Ashta Bhairav : सनातन धर्म और तंत्र शास्त्र में जब भी ‘भैरव’ नाम हमारे सामने आता है, तो अक्सर मन में एक बेहद गुस्से वाला रूप, हाथ में खप्पर और साथ में एक कुत्ते की छवि उभरती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिसे हम सामान्यतः एक डरावना स्वरूप समझते हैं, उसके पीछे ब्रह्मांड का सबसे गहरा दार्शनिक रहस्य छिपा है?
भैरव जी की पूजा और उनका महत्व हमेशा से ही हमारी सनातन परंपरा का एक बेहद खास और जाग्रत हिस्सा रहा है। उन्हें सही से समझने के लिए हमें उनके असली स्वरूप को गहराई से जानना होगा। आइए, आज इस विशेष लेख में हम Ashta Bhairav की उत्पत्ति, उनके गुप्त तांत्रिक रहस्यों और उनकी पवित्र पीठों के बारे में सब कुछ बिल्कुल सरल भाषा में समझते हैं और सबसे पहले इसी बात से पर्दा उठाते हैं कि:
शुरुआत करते हैं भैरव से
ज्यादातर लोग ‘भैरव’ नाम सुनते ही दिमाग में एक बहुत ही उग्र और डरावनी छवि बना लेते हैं : लाल धधकती आंखें, हाथ में नर-कपाल (खप्पर), गले में मुंडमाला और साथ में एक श्वान (कुत्ता)। लेकिन वास्तव में भैरव का रहस्य इससे कहीं अधिक गहरा और दार्शनिक है।
तंत्र शास्त्र और कश्मीर शैव दर्शन (विशेषकर त्रिक प्रणाली) में भैरव को किसी गौण या केवल डरावने देव के रूप में नहीं, बल्कि परमेश्वर शिव के ही पूर्ण और साक्षात् रूप (परब्रह्म) के रूप में स्वीकार किया गया है । शिव महापुराण में स्पष्ट लिखा है:
भैरवः पूर्णरूपोहि शङ्करस्य परात्मनः। मूढास्ते वै न जानन्ति मोहिताः शिवमायया॥
अर्थात्, भैरव साक्षात् परमात्मा शंकर के ही पूर्ण रूप हैं। जो लोग शिव की माया से मोहित हैं, वे अज्ञानी ही इस रहस्य को नहीं जान पाते।
वे समय (काल) के वास्तविक स्वामी हैं, इसलिए उन्हें “कालभैरव” कहा जाता है। कालभैरव के नियंत्रण में ही यह संपूर्ण चराचर जगत गतिशील है। अब प्रश्न उठता है कि भैरव एक हैं या आठ? सत्य यह है कि दोनों ही बातें पूर्णतः सत्य हैं। मूल महाकाल भैरव ने इस ब्रह्मांड की आठों दिशाओं की रक्षा, नियंत्रण और संतुलन बनाए रखने के लिए स्वयं को आठ विभिन्न रूपों में विभाजित किया, जिन्हें हम Ashta Bhairav के नाम से पूजते हैं।
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‘भैरव’ शब्द का असली मतलब और इसका महत्व
‘Ashta Bhairav’ नाम का आध्यात्मिक रहस्य और दार्शनिक पृष्ठभूमि
‘भैरव’ शब्द केवल एक नाम नहीं, अपितु ब्रह्मांड की परम शक्तियों का बीज सूत्र है। संस्कृत के त्रिक दर्शन के अनुसार, Ashta Bhairav नाम के तीन अक्षर सृष्टि की तीन सर्वोपरि सत्ताओं को दर्शाते हैं :
- ‘भ’ : भरण (सृष्टि की उत्पत्ति और रचनात्मक ऊर्जा का प्रतीक) ।
- ‘र’ : रमण (सृष्टि के पालन, संरक्षण और निरंतरता का प्रतीक) ।
- ‘व’ : वमन (सृष्टि का संहार, विलय और पुनर्जीवन का प्रतीक) ।
अर्थात्, भैरव ही वह सर्वोच्च चेतना हैं जो ब्रह्मांड का सृजन करते हैं, उसका पालन करते हैं और अंततः उसे अपने भीतर विलीन कर लेते हैं। जीवन के ये तीनों चक्र पूर्णतः उन्हीं के अधीन हैं ।
इसके अतिरिक्त, तंत्र ग्रंथों में इन्हें “अभय प्रदाता” (भय का नाश करने वाले) के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है । तंत्र का एक परम नियम है – “भय से ही भय का शमन होता है” । जैसे विष को काटने के लिए विष की आवश्यकता होती है, वैसे ही साधक के भीतर के गहरे भय (मृत्यु, दरिद्रता, शत्रु बाधा) को शांत करने के लिए Ashta Bhairav का यह उग्र और भीषण स्वरूप रक्षक कवच का कार्य करता है। वे अपने भक्तों के लिए परम दयालु और शत्रुओं के लिए परम काल हैं ।
