Somvati Amavsya 2026 सोमवती अमावस्या तिथि, शुभ मुहूर्त, पितृ तर्पण और पूजा विधि

Somvati Amavsya 2026: सोमवती अमावस्या तिथि, शुभ मुहूर्त, पितृ तर्पण और पूजा विधि

Somvati Amavsya 2026 : सनातन धर्म की परंपराओं में अमावस्या तिथि को आध्यात्मिक शुद्धि, पितृ तर्पण और दान-पुण्य के लिए एक अत्यंत पवित्र दिन माना गया है। जब भी अमावस्या सोमवार के दिन पड़ती है, तो इसे ‘सोमवती अमावस्या’ के नाम से पुकारा जाता है। वर्ष 2026 में 15 जून को बनने वाला सोमवती अमावस्या का यह संयोग सामान्य से कहीं अधिक दुर्लभ और चमत्कारी है। इसका मुख्य कारण यह है कि यह अमावस्या ज्येष्ठ मास के ‘अधिक मास’ (जिसे पुरुषोत्तम मास या मलमास भी कहा जाता है) के अंतर्गत आ रही है।

ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार, अधिक मास और सोमवती अमावस्या का ऐसा अनूठा मिलन लगभग 30 वर्षों के बाद हो रहा है, जो इसे साधना और पितरों की तृप्ति के लिए एक अचूक अवसर बनाता है। इस विस्तृत रिपोर्ट में सोमवती अमावस्या से जुड़ी हर बारीक से बारीक जानकारी को बहुत ही सरल, व्यावहारिक और आम बोलचाल की हिंदी में प्रस्तुत किया गया है ताकि कोई भी सामान्य पाठक इसे बिना किसी कठिनाई के समझ सके और इसका लाभ उठा सके।

Somvati Amavasya Katha 2026: सोमवती अमावस्या की पौराणिक कथाएँ

Somvati Amavsya 2026 : पंचांग, तिथि और शुभ मुहूर्त का समय चक्र

हिंदू चंद्र पंचांग और सूर्य कैलेंडर के बीच के अंतर को पाटने के लिए हर बत्तीस या तैंतीस महीनों में एक अतिरिक्त महीना जोड़ा जाता है, जिसे अधिक मास कहा जाता है। वर्ष 2026 में यह अतिरिक्त महीना ज्येष्ठ के क्षेत्र में आ रहा है, जिसके कारण इस वर्ष के पंचांग में कुल तेरह महीने शामिल होंगे। इस प्रकार, मुख्य अमावस्या ज्येष्ठ अधिक मास की अमावस्या कहलाएगी।

इस महापर्व की सही तिथियों, समय और पंचांग के मुख्य तत्वों को नीचे दी गई तालिका में स्पष्ट रूप से व्यवस्थित किया गया है:

पंचांग घटकतिथि और समय (15 जून 2026)धार्मिक एवं ज्योतिषीय महत्व
अमावस्या तिथि का प्रारंभ14 जून, रविवार – दोपहर 12:19 बजे सेरविवार की दोपहर से ही अमावस्या की ऊर्जा सक्रिय हो जाएगी।
अमावस्या तिथि की समाप्ति15 जून, सोमवार – सुबह 08:23 बजे तकसोमवार की सुबह तिथि समाप्त होगी, लेकिन व्रत उदया तिथि में ही रहेगा।
मुख्य स्नान, दान और व्रत15 जून, सोमवार (उदया तिथि)सूर्योदय के समय अमावस्या तिथि होने के कारण यही दिन सर्वोत्तम है।
हिंदू मास और पक्षज्येष्ठ (अधिक मास), कृष्ण पक्षश्री हरि विष्णु को समर्पित पुरुषोत्तम मास का अंतिम दिन।
नक्षत्र और योगमृगशिरा नक्षत्र और शोभन योगसोमवार को मृगशिरा नक्षत्र होने से अमृत सिद्धि योग बनता है।
राहु काल (वर्जित समय)सुबह 07:08 से सुबह 08:52 तकइस समय किसी भी नई पूजा या शुभ अनुष्ठान का प्रारंभ न करें।

शास्त्रों में उदया तिथि का नियम अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। चूंकि 15 जून 2026 की सुबह सूर्योदय के समय अमावस्या तिथि विद्यमान रहेगी, इसलिए Somvati Amavsya का मुख्य व्रत, पवित्र नदियों में स्नान और दान इसी दिन किया जाना शास्त्र सम्मत है

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वर्ष 2026 की अन्य अमावस्या तिथियों से तुलना

