं उनमें नाग लोक का वर्णन होता है।
6. कुंडलिनी और नाग : योग साधना का वह रहस्य जो हजारों साल से गुरु-शिष्य परंपरा में रहा
कुंडलिनी को सर्प क्यों कहा गया? यह सवाल जो पहली बार सुनता है उसे अजीब लगता है। लेकिन Naag Lok Rahasya के अनुसार यह संबंध बहुत गहरा है और बहुत पुराना है।
तंत्र शास्त्र में कुंडलिनी को एक सोई हुई शक्ति बताया गया है जो मेरुदंड के सबसे निचले भाग में यानी मूलाधार चक्र में साढ़े तीन कुंडल मारकर सोई हुई है। यह ठीक उसी तरह है जैसे एक नाग कुंडल मारकर सोया रहता है।
सात चक्र और नाग का प्रतीकवाद
मानव शरीर में सात चक्र बताए गए हैं। मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत, विशुद्ध, आज्ञा और सहस्रार। यह सात चक्र मेरुदंड के साथ-साथ ऊपर की ओर जाते हैं।
जब कुंडलिनी जागती है तो वह नाग की तरह अपना कुंडल खोलती है और ऊपर की ओर उठने लगती है। एक-एक चक्र को भेदते हुए वह ऊपर जाती है। जब वह सहस्रार चक्र तक पहुँचती है तब साधक को जो अनुभव होता है उसे समाधि कहते हैं।
शेषनाग के एक हजार फन और सहस्रार चक्र के एक हजार दलों में एक समानता है। दोनों में एक हजार यानी अनंत। जब कुंडलिनी शक्ति सहस्रार तक पहुँचती है तब वह शेषनाग की तरह अनंत हो जाती है।
तंत्र परंपरा में नाग
तंत्र शास्त्र में नाग को एक दिव्य शक्ति का प्रतीक माना जाता है। नाग का फन उठाना यानी कुंडलिनी का जागना। नाग का विष यानी वह ऊर्जा जो अगर सही दिशा में जाए तो अमृत बन जाती है और गलत दिशा में जाए तो विनाशकारी।
इसीलिए शिव के गले में नाग है। शिव महायोगी हैं। उन्होंने कुंडलिनी को जाग्रत कर लिया है। उनके गले में नाग यह बताता है कि वह शक्ति जो अधिकांश लोगों में सोई है वह शिव में पूरी तरह जाग्रत है।
गोरखनाथ के ग्रंथों में कुंडलिनी और नाग का संबंध बहुत विस्तार से बताया गया है। उन्होंने लिखा है कि जब साधक ध्यान में गहरे जाता है तो उसे अपनी रीढ़ में एक गर्म धारा महसूस होती है जो ऊपर की ओर उठती है। यह वही कुंडलिनी है। इस अनुभव को उन्होंने नाग के उठने की तरह बताया है। जो साधक इस अनुभव को सही गुरु के मार्गदर्शन में लेते हैं उनकी साधना पूर्ण होती है।
7. कालसर्प दोष : राहु और केतु का वह सच जो ज्योतिष से पहले पुराणों में है
कालसर्प दोष आज बहुत प्रचलित शब्द है। हर दूसरे व्यक्ति को पंडित बताते हैं कि उनकी जन्मकुंडली में कालसर्प दोष है। लेकिन इस दोष का पौराणिक आधार क्या है? राहु और केतु नाग कैसे बने? Naag Lok Rahasya के अंतर्गत यह सब समझना जरूरी है।
स्वरभानु : वह असुर जो दो ग्रह बन गया
भागवत पुराण में समुद्र मंथन की कथा में एक बहुत महत्वपूर्ण प्रसंग है। जब अमृत निकला तो देवताओं और असुरों में उसे लेकर विवाद हो गया। विष्णु ने मोहिनी रूप धारण किया और देवताओं को अमृत पिलाने लगे।