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सनातन शास्त्रों और तंत्र आगमों में महाभैरव के प्राकट्य की तीन अत्यंत प्रसिद्ध कथाएं मिलती हैं, जो विभिन्न कल्पों और आध्यात्मिक व्यवस्थाओं को निरूपित करती हैं:
ब्रह्मा का अहंकार और कपाल मोचन तीर्थ (शिव महापुराण की कथा)
शिव महापुराण, लिंग पुराण और स्कंद पुराण के अनुसार, सृष्टि के आरंभ में सृष्टिकर्ता ब्रह्मा और पालनकर्ता विष्णु के मध्य अपनी श्रेष्ठता को सिद्ध करने के लिए एक भयंकर विवाद उत्पन्न हो गया । उसी समय दोनों के समक्ष एक अनंत प्रकाश का ज्योति स्तंभ (ज्योतिर्लिंग) प्रकट हुआ। शिव ने कहा कि जो भी इस स्तंभ के छोर को पहले ढूंढ लेगा, वही सर्वश्रेष्ठ होगा।
भगवान विष्णु नीचे पाताल की ओर गए, परंतु अंत न पाकर उन्होंने अपनी असमर्थता स्वीकार कर ली। परंतु ब्रह्मा ने हंस का रूप धारण कर ऊपर की ओर उड़ान भरी और कपट का सहारा लेते हुए केतकी पुष्प को झूठा साक्षी बनाकर दावा किया कि उन्होंने ज्योतिर्लिंग का ऊपरी छोर खोज लिया है।
ब्रह्मा के इस प्रचंड अहंकार और मिथ्याभाषण से क्रुद्ध होकर साक्षात् भगवान शिव अपनी दोनों भौहों के मध्य से (या मस्तक की क्रोधाग्नि से) कालभैरव के रूप में प्रकट हुए। शिव के आदेश पर, भैरव ने अपनी उंगली के तीखे नाखून से ब्रह्मा के उस पांचवें सिर को काट दिया जिसने असत्य वचन कहे थे।
ब्राह्मण का सिर काटने के कारण कालभैरव को ‘ब्रह्महत्या’ का महापाप लग गया, और ब्रह्मा का वह कटा हुआ कपाल (खोपड़ी) उनके बाएं हाथ से चिपक गया । इस पाप के प्रायश्चित और ब्रह्मांडीय संतुलन के लिए, शिव ने उन्हें तीनों लोकों में एक नग्न भिक्षुक (भिखारी रूप) के रूप में विचरण करने का आदेश दिया । भटकते हुए जब भैरव पवित्र नगरी काशी पहुंचे, तो ब्रह्महत्या का पाप उनसे अलग हो गया और ब्रह्मा का कपाल उनके हाथ से छूटकर भूमि पर गिर गया । वह स्थान आज भी काशी में ‘कपाल मोचन तीर्थ’ के नाम से विख्यात है। तत्पश्चात् शिव ने भैरव को काशी नगरी का मुख्य संरक्षक अर्थात् “कोतवाल” नियुक्त कर दिया।
2. माँ सती का देहत्याग और शक्तिपीठों की सुरक्षा
भैरव प्राकट्य का दूसरा इतिहास माता सती के आत्मदाह से जुड़ा है । राजा दक्ष के यज्ञ में अपने पति महादेव के अपमान से व्यथित होकर सती ने योगाग्नि में अपने प्राणों की आहुति दे दी । क्रोध और वियोग में शिव सती के पार्थिव शरीर को कंधे पर उठाकर ब्रह्मांड में तांडव करने लगे ।
सृष्टि के विनाश को रोकने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती की देह को 51 खंडों में विभाजित कर दिया, जो पृथ्वी के विभिन्न स्थानों पर गिरे और ‘शक्तिपीठ’ बने । भगवान शिव ने इन सभी 51 शक्तिपीठों की सुरक्षा और रक्षा प्रहरी के रूप में स्वयं को 51 भैरव रूपों में स्थापित किया । तंत्र शास्त्र के अनुसार, प्रत्येक शक्तिपीठ की साधना तब तक अधूरी है, जब तक वहां तैनात क्षेत्रपाल भैरव की पूजा न की जाए ।
3. देवासुर संग्राम और 64 भैरवों की उत्पत्ति
तीसरी पौराणिक गाथा के अनुसार, प्राचीन काल में असुर राज दहुरासुर ने कठोर तपस्या कर वरदान प्राप्त किया कि उसका वध केवल एक स्त्री ही कर सकती है। उसके अत्याचारों से त्रस्त होकर माता पार्वती ने महाकाली का उग्र रूप धारण किया और दानव का वध कर दिया।