यह समझना आवश्यक है कि Somvati Amavsya वर्ष में केवल एक या दो बार ही आती है, जो इसे नियमित मासिक अमावस्या से अलग बनाती है। वर्ष 2026 के पूरे चक्र में सोमवती अमावस्या की स्थिति को समझने के लिए निम्नलिखित तालिका का अवलोकन किया जा सकता है:

तिथि (वर्ष 2026)अमावस्या का नामसोमवती योग की स्थिति
18 जनवरी (रविवार)माघ (मौनी) अमावस्यासोमवती अमावस्या नहीं है।
17 फरवरी (मंगलवार)फाल्गुन अमावस्यासोमवती अमावस्या नहीं है।
19 मार्च (गुरुवार)चैत्र अमावस्यासोमवती अमावस्या नहीं है।
17 अप्रैल (शुक्रवार)वैशाख अमावस्यासोमवती अमावस्या नहीं है।
16 मई (शनिवार)ज्येष्ठ (निज) अमावस्यासोमवती अमावस्या नहीं है।
15 जून (सोमवार)ज्येष्ठ (अधिक) अमावस्याप्रथम सोमवती अमावस्या (दुर्लभ अधिक मास संयोग)।
14 जुलाई (मंगलवार)आषाढ़ अमावस्यासोमवती अमावस्या नहीं है।
12 अगस्त (बुधवार)श्रावण (हरियाली) अमावस्यासोमवती अमावस्या नहीं है।
11 सितंबर (शुक्रवार)भाद्रपद अमावस्यासोमवती अमावस्या नहीं है।
10 अक्टूबर (शनिवार)आश्विन (सर्वपितृ) अमावस्यासोमवती अमावस्या नहीं है।
09 नवंबर (सोमवार)कार्तिक अमावस्याद्वितीय सोमवती अमावस्या (दिवाली के समय)।
08 दिसंबर (मंगलवार)मार्गशीर्ष अमावस्यासोमवती अमावस्या नहीं है।

इस तालिका से स्पष्ट होता है कि पूरे वर्ष 2026 में केवल दो ही Somvati Amavsya के अवसर आ रहे हैं, जिनमें से 15 जून की तिथि अधिक मास के कारण सबसे अधिक शक्तिशाली और आध्यात्मिक मानी गई है।

ज्योतिषीय पारगमन और ग्रहों के विशेष योग

15 जून 2026 के दिन केवल अमावस्या की तिथि ही नहीं है, बल्कि इस दिन ग्रहों के कई बड़े बदलाव भी हो रहे हैं। इसी दिन सूर्य देव वृषभ राशि से निकलकर मिथुन राशि में प्रवेश करेंगे, जिसे ‘मिथुन संक्रांति’ कहा जाता है। संक्रांति का यह समय दोपहर 12:54 से लेकर सूर्यास्त तक रहेगा, जिसे पंचांग में ‘संक्रांति पुण्यकाल’ कहा गया है।

इस समय स्नान और दान करने से सूर्य जनित दोषों से मुक्ति मिलती है।इसके साथ ही, इस दिन सुबह 05:45 से लेकर शाम 07:08 तक ‘अमृत सिद्धि योग’ और ‘सर्वार्थ सिद्धि योग’ का एक साथ निर्माण हो रहा है। सोमवार के दिन जब मृगशिरा नक्षत्र का योग बनता है, तो इसे ज्योतिष शास्त्र में अमृत सिद्धि योग कहा जाता है। इस योग में किए गए कार्यों को ‘अमृत के समान फल’ देने वाला माना गया है। इस दिन गुरु (बृहस्पति) और शुक्र दोनों ही कर्क राशि में गोचर कर रहे होंगे, जो पारिवारिक सुख और समृद्धि के लिए एक अत्यंत शुभ स्थिति है।

अधिक मास (पुरुषोत्तम मास) के अनूठे नियम और उपाय

चूंकि यह अमावस्या अधिक मास की समाप्ति पर आ रही है, इसलिए इस दिन सामान्य अमावस्या की पूजा के अलावा कुछ विशेष व्यावहारिक और मानसिक बदलावों को करने की सलाह दी जाती है:

  • घड़ी को भीतर की ओर पहनना (एक मनोवैज्ञानिक बदलाव): ज्योतिषीय विशेषज्ञों के अनुसार, इस काल में अपनी कलाई की घड़ी को दाहिने हाथ में इस प्रकार पहनना चाहिए कि उसका डायल भीतर की ओर (हथेली की तरफ) रहे। ऐसा करने से व्यक्ति समय के प्रति अधिक जागरूक रहता है और कोई भी काम करने या बोलने से पहले थोड़ा रुकता है। यह छोटा सा बदलाव इस सुधारात्मक महीने में जल्दबाजी में होने वाली गलतियों से बचाता है।
  • हनुमान मंदिर में आध्यात्मिक पुस्तकों का दान: अधिक मास में केवल भौतिक वस्तुओं का ही नहीं, बल्कि ज्ञान का भी दान करना चाहिए। इस दिन हनुमान मंदिर में धार्मिक पुस्तकें (जैसे सुंदरकांड, हनुमान चालीसा या भगवद गीता) दान करने से व्यक्ति का मानसिक ध्यान मजबूत होता है और जीवन में स्थिरता आती है।
  • इष्ट देव के प्रति निरंतरता: जटिल और कठिन कर्मकांडों के पीछे भागने के बजाय, इस दिन अपने इष्ट देव के मंत्रों का सामान्य लेकिन निरंतर मानसिक जाप करना कहीं अधिक फलदायी होता है।

पीपल वृक्ष (अश्वत्थ) पूजन और 108 परिक्रमा की प्रामाणिक विधि

शास्त्रों में पीपल के पेड़ को साक्षात भगवान विष्णु का निवास स्थान माना गया है। सोमवती अमावस्या के दिन इस वृक्ष की पूजा का महत्व महाभारत काल से जुड़ा है, जब भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को इसके लाभ बताए थे।

इस दिन पीपल की जड़ के पास तुलसी का एक छोटा पौधा रखना चाहिए। पूजा की थाली में निम्नलिखित विशिष्ट वस्तुएं अवश्य होनी चाहिए:

  • अभिषेक के लिए: कच्चा दूध, दही, शुद्ध गंगाजल, चंदन, अक्षत और हल्दी।
  • परिक्रमा के लिए: 108 लंबे कच्चे सूत के धागे (मौली) या पीला धागा।
  • अर्पण के लिए: ऋतु फल (जैसे आम, केला), सुहाग सामग्री (सिंदूर, चूड़ियां, बिंदी) और कोई भी 108 खाने की वस्तुएं (जैसे मखाने, बताशे या सूखे मेवे)।

परिक्रमा करते समय प्रत्येक चक्कर के साथ एक फल या मेवा अलग थाली में रखते जाएं। जब 108 परिक्रमा पूर्ण हो जाएं, तो इन सभी 108 सामग्रियों को किसी योग्य वेदपाठी ब्राह्मण या जरूरतमंद महिला को श्रद्धापूर्वक दान कर देना चाहिए।

घर पर पितृ तर्पण की प्रामाणिक एवं व्यावहारिक विधि

अमावस्या के दिन पितरों की आत्मिक शांति के लिए किया जाने वाला ‘तर्पण’ हमारे जीवन के कई संकटों और कुंडली के पितृ दोष को दूर करता है। तर्पण की प्रक्रिया को घर पर ही अत्यंत शुद्धता के साथ करने के लिए नीचे दिए गए नियमों का पालन किया जाना चाहिए:

तर्पण की आवश्यक सामग्री

एक तांबे या चांदी के पात्र में शुद्ध जल लें। इसके साथ ही कुशा घास (दर्भा), काले तिल (पितरों के लिए), जौ (ऋषियों के लिए), सफेद चंदन, अक्षत और जौ के दाने पास रख लें।

तर्पण की दिशाएं और विधि

तर्पण की प्रक्रिया में दिशा और जनेऊ (यदि धारण करते हैं) की स्थिति का बहुत महत्व होता है:

तर्पण की श्रेणीसाधक का मुखजनेऊ की स्थितिउपयोग की जाने वाली सामग्रीअंजलि देने का माध्यम
देव तर्पणपूर्व दिशाबाएं कंधे पर (सव्य)शुद्ध जल और अक्षतउंगलियों के अग्र भाग से जल गिराना।
ऋषि तर्पणउत्तर दिशागले में माला की तरह (निवीत)शुद्ध जल और जौकनिष्ठिका (छोटी उंगली) के मूल से जल गिराना।
पितृ तर्पणदक्षिण दिशादाएं कंधे पर (अपसव्य)शुद्ध जल, कुशा और काले तिलअंगूठे और तर्जनी के मध्य भाग से जल गिराना।

तर्पण करते समय पुरुष पूर्वज के लिए “तस्मै स्वधा” और महिला पूर्वज के लिए “तस्यै स्वधा” का उच्चारण करना चाहिए। अंत में दोनों हथेलियों को साफ पानी से धोकर पितरों से परिवार की उन्नति की प्रार्थना करनी चाहिए।