एक असुर था जिसका नाम स्वरभानु था। वह देवताओं के बीच चुपचाप बैठ गया और अमृत पी लिया। लेकिन सूर्य और चंद्रमा ने उसे पहचान लिया और विष्णु को बताया। विष्णु ने तुरंत सुदर्शन चक्र से स्वरभानु का सिर काट दिया।
लेकिन अमृत पी चुके होने के कारण स्वरभानु मरा नहीं। उसका सिर राहु बन गया और धड़ केतु बन गया। दोनों ग्रह बन गए। और तब से सूर्य और चंद्रमा से उनकी शत्रुता है। इसीलिए ग्रहण होते हैं। राहु और केतु सूर्य और चंद्रमा को निगलते हैं।
कालसर्प दोष का असली अर्थ
ज्योतिष में कालसर्प दोष तब बनता है जब जन्मकुंडली में सभी ग्रह राहु और केतु के बीच में आ जाते हैं। राहु और केतु दोनों नाग के रूप में माने जाते हैं। राहु सिर है और केतु पूंछ। जब सारे ग्रह इन दोनों के बीच फँस जाते हैं तो ऐसा लगता है जैसे एक नाग ने पूरी कुंडली को अपने घेरे में ले लिया हो।
यह दोष जीवन में अनेक बाधाएं लाता है ऐसी मान्यता है। लेकिन ज्योतिष के ज्ञाता यह भी कहते हैं कि जिन महान व्यक्तियों की कुंडली में कालसर्प दोष था उनमें से कई ने असाधारण उपलब्धियाँ हासिल कीं। कालसर्प दोष केवल बाधा नहीं है। यह एक ऐसी ऊर्जा है जो अगर सही दिशा में जाए तो असाधारण परिणाम देती है।
सपने में नाग दिखने का पौराणिक अर्थ
पुराणों में स्वप्न शास्त्र का एक पूरा विभाग है। उसमें नाग के सपने का अर्थ भी बताया गया है। अगर सपने में नाग दिखे और वह शांत हो, फन उठाए खड़ा हो तो यह शुभ माना गया है। इसे देव कृपा का संकेत कहते हैं।
अगर सपने में नाग काट रहा हो तो यह किसी आने वाली कठिनाई का संकेत माना जाता है। अगर सपने में नाग को दूध पिला रहे हों तो यह पितरों की संतुष्टि का संकेत है। और अगर सपने में शेषनाग के दर्शन हों तो यह अत्यंत शुभ माना जाता है। इसे विष्णु की कृपा का प्रतीक कहते हैं।
राहु और केतु को ज्योतिष में छाया ग्रह कहते हैं यानी यह भौतिक ग्रह नहीं हैं। यह वे बिंदु हैं जहाँ चंद्रमा की कक्षा और सूर्य की कक्षा एक-दूसरे को काटती हैं। इन बिंदुओं पर ही ग्रहण होते हैं। आधुनिक खगोल विज्ञान इन बिंदुओं को lunar nodes कहता है। यानी प्राचीन भारतीय ज्योतिषियों ने हजारों साल पहले इन बिंदुओं को पहचान लिया था और उन्हें नाग का प्रतीक देकर उनकी शक्ति को समझाया था।
8. इच्छाधारी नाग : लोककथा और पुराण में क्या फर्क है
इच्छाधारी नाग। यह नाम सुनते ही मन में एक सुंदर नागिन का चित्र आता है जो मनुष्य का रूप धारण कर लेती है। फिल्मों ने इस विषय को इतना बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया है कि असली Naag Lok Rahasya कहीं दब गया है।
सच यह है कि पुराणों में नागों के मनुष्य रूप धारण करने का उल्लेख मिलता है। लेकिन इच्छाधारी शब्द पुराणों में नहीं है। पुराणों में नागों को विद्याधर और देवयोनि प्राणी बताया गया है जो अपनी इच्छा से रूप बदल सकते हैं।
पुराणों में नाग के मनुष्य रूप के उदाहरण