वध के पश्चात् भी महाकाली की क्रोधाग्नि शांत नहीं हुई, जिससे संपूर्ण सृष्टि भयभीत हो उठी। उस भयंकर ऊर्जा को शांत करने के लिए वह क्रोध एक रोते हुए बालक के रूप में परिवर्तित हुआ, जिसे महाकाली ने स्तनपान कराया।
शिव ने वहां प्रकट होकर उस बालक और काली की दिव्य ऊर्जा को अपने भीतर विलीन किया, जिससे Ashta Bhairav प्रकट हुए। इन Ashta Bhairav रूपों का विवाह अष्ट मातृकाओं से हुआ। इन्हीं अष्ट भैरवों और अष्ट मातृकाओं से चौंसठ (64) भैरव और चौंसठ योगिनियों की उत्पत्ति हुई, जिन्होंने ब्रह्मांड की आसुरी शक्तियों का समूल नाश किया।
Ashta Bhairav और 64 भैरव गणों की जानकारी
आमतौर पर लोग केवल Ashta Bhairav या कालभैरव के बारे में ही जानते हैं, परंतु गहन तंत्र ग्रंथों में 64 भैरवों की पूरी सेना का विस्तृत वर्णन है । ये 64 भैरव 8 प्रमुख समूहों (गणों) में विभाजित हैं, और प्रत्येक समूह का नेतृत्व एक विशिष्ट Ashta Bhairav करते हैं । प्रत्येक समूह में 8 भैरव होते हैं :
| गण | मुखिया भैरव | इनका काम |
| असितांग गण | असितांग भैरव | सृजन और बुद्धि का संरक्षण | |
| रुरु गण | रुरु भैरव | न्याय और ज्ञान की व्यवस्था |
| चण्ड गण | चण्ड भैरव | युद्ध और ऊर्जा का नियंत्रण |
| क्रोध गण | क्रोध भैरव | दुष्ट शक्तियों का नाश |
| उन्मत्त गण | उन्मत्त भैरव | मानसिक बाधाओं का निवारण |
| कपाल गण | कपाल भैरव | काल और समय का प्रबंधन |
| भीषण गण | भीषण भैरव | नकारात्मक ऊर्जा से रक्षा |
| संहार गण | संहार भैरव | पापों और कर्मों का क्षय |
भारत में इन 64 भैरवों और 64 योगिनियों के ऐतिहासिक सिद्ध पीठ आज भी ऊर्जावान अवस्था में मौजूद हैं, जैसे मध्य प्रदेश के खजुराहो का 64 योगिनी मंदिर और ओडिशा के हीरापुर में स्थित योगिनी पीठ।
Ashta Bhairav का संपूर्ण परिचय :- दिशा, तत्व, ग्रह, नक्षत्र, मंत्र और साधना लाभ
Ashta Bhairav केवल दिशाओं के रक्षक नहीं हैं, बल्कि वे ब्रह्मांड के पंचतत्वों (आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी) और तीन आंतरिक शक्तियों (सूर्य, चंद्र, आत्मा) के जीवंत स्वरूप हैं।
श्री असितांग भैरव (पूर्व दिशा के स्वामी)
- प्राकृतिक तत्व : आकाश तत्व (Ether/Space Element)
- शारीरिक लक्षण व शस्त्र : श्वेत वर्ण, चार भुजाएं; हाथों में जपमाला, कमंडलु, खड्ग और कपाल पात्र।
- वाहन : इनका वाहन राजहंस है।
- दिव्य शक्ति (consort): देवी ब्राह्मणी (माँ सरस्वती का रूप)।
- ज्योतिषीय प्रभाव : गुरु (बृहस्पति) ग्रह; पुनर्वसु, विशाखा और पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र।
- रत्न : पीला पुखराज (Yellow Sapphire)।
- तांत्रिक बीज मंत्र :
ॐ ह्रीं ह्रामं ह्रीमं ह्रुं जं क्लां क्लीं क्लूं ब्राह्मी देवी समेत्याय असितांग भैरवाय सर्व शाप निवारित्याय ॐ ह्रीं फट् स्वाहा - साधना लाभ : रचनात्मक शक्तियों का विकास, लेखन, कला, संगीत और प्रतियोगी परीक्षाओं में एकाग्रता की प्राप्ति।
श्री रुरु भैरव (दक्षिण-पूर्व दिशा के स्वामी)
- प्राकृतिक तत्व: वायु तत्व (Air Element)
- शारीरिक लक्षण व शस्त्र : हल्का नीला/धूसर वर्ण, आभूषणों से सुसज्जित; हाथों में कुल्हाड़ी, हिरण, खड्ग और कपाल पात्र।
- वाहन : इनका वाहन वृषभ (बैल) है।
- दिव्य शक्ति (consort): देवी माहेश्वरी।
- ज्योतिषीय प्रभाव: शुक्र ग्रह; कृत्तिका, उत्तराषाढ़ा और उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र।
- रत्न : माणिक्य (Ruby)
- तांत्रिक बीज मंत्र:
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं श्रीं श्रीं क्लीं श्रीं सर्व राज वशीकराय सर्व जन मोहनाय सर्व वश्यं शीघ्रं शीघ्रं श्रीं क्लीं श्रीं स्वाहा - साधना लाभ: विद्या-बुद्धि में आ रही बाधाओं का निवारण, व्यापार में प्रचुर धन-संपदा और भौतिक ऐश्वर्य की प्राप्ति।
श्री चण्ड भैरव (दक्षिण दिशा के स्वामी)
- प्राकृतिक तत्व: अग्नि तत्व (Fire Element)
- शारीरिक लक्षण व शस्त्र : श्वेत वर्ण; हाथों में धनुष, बाण, तलवार और खप्पर।
- वाहन : इनका वाहन मयूर (मोर) है।
- दिव्य शक्ति (consort) : देवी कौमारी।
- ज्योतिषीय प्रभाव : मंगल ग्रह; मृगशिरा, चित्रा और धनिष्ठा नक्षत्र।
- रत्न : मूँगा (Coral)
- तांत्रिक बीज मंत्र:
ॐ ह्रीं सर्व शक्ति रूपाय नील वर्णाय महा चण्ड भैरवाय नमः - साधना लाभ: आत्मविश्वास में वृद्धि, शत्रुओं और अदालती मुकदमों पर पूर्ण विजय और शारीरिक बल का संचरण।
श्री क्रोध भैरव (दक्षिण-पश्चिम दिशा के स्वामी)
- प्राकृतिक तत्व: जल तत्व (Water Element)।
- शारीरिक लक्षण व शस्त्र : गहरा नीला वर्ण; हाथों में शंख, चक्र, गदा और खप्पर (भगवान विष्णु जैसी विशेषताएं)।
- वाहन : इनका वाहन विशाल गरुड़ है।
- दिव्य शक्ति (consort): देवी वैष्णवी।
- ज्योतिषीय प्रभाव: शनि ग्रह; रोहिणी, हस्त और श्रवण नक्षत्र। रत्न: मोती (Pearl)।
- तांत्रिक बीज मंत्र:
ॐ श्रीं श्रीं क्लीं सर्व विघ्न निवारणाय महा क्रोध भैरवाय नमः - साधना लाभ: शनि की ढैय्या/साढ़ेसाती के कुप्रभावों का शमन, पुराने रोगों से मुक्ति और जीवन में त्वरित निर्णय लेने की क्षमता ।
श्री उन्मत्त भैरव (पश्चिम दिशा के स्वामी)
- प्राकृतिक तत्व : पृथ्वी तत्व (Earth Element)
- शारीरिक लक्षण व शस्त्र : पीला सुवर्ण वर्ण; हाथों में तलवार, मूसल, ढाल और खप्पर।
- वाहन : इनका वाहन तीव्रगामी अश्व (घोड़ा) है।
- दिव्य शक्ति (consort): देवी वाराही (ज्वाला जी) ।
- ज्योतिषीय प्रभाव : बुध ग्रह; नक्षत्र: पुनर्वसु, विशाखा, अनुराधा और पूर्वा/उत्तराभाद्रपद ।
- तांत्रिक बीज मंत्र :
ॐ ह्रीं वाराही समेताय महा उन्मत्त भैरवाय ह्रीं ॐ स्वाहा - साधना लाभ : नकारात्मक आत्म-चर्चा पर नियंत्रण, डिप्रेशन (अवसाद) का नाश, और वक्तृत्व व व्यावसायिक बुद्धिमत्ता का विकास।
श्री कपाल भैरव (उत्तर-पश्चिम दिशा के स्वामी)
- प्राकृतिक तत्व : चंद्र तत्व (Moon/Lunar Energy)।
- शारीरिक लक्षण व शस्त्र : सुवर्ण-पीला वर्ण; हाथों में वज्र, पाश, खड्ग और कपाल पात्र।
- वाहन : इनका वाहन गज (हाथी) है।
- दिव्य शक्ति (consort) : देवी इंद्राणी ।
- ज्योतिषीय प्रभाव : चंद्रमा ग्रह; भरणी, पूर्वाषाढ़ा और पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र।
- रत्न : हीरा (Diamond) ।
- तांत्रिक बीज मंत्र :
ॐ ह्रीं क्रीं ह्रीं श्रीं कपाल भैरवाय नमः - साधना लाभ : व्यर्थ की भागदौड़ और अनुत्पादक कार्यों का अंत, कर्जों से पूर्ण मुक्ति और मानसिक शांति की प्राप्ति।
श्री भीषण भैरव (उत्तर दिशा के स्वामी)
- प्राकृतिक तत्व: सूर्य तत्व (Solar Energy)
- शारीरिक लक्षण व शस्त्र : गहरा लाल रक्त वर्ण, उग्र रूप; हाथों में तलवार, त्रिशूल, कपाल और मूसल।
- वाहन : इनका वाहन प्रेत (शव) है।
- दिव्य शक्ति (consort) : देवी चामुंडा।
- ज्योतिषीय प्रभाव : केतु ग्रह; आर्द्रा, स्वाति, शतभिषा, अश्विनी, मघा और मूल नक्षत्र।
- रत्न : लहसुनिया (Cat’s Eye)
- तांत्रिक बीज मंत्र :