पंचबलि कर्म का वैज्ञानिक और आध्यात्मिक रहस्य

तर्पण के पश्चात पितरों के निमित्त बनाए गए भोजन से पांच विशेष जीवों के लिए भोग निकाला जाता है। यह कोई अंधविश्वास नहीं है, बल्कि हमारे प्राचीन ऋषियों द्वारा प्रकृति के पांच तत्वों के प्रति आभार व्यक्त करने का एक वैज्ञानिक तरीका है:

बलि का नामकिसे दी जाती हैदिशा और स्थानपंचतत्व का संबंधज्योतिषीय एवं आध्यात्मिक लाभ
गोबलि (Go Bali)गाय कोघर की पश्चिम दिशा में पलाश के पत्तों परपृथ्वी तत्वगाय में सभी देवताओं का वास होता है। इससे कुंडली में गुरु और शुक्र मजबूत होते हैं और वैतरणी नदी पार करने की शक्ति मिलती है।
श्वानबलि (Shwan Bali)कुत्ते कोघर के बाहर पत्तल या भूमि परजल तत्वकुत्ता यमराज और भैरव का प्रतीक है। यह केतु के अशुभ प्रभाव, शत्रुओं और अदृश्य बाधाओं से रक्षा करता है।
काकबलि (Kak Bali)कौए कोघर की छत या किसी ऊंचे स्थान परवायु तत्वकौआ यम का दूत माना जाता है। यदि कौआ भोजन खा ले, तो माना जाता है कि पितर सीधे तृप्त हो गए हैं।
देवबलि (Dev Bali)देवताओं कोअग्नि में आहुति देकर (कंडे या उपले पर)आकाश तत्वयह अदृश्य ब्रह्मांडीय शक्तियों और देवों को तृप्त कर घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है।
पिपीलिकाबलि (Ant Bali)चींटियों कोपेड़ के नीचे या जमीन परअग्नि तत्वचीनी मिश्रित आटा चींटियों को खिलाने से संचित कर्मों के ऋणों से मुक्ति मिलती है।

सोमवती अमावस्या के कड़े नियम: क्या करें और क्या न करें

इस पावन और ऊर्जावान दिन पर कुछ कार्यों को करना अत्यंत शुभ माना गया है, वहीं कुछ कार्यों को करने की सख्त मनाही है:

क्या करना अनिवार्य है (Dos)मौन स्नान:

  • मौन स्नान: सूर्योदय से पहले मौन रहकर स्नान करें, इससे मन की चंचलता समाप्त होती है।
  • श्वेत वस्तुओं का दान: सोमवार चंद्र देव का दिन है, इसलिए इस दिन गरीबों को दूध, चावल, दही, मिश्री या सफेद वस्त्रों का दान अवश्य करें।
  • सात्विक जीवन: पूरे दिन केवल सात्विक विचारों को मन में रखें और परिवार के बड़ों का आशीर्वाद लें।

क्या करना पूर्णतः वर्जित है (Don’ts)मांगलिक कार्यों का निषेध:

अधिक मास के अंतर्गत आने के कारण इस दिन नए व्यापार की शुरुआत, गृह प्रवेश, मुंडन, सगाई या विवाह जैसे कार्य भूलकर भी न करें।

  • तामसिक पदार्थों का त्याग: इस दिन लहसुन, प्याज, मांस, मदिरा या किसी भी प्रकार के नशे से पूरी तरह दूर रहें।
  • शरीर की शुद्धि: अमावस्या के दिन बाल कटवाना, दाढ़ी बनाना या नाखून काटना पूरी तरह वर्जित माना गया है।
  • कलह से बचें: इस दिन घर में किसी भी प्रकार का वाद-विवाद या अपशब्दों का प्रयोग न करें, अन्यथा पितर रुष्ट होकर वापस लौट जाते हैं।

निष्कर्ष

15 जून 2026 को आने वाली यह सोमवती अमावस्या केवल एक पंचांग तिथि नहीं है, बल्कि ग्रहों के दुर्लभ संयोगों, अधिक मास के आध्यात्मिक प्रभावों और त्रिदेवों की सामूहिक कृपा प्राप्त करने का एक अत्यंत पावन झरोखा है। इस दिन किए गए छोटे-छोटे सरल उपाय, जैसे पीपल की परिक्रमा, पंचबलि भोग और मौन स्नान, न केवल जातक के व्यक्तिगत जीवन की बाधाओं को दूर करते हैं, बल्कि पितरों की परम तृप्ति सुनिश्चित कर पूरे परिवार को दीर्घायु, सुखी दांपत्य और अखंड समृद्धि का वरदान देते हैं। इस पावन अवसर का उपयोग अपनी आंतरिक शुद्धि और लोक-कल्याण के लिए अवश्य किया जाना चाहिए।

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