महाभारत में उलूपी नाग लोक की राजकुमारी थीं जो मनुष्य रूप में आईं और अर्जुन से विवाह किया। भागवत पुराण में कालिया नाग की पत्नियों ने मनुष्य रूप में आकर कृष्ण से प्रार्थना की। मुचलिंद नाग ने बुद्ध की रक्षा के बाद मनुष्य रूप धारण किया।
यह सब उदाहरण बताते हैं कि नाग रूप बदल सकते हैं। लेकिन यह रूप परिवर्तन किसी उद्देश्य के लिए होता है, किसी को धोखा देने के लिए नहीं।
फिल्मी इच्छाधारी नाग पुराणों में नहीं है
जो नागिन बदला लेने के लिए सैकड़ों साल तक इंसानों के पीछे पड़ी रहती है, जो अपने मृत साथी का बदला लेती है, यह पूरी अवधारणा पुराणों में नहीं है। यह लोक कथाओं और बाद की साहित्यिक परंपरा से आई है।
सातवीं शताब्दी के संस्कृत उपन्यास कादम्बरी में नागों का मनुष्य रूप में आने का वर्णन है। लेकिन यह पुराण नहीं है। यह साहित्य है। साहित्य में कल्पना का स्थान होता है। जब पुराण और साहित्य को मिला देते हैं तब भ्रम पैदा होता है।
पुराणों के नाग बुद्धिमान हैं, शक्तिशाली हैं और कभी-कभी मनुष्य रूप लेते हैं। लेकिन वे बदले की भावना से नहीं चलते। उनका स्वभाव अधिकांशतः धर्म और कर्तव्य से संचालित है।
भारत के कुछ आदिवासी समुदायों में नाग और मनुष्य के बीच विवाह की परंपराओं का उल्लेख उनकी मौखिक परंपरा में मिलता है। नागालैंड के कुछ जनजातियों में यह मान्यता है कि उनके पूर्वज नाग और मनुष्य दोनों थे। मणिपुर की मैतेई जनजाति में पखंगबा नाग देवता की पूजा होती है जो मनुष्य और नाग दोनों के पूर्वज माने जाते हैं। यह बताता है कि नाग और मनुष्य के संबंध की कथाएं केवल पुराण नहीं बल्कि जीवित लोक परंपरा का हिस्सा हैं।
9. नागपंचमी : ज्योतिष, आयुर्वेद और पौराणिक तीनों दृष्टिकोण से
नागपंचमी हर साल श्रावण शुक्ल पंचमी को आती है। लेकिन यह त्योहार केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं है। Naag Lok Rahasya के इस पर्व के पीछे ज्योतिष, आयुर्वेद और पौराणिक तीनों का एक गहरा आधार है।
पौराणिक दृष्टिकोण : आस्तीक की कथा से जन्मी परंपरा
जैसा भाग तीन में पहले आया, महाभारत में यह स्पष्ट लिखा है कि जिस दिन आस्तीक ने जनमेजय का यज्ञ रोका वह दिन श्रावण शुक्ल पंचमी था। उसी दिन से नागपंचमी मनाई जाती है। यह नागों के बचने का दिन है। यह दिन यह याद दिलाता है कि एक बालक की विद्वत्ता और सत्य की शक्ति एक पूरी सभ्यता को बचा सकती है।
ज्योतिष दृष्टिकोण : श्रावण शुक्ल पंचमी का महत्व
ज्योतिष में श्रावण मास को शिव का महीना माना जाता है। शिव के गले में नाग है। इसलिए इस महीने में नाग पूजा का विशेष महत्व है।
पंचमी तिथि को नाग की तिथि माना जाता है। हर महीने की शुक्ल और कृष्ण पंचमी नाग पूजा के लिए शुभ मानी जाती है। लेकिन श्रावण शुक्ल पंचमी सबसे विशेष है क्योंकि इस दिन शिव का महीना, शुक्ल पक्ष की शुभ ऊर्जा और पंचमी का नाग संबंध तीनों एक साथ मिलते हैं।
ज्योतिष में राहु और केतु से जुड़े दोषों की शांति के लिए भी नागपंचमी पर विशेष पूजा की जाती है। कालसर्प दोष से पीड़ित व्यक्तियों के लिए इस दिन नाग पूजा अत्यंत फलदायी मानी जाती है।