ॐ ह्रीं भीषण भैरवाय सर्व शाप निवारणाय मम वशं कुरु कुरु स्वाहा - साधना लाभ : सभी प्रकार के अज्ञात भय, प्रेत बाधा, तांत्रिक अभिचार (काले जादू) के असर और केतु जनित दोषों का पूर्ण नाश।
श्री संहार भैरव (उत्तर-पूर्व दिशा के स्वामी)
- प्राकृतिक तत्व: आत्म तत्व (Soul/Consciousness Principle)
- शारीरिक लक्षण व शस्त्र : विद्युत सदृश नारंगी-पीला वर्ण, 10 भुजाएं; हाथों में त्रिशूल, डमरू, शंख, गदा, चक्र, खड्ग, खप्पर, खट्वांग, पाश और अंकुश।
- वाहन : इनका वाहन सिंह (या श्वान) है।
- दिव्य शक्ति (consort) : देवी चंडी (नरसिंही) ।
- ज्योतिषीय प्रभाव : राहु ग्रह; अश्लेषा, ज्येष्ठा और रेवती नक्षत्र।
- रत्न : गोमेद (Hessonite)।
- तांत्रिक बीज मंत्र :
ॐ नमो भगवते संहार भैरवाय भूत प्रेत पिशाच ब्रह्मराक्षसान् उच्चाटय उच्चाटय संहारय संहारय सर्व भय छेदनं कुरु कुरु स्वाहा - साधना लाभ : संचित बुरे कर्मों का समूल नाश, राहु की महादशा का निवारण और परम मोक्ष व दिव्य चेतना की प्राप्ति।
तीन विशिष्ट भैरव स्वरूप : जो मुख्य Ashta Bhairav से अलग हैं
मुख्य Ashta Bhairav के अतिरिक्त, कतिपय तांत्रिक संप्रदायों और लोक साधनाओं में तीन अन्य महत्वपूर्ण रूपों की व्यापक आराधना की जाती है:
1. श्री स्वर्णाकर्षण भैरव
इन्हें धन, समृद्धि, और कनक (सोने) का परम अधिपति देव माना जाता है। इनका वर्ण दमकते हुए लाल रंग का है और इनके वस्त्र पूर्णतः सुनहरे होते हैं। मस्तक पर अर्धचंद्र धारण करने वाले स्वर्णाकर्षण भैरव के बाएं हाथ में एक स्वर्ण-पात्र (अक्षय धन का घड़ा) होता है। मंगलवार के दिन इनकी विशेष साधना करने से साधक के घर से दरिद्रता का समूल नाश होता है और आकस्मिक धन की प्राप्ति होती है।
2. श्री बटुक भैरव
“बटुक” शब्द का अर्थ है ‘बालक’। यह भैरव देव का अत्यंत सौम्य, बाल स्वरूप है। इनकी साधना में कोई अत्यंत कड़े तांत्रिक नियम नहीं हैं, इसलिए गृहस्थ जीवन के लिए यह रूप सर्वोत्तम माना गया है। आकस्मिक संकटों के निवारण, बच्चों के स्वास्थ्य और नजर दोष से मुक्ति के लिए इनका निम्नलिखित मंत्र कल्पवृक्ष के समान है:
“ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाय कुरु कुरु बटुकाय ह्रीं”
3. श्री आकाश भैरव (शरभेश्वर)
तंत्र शास्त्रों में वर्णित यह भैरव देव का सर्वाधिक गोपनीय और उग्र रूप है, जिसमें वे आधा मनुष्य और आधा पक्षी के रूप में दिखाई देते हैं। इनकी 32 भुजाएं मानी गई हैं और ये शत्रुओं के भीषण प्रहार को पल भर में विफल करने के लिए पूजे जाते हैं । नेपाल में इनका अत्यंत प्रसिद्ध और जाग्रत मंदिर स्थित है।
Ashta Bhairav तांत्रिक साधना विधि : सही तरीका और सही वक़्त
Ashta Bhairav साधना कलयुग में सबसे तीव्र और तत्काल फल प्रदान करने वाली मानी गई है । चूंकि वे ‘उग्र देव’ हैं, इसलिए साधना में नियमों और समय का कठोरता से पालन करना आवश्यक है:
साधना का सर्वोत्तम समय और तिथियां
कालाष्टमी : प्रत्येक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि कालभैरव को समर्पित है।
काल भैरव जयंती : मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि वर्ष की सबसे शक्तिशाली रात्रि मानी जाती है, जिसे महाभैरव का प्राकट्य दिवस कहा जाता है।
निशीथ काल : भैरव रात्रि के स्वामी हैं, अतः इनकी साधना का सबसे प्रभावी समय रात्रि ११:०० बजे से मध्यरात्रि ३:०० बजे के बीच का होता है।
आवश्यक पूजन सामग्रियां
साधना चौकी पर लाल अथवा काले रंग का वस्त्र बिछाएं। सरसों के तेल का एक दीपक प्रज्वलित करें। भैरव जी को चमेली का फूल (Jasmine) अत्यंत प्रिय है, अतः चमेली के इत्र और पुष्पों का अर्पण करें। भोग के रूप में काले उड़द, उड़द की दाल के दही-बड़े, इमरती, जलेबी, भुने हुए चने और एक साबुत नारियल अर्पित किया जाता है।
Ashta Bhairav सुरक्षा कवच बनाने की गुप्त अनुष्ठान विधि
घर की नकारात्मक ऊर्जा, शत्रुओं के गुप्त षड्यंत्रों, और आकस्मिक विपदाओं से रक्षा के लिए आगम ग्रंथों में “Ashta Bhairav सुरक्षा कवच” निर्माण की एक अत्यंत प्रभावी और सुरक्षित विधि बताई गई है, जिसे कोई भी साधक घर पर कर सकता है :
- यंत्र की तैयारी: किसी भी कृष्ण पक्ष की अष्टमी या मंगलवार की रात्रि ११:०० बजे के बाद एकांत स्थान पर बैठें । तांबे की एक स्वच्छ प्लेट लें। काजल या लाल सिंदूर में चमेली का तेल मिलाकर अनामिका उंगली से प्लेट पर एक सरल चौकोर ‘भैरव यंत्र’ का निर्माण करें ।
- बीज मंत्र लेखन: उस यंत्र के ठीक मध्य में “ॐ कालभैरवाय नमः” लिखें ।
- दीपक की स्थापना: यंत्र के दाहिनी ओर मिट्टी या तांबे का दीपक रखें, जिसमें सरसों का तेल अथवा काले तिल का तेल भरा हो ।
- नेगेटिविटी एब्जॉर्बर: यंत्र के सम्मुख एक मुट्ठी साबुत काले उड़द या काले तिल की ढेरी बनाकर रख दें । ये बीज वातावरण की दूषित तरंगों और नकारात्मक ऊर्जा को सोखने का कार्य करते हैं ।
- मंत्र जप विधान: रुद्राक्ष की माला लेकर शांत चित्त से निम्नलिखित संरक्षण मंत्र की १ माला (१०८ बार) जाप करें :
“ॐ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाय कुरु कुरु बटुकाय ह्रीं ॐ” - दिशा संरेखण परिक्रमा: मंत्र जाप पूर्ण होने के बाद आसन से खड़े हो जाएं और उस यंत्र के सम्मुख खड़े होकर स्वतः ही स्थान पर ८ बार गोल घूमें (प्रदक्षिणा करें) । यह क्रिया Ashta Bhairav की आठों दिशाओं की ऊर्जा को आपके चारों ओर संरेखित करती है ।
- स्थापना स्थान: इस अभिमंत्रित यंत्र को अपने घर के मुख्य द्वार पर अंदर की तरफ स्थापित कर दें, अथवा अपने बटुए (वॉलेट) में रख लें । यह आपके चारों ओर एक अभेद्य आध्यात्मिक सुरक्षा घेरा बना देता है ।
Kashi Ashta Bhairav Yatra : भौगोलिक पीठों की संपूर्ण दर्शन गाइड
पवित्र नगरी काशी (वाराणसी) का भौगोलिक आकार अर्धचंद्राकार और त्रिकोणीय है। इस पावन नगरी की सुरक्षा के लिए साक्षात् महादेव ने आठों दिशाओं में अष्ट भैरवों की नियुक्ति की है। शास्त्रों के अनुसार, काशी की पंचक्रोशी यात्रा तब तक पूर्ण नहीं मानी जाती जब तक इन आठों के दर्शन न कर लिए जाएं। भक्तगण भोर ४:०० बजे से इस यात्रा को प्रारंभ करते हैं और दोपहर तक सारे दर्शन पूर्ण करते हैं।
स्थिति के अनुसार Ashta Bhairav मंदिरों की यात्रा मार्ग:
श्री रुरु भैरव (बांसफाटक)
स्थान व मार्ग: बांसफाटक की संकरी गलियों के भीतर, हनुमान घाट/कर्नाटक घाट मार्ग के निकट नरसिंगेश्वर मंदिर परिसर में विराजते हैं । यहाँ तक केवल ई-रिक्शा या पैदल ही पहुंचा जा सकता है ।
विशेषता: स्थानीय लोग इन्हें ‘आनंद भैरव’ भी कहते हैं । इनकी छवि पर एक सौम्य और शांत मुस्कान सुशोभित है, जो यात्रा की शुभ शुरुआत का प्रतीक है ।
श्री चण्ड भैरव (पांडेय हवेली / दुर्गा कुण्ड)
स्थान व मार्ग: दुर्गा कुंड मार्ग पर प्रसिद्ध पांडे हवेली क्षेत्र में, दुर्गा जी के भव्य मंदिर के भीतर छोटी काली माता की प्रतिमा के ठीक बगल में स्थापित हैं । यह मुख्य मार्ग पर होने के कारण ऑटो या पैदल सुगमता से सुलभ है ।