आयुर्वेद दृष्टिकोण : नाग विष और उसके उपयोग
श्रावण मास में वर्षा के कारण नाग अपने बिलों से बाहर निकलते हैं। यह समय सांप के काटने का सबसे अधिक खतरा होता है। इसलिए प्राचीन काल में किसानों और ग्रामीणों ने नागपंचमी पर नागों की पूजा करने की परंपरा बनाई ताकि नाग उन्हें हानि न पहुँचाएं।
चरक संहिता में लिखा है कि नाग विष की उचित मात्रा कई रोगों में औषधि का काम करती है। विशेषकर वात रोगों में यानी जोड़ों के दर्द और लकवे में नाग विष से बनी औषधियाँ प्रभावशाली होती हैं। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में भी सर्प विष से दवाएं बनाई जाती हैं। यह प्राचीन ज्ञान का आधुनिक विस्तार है।
नागपंचमी पर दूध चढ़ाने का असली अर्थ
आज वन्यजीव विशेषज्ञ कहते हैं कि सांपों को दूध नहीं पिलाना चाहिए क्योंकि उनका पाचन तंत्र दूध के लिए नहीं बना। यह सही बात है। लेकिन पुराणों में दूध का अर्थ भी देखना चाहिए।
दूध शुद्धता का प्रतीक है। जब कोई भक्त नाग को दूध चढ़ाता है तो वह यह कह रहा होता है कि हे नाग देव मेरे मन में तुम्हारे प्रति कोई भय या घृणा नहीं है। मैं तुम्हें उसी शुद्धता से देखता हूँ जैसे दूध शुद्ध है। यह एक भावनात्मक समर्पण है।
उत्तर भारत और दक्षिण भारत में नागपंचमी अलग-अलग तरह से मनाई जाती है। उत्तर में नाग की मिट्टी या धातु की मूर्ति बनाकर पूजा होती है। दक्षिण में केरल में सर्पकावु में जाकर जीवित नागों की पूजा होती है। महाराष्ट्र में घर के नाग की पूजा होती है। बंगाल में मनसा देवी की पूजा होती है। राजस्थान में नाग की बाँबी पर दूध चढ़ाया जाता है। एक ही त्योहार, पूरे भारत में अलग-अलग रंग। लेकिन भाव एक ही है। नाग के प्रति कृतज्ञता और सम्मान।
Naag Lok Rahasya की इस यात्रा का तीसरा पड़ाव यहाँ समाप्त होता है। हमने शिव और नागों का वह अटूट रिश्ता जाना जो सृष्टि के आरंभ से है। विष्णु और शेषनाग का क्षीर सागर दर्शन समझा। जनमेजय के यज्ञ की भयंकरता देखी। आस्तीक की असाधारण यात्रा जानी। केरल के सर्पकावु की उस परंपरा को जाना जो आज भी जीवित है। कुंडलिनी और नाग का संबंध समझा। राहु-केतु और कालसर्प दोष का पौराणिक आधार जाना। इच्छाधारी नाग का सच देखा। और नागपंचमी के तीन आयाम समझे।
भाग चार में यह यात्रा एक नए रूप में होगी। वह रूप जो भारत से बाहर है लेकिन उसकी जड़ें भारत में हैं। मिस्र का उरायस नाग, चीन का ड्रैगन, मेसोअमेरिका का पंखयुक्त सर्प और यूनानी हाइड्रा। यह सब मिलकर यह सिद्ध करते हैं कि नाग का रहस्य केवल भारत का नहीं बल्कि पूरी मानव सभ्यता का है।
॥ नाग शांति मंत्र ॥
सर्पो मे अयं परिपातु पादौ।
सर्पो मे उरू परिपातु मध्यम्।
सर्पः सर्वाङ्गं मे परिपातु नित्यम्॥
अर्थ : नाग देवता मेरे पैरों की रक्षा करें, मेरी जाँघों की रक्षा करें, मेरे मध्य भाग की रक्षा करें और मेरे सम्पूर्ण शरीर की नित्य रक्षा करें