विशेषता: काले पत्थर की अत्यंत प्राचीन प्रतिमा है, जिसके दर्शन मात्र से साधक के भीतर साहस का अद्भुत संचार होता है ।
श्री असितांग भैरव (महामृत्युंजय मंदिर / हनुमान घाट)
स्थान व मार्ग: मैदागिन चौराहे के समीप, दारानगर स्थित विख्यात महामृत्युंजय मंदिर परिसर के भीतर धन्वंतरि कूप (औषधीय कुएं) के दाईं ओर विराजते हैं । (कतिपय प्राचीन परंपराओं में इनका एक विग्रह हनुमान घाट के निकट भी माना जाता है )।
विशेषता: यह क्षेत्र ‘कृत्तिवास क्षेत्र’ के अंतर्गत आता है । मान्यता है कि यहाँ की साधना कल्प गुना फल प्रदान करती है ।
श्री क्रोधन भैरव (कालिका गली, चौक)
स्थान व मार्ग: चौक बाज़ार की अत्यंत तंग और प्राचीन कालिका गली में स्थित कामाख्या देवी मंदिर की एक दीवार के गुप्त कोठर में स्थापित हैं । यहाँ केवल पैदल ही प्रवेश संभव है ।
विशेषता: इन्हें ‘आदि भैरव’ भी कहा जाता है । इनके दर्शन अत्यंत दुर्लभ हैं और केवल जो लोग इन्हें खोजना चाहते हैं, वही इनके दर्शन कर पाते हैं ।
श्री कपाल भैरव (लाट भैरव / मैदागिन)
स्थान व मार्ग: अलाइपुर / काजकपुरा क्षेत्र में, प्रसिद्ध लाट भैरव तालाब (कपाल मोचन तीर्थ) के समीप। मैदागिन से आशापुर जाने वाले मार्ग पर ऑटो या कार द्वारा यहाँ पहुँचा जा सकता है ।
विशेषता: इन्हें लोकभाषा में ‘लाट भैरव’ या ‘स्तंभ भैरव’ कहा जाता है, जो काशी के रक्षा स्तंभ माने जाते हैं।
श्री संहार भैरव (गाय घाट / हरिश्चंद्र घाट)
स्थान व मार्ग: पाटन दरवाजा क्षेत्र में, गाय घाट के समीप संकरी गलियों के भीतर । मछोदरी मार्ग से ई-रिक्शा द्वारा यहाँ सुगमता से पहुँचा जा सकता है ।
विशेषता: हरिश्चंद्र श्मशान घाट के निकट होने के कारण इनकी ऊर्जा परम वैराग्य और संचित पापों के नाश का प्रतिनिधित्व करती है ।
श्री भीषण भैरव (भूत भैरव गली / मणिकर्णिका घाट)
स्थान व मार्ग: मणिकर्णिका महाश्मशान घाट के समीप, ज्येष्ठेश्वर मंदिर के पास स्थित ‘भूत भैरव गली’ में । यहाँ केवल पैदल ही जाया जा सकता है ।
विशेषता: इन्हें स्थानीय स्तर पर ‘भूत भैरव’ कहा जाता है । महाश्मशान के निकट स्थित होने के कारण यहाँ की तांत्रिक तरंगें अत्यंत तीव्र होती हैं ।
श्री उन्मत्त भैरव (लाल चक / devra गाँव)
स्थान व मार्ग: यह काशी की भौगोलिक सीमा से बाहर, पंचक्रोशी मार्ग पर स्थित देवरा गाँव (लाल चक) में स्थापित हैं, जो मुख्य वाराणसी शहर से लगभग ३० किमी दूर स्थित है । यहाँ जाने के लिए एसी कैब या कार लेना अनिवार्य है ।
विशेषता: यात्रा का यह अंतिम पड़ाव साधक को परम उन्माद (आध्यात्मिक आनंद) प्रदान कर यात्रा को पूर्ण करता है ।
कश्मीर मंडल में Ashta Bhairav साधना : 1500 साल पुरानी परंपरा
कश्मीर मंडल और शैव तंत्र का भैरव पूजा से अत्यंत प्राचीन और ऐतिहासिक संबंध है। कश्मीर के ऐतिहासिक राजवंशों और कश्मीरी पंडितों की संस्कृति में भैरव देव को ‘क्षेत्रपाल’ (भूमि के रक्षक देव) के रूप में पूजा जाता है।
श्रीनगर की टाउन प्लानिंग और 8 Ashta Bhairav
छठी शताब्दी के राजतरंगिणी और अन्य ऐतिहासिक ग्रंथों के अनुसार, जब कश्मीर के राजा प्रवरसेन द्वितीय श्रीनगर नामक नवीन राजधानी का निर्माण कर रहे थे, तो वह क्षेत्र लगातार बाढ़, भीषण अग्निकांड और महामारियों से ग्रस्त हो जाता था। राजा ने इस विघ्न निवारण के लिए अपने इष्ट देव ‘वेताल भैरव’ की घोर तपस्या की।
वेताल भैरव के मार्गदर्शन में राजा ने संपूर्ण श्रीनगर को सुरक्षा के लिहाज़ से आठ विशिष्ट क्षेत्रों (Zones) में बाँट दिया और हर क्षेत्र की सीमा पर एक विशिष्ट भैरव मंदिर की स्थापना की :
- श्री अनदेश्वर भैरव (मैसूमा क्षेत्र के रक्षक)
- श्री भुक्कुटकेशवर भैरव (चट्टाबल क्षेत्र के रक्षक)
- श्री नंदकेश्वर भैरव (संबल क्षेत्र के रक्षक)
- श्री वेतालराज भैरव (डल झील क्षेत्र के रक्षक)
इसके साथ ही कश्मीर के 64 ग्रामीण अंचलों की सुरक्षा के लिए 64 क्षेत्रपाल भैरव मंदिरों की स्थापना की गई थी। आज भी कश्मीरी पंडितों के घर में होने वाले प्रत्येक यज्ञ, अनुष्ठान या विवाह के अंत में प्रसाद (नैवेद्य) का प्रथम अंश अनिवार्य रूप से ‘क्षेत्रपाल भैरव’ को अर्पित किया जाता है।
ज्योतिष शास्त्र में Ashta Bhairav साधना और ग्रहों की पीड़ा का आध्यात्मिक हल
वैदिक ज्योतिष में काल सर्प दोष, राहु-केतु की महादशा और शनि जनित कष्टों के निवारण के लिए Ashta Bhairav उपासना को ‘रामबाण’ माना गया है :
राहु दोष व काल सर्प दोष निवारण: कुंडली में राहु पीड़ित हो तो रविवार के दिन संध्या काल में किसी भैरव मंदिर में जाकर एक जटाधारी नारियल अर्पित करें और काले कुत्ते को मीठी रोटी या गुड़ के पुए खिलाएं। जप मंत्र: “ॐ भैरवाय राहु-रूपाय नमः”
शनि की साढ़ेसाती व ढैय्या: शनि देव के परम गुरु साक्षात् कालभैरव हैं। प्रत्येक शनिवार को सरसों के तेल का चौमुखा दीपक जलाकर “कालभैरवाष्टकम्” का पाठ करने से शनि की क्रूर दृष्टि शांत होती है।
केतु महादशा शांति: केतु जनित मानसिक भ्रम और अचानक दुर्घटनाओं से बचने के लिए बुधवार या अष्टमी को भीषण भैरव के नाम से सरसों के तेल का दीपक जलाना चाहिए।
अदालती मामले व भूमि विवाद: प्रत्येक मंगलवार की सुबह ठीक 6:00 बजे शुद्ध घी का दीपक जलाकर कालभैरवाष्टकम् का 3 बार पाठ करें।
Ashta Bhairav साधना के कड़े नियम और सावधानियां
Ashta Bhairav साधना जितनी तीव्र फल प्रदाता है, नियमों के उल्लंघन पर उतनी ही शीघ्र दुष्परिणाम भी दे सकती है :
श्वान (कुत्ते) की रक्षा: श्वान साक्षात् भैरव देव का दिव्य वाहन है। साधक को कभी भी किसी आवारा कुत्ते को मारना, प्रताड़ित करना या दुत्कारना नहीं चाहिए । ऐसा करने पर भैरव जी तत्काल कुपित हो जाते हैं । आवारा कुत्तों को नियमित भोजन देना ही उनकी सर्वोत्तम पूजा है।
गृहस्थों हेतु तामसिक भोग निषेध: यद्यपि अघोर और वाममार्गी साधनाओं में भैरव देव को मदिरा (शराब) और मांस का अर्पण किया जाता है, परंतु गृहस्थ साधकों को घर की सीमा में भूलकर भी तामसिक भोग नहीं चढ़ाना चाहिए । गृहस्थों के लिए केवल सात्विक नैवेद्य (खीर, इमरती, जलेबी, उड़द के बड़े) ही सर्वोत्तम और पूर्णतः सुरक्षित हैं।
शुद्धता व ब्रह्मचर्य: विशेष साधना अनुष्ठान के दिनों में लहसुन, प्याज, मांसाहार और मदिरा का सेवन पूरी तरह वर्जित होना चाहिए।
वस्त्रों का चयन: साधना काल में गहरे काले, नीले, जामुनी या लाल वस्त्र धारण करना शुभ माना जाता है, जो मानसिक एकाग्रता और साहस को बढ़ाते हैं।
निष्कर्ष
Ashta Bhairav की संपूर्ण अवधारणा केवल एक उग्र स्वरूप की पूजा नहीं है, बल्कि यह हमारे भीतर व्याप्त अज्ञान, अहंकार, आलस्य और मृत्यु के भय को नष्ट कर परम चैतन्य को जागृत करने का ब्रह्मांडीय विज्ञान है। जब साधक काल के स्वामी की शरण ग्रहण कर लेता है, तो समय उसका मित्र बन जाता है, और जीवन के सारे कष्ट स्वतः ही विलीन हो जाते हैं। श्रद्धा रखें, नियमों का पालन करें और महाभैरव की इस अभय ऊर्जा का अनुभव करें।
जय भैरव बाबा! ॐ कालभैरवाय नमः।




