Kalashtami Vrat 2026 : क्या आप जानते हैं कि हिंदू धर्म में भगवान शिव के सबसे अनोखे और जाग्रत रूप – भगवान काल भैरव की पूजा के लिए कौन सा दिन सबसे खास माना जाता है? उस दिन को हम Kalashtami (कालाष्टमी) कहते हैं. इसे काल अष्टमी या महाकाल भैरव अष्टमी के नाम से भी जाना जाता है। हर महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को पूरी श्रद्धा के साथ Kalashtami Vrat रखा जाता है। सालभर में कुल 12 मासिक कालाष्टमी व्रत आते हैं।
इन सभी में मार्गशीर्ष महीने (या कार्तिक महीने) की अष्टमी तिथि का सबसे ज्यादा महत्व होता है, जिसे ‘काल भैरव जयंती’ या ‘भैरव अष्टमी’ कहा जाता है। माना जाता है कि इसी दिन दुनिया में न्याय और धर्म को बचाने के लिए खुद भगवान शिव ने काल भैरव का रूप लिया था।
अगर आप अपने जीवन से डर, संकट और परेशानियों को दूर करना चाहते हैं, तो यह लेख आपके लिए ही है। यहाँ हम आपको बहुत ही आसान भाषा में Kalashtami Puja Vidhi, व्रत कथा, इसके नियम, देश के सबसे प्रसिद्ध मंदिरों की लिस्ट और साल Kalashtami 2026 की पूरी तारीखें बता रहे हैं।
Kalashtami क्या है और काल भैरव का असल मतलब क्या है?
काल भैरव को सिर्फ गुस्सा करने वाले देवता के रूप में देखना सही नहीं है। तंत्र शास्त्र और ‘विज्ञान भैरव तंत्र’ के अनुसार, वे असल में परम सत्य और समय के देव हैं।
- ‘काल’ का मतलब होता है समय (Time) और मृत्यु (Death), जो हर चीज का अंत तय करता है।
- ‘भैरव’ का मतलब होता है ‘भयानक रूप वाला’, लेकिन इसका एक और सुंदर अर्थ है – ‘भय को जड़ से मिटाने वाला’।
एक आसान तांत्रिक परिभाषा में ‘भैरव’ शब्द 3 अक्षरों से मिलकर बना है:
- भ (Bha): सृष्टि को बनाने वाला (Srishti Creator)।
- र (Ra): सृष्टि को पालने वाला (Preserver)।
- व (Va): सृष्टि को मिटाने वाला (Destroyer)।
यानी वे खुद पूरी सृष्टि और समय के पहिये को चलाते हैं। भगवान शिव के मुख्य रूप से दो रूप हैं – पहला ‘बटुक भैरव’ जो बहुत ही शांत और प्यारे बाल रूप हैं; और दूसरा ‘काल भैरव’ जो न्याय करने वाले और रौद्र रूप हैं।
बौद्ध और जैन धर्म में भी है इनका महत्व
आपको जानकर हैरानी होगी कि काल भैरव की पूजा सिर्फ हिंदू धर्म तक सीमित नहीं है। बौद्ध धर्म के वज्रयान संप्रदाय में इन्हें एक बहुत ताकतवर रक्षक देव (धर्मपाल) माना जाता है, जहाँ उन्हें हेरुक, वज्रभैरव, महाकाल या यमान्तक कहा जाता है। वे इन्हें मंजुश्री का उग्र रूप मानते हैं। नेपाल, तिब्बत, चीन और मंगोलिया में भी लोग अपने भीतर के गुस्से और लालच जैसी बुराइयों को खत्म करने के लिए इनका ध्यान करते हैं।
Kalashtami Vrat Puja Samagri List: पूजा के लिए जरूरी चीजों की पूरी लिस्ट
अगर आप Kalashtami के दिन घर पर पूजा करना चाहते हैं, तो बाजार जाने से पहले पूजा सामग्री की यह लिस्ट जरूर नोट कर लें ताकि कोई भी चीज छूट न जाए:
- मुख्य तस्वीरें/मूर्तियाँ: भगवान काल भैरव, भगवान शिव और माता पार्वती की तस्वीर या मूर्ति।
- आसन और चौकी: लकड़ी की चौकी (पाट) और उसे ढकने के लिए साफ लाल या पीला कपड़ा।
- दीपक और तेल: सरसों का तेल या तिल का तेल, मिट्टी का चौमुखी दीपक और रुई की बत्ती।
- पूजा के बुनियादी तत्व: गंगाजल, शुद्ध जल, कलावा (मौली), कुमकुम, हल्दी, लाल चंदन और अक्षत (बिना टूटे हुए चावल)।
- फूल और माला: लाल रंग के फूल, अकौन (मदार) के फूल और फूलों की माला।
- विशेष वस्तुएं: नारियल, नींबू, पान का पत्ता, सुपारी, काले तिल और साबुत उड़द की दाल।
- सुगंध और कपूर: धूपबत्ती, अगरबत्ती और कपूर।
- भोग की सामग्री: सवा 1 किलो जलेबी या इमरती, मीठे गुलगुले, आटे से बना मीठा रोट और ऋतु फल।
Kalashtami Vrat Katha: काल भैरव के जन्म की पौराणिक कहानी
Kalashtami Vrat के शुरू होने और काल भैरव के प्रकट होने की कहानी शिव महापुराण और स्कंद पुराण में मिलती है।
ब्रह्मा जी का घमंड और शिव जी का गुस्सा
एक बार की बात है, स्वर्ग लोक में ब्रह्मा जी और विष्णु जी के बीच इस बात को लेकर बहस छिड़ गई कि दोनों में से कौन ज्यादा महान है। इस बात का फैसला करने के लिए सभी देवी-देवताओं और ऋषि-मुनियों की एक बड़ी सभा बुलाई गई। वेदों के ज्ञान के आधार पर सभा ने फैसला सुनाया कि भगवान शिव ही सबसे बड़े और परम सत्य हैं।
भगवान विष्णु ने तो इस फैसले को खुशी-खुशी मान लिया, लेकिन ब्रह्मा जी अपने 5 मुखों के घमंड में चूर थे। उन्होंने भगवान शिव के बारे में बहुत भला-बुरा और अपमानजनक कह दिया। ब्रह्मा जी का यह घमंड देखकर शांत रहने वाले शिव जी को बहुत गुस्सा आया। उनके इसी गुस्से से उनके माथे (भृकुटी) के बीच से काले रंग के, भयानक रूप वाले काल भैरव प्रकट हुए। शिव जी के कहने पर, काल भैरव ने अपनी उंगली के नाखून से ब्रह्मा जी के उस पांचवें सिर को काट दिया जिससे उन्होंने शिव जी का अपमान किया था। इसके बाद ब्रह्मा जी का घमंड टूट गया और उन्होंने तुरंत अपनी भूल मानकर क्षमा मांग ली।
ब्रह्मा जी का सिर काटने के कारण काल भैरव पर ‘ब्रह्महत्या’ का बहुत बड़ा पाप लग गया। वह कटा हुआ सिर (कपाल) काल भैरव के बाएं हाथ से चिपक गया और लाख कोशिशों के बाद भी अलग नहीं हुआ। तब शिव जी ने उन्हें इसका उपाय बताया कि वे तीनों लोकों में एक साधारण भिक्षुक बनकर घूमें और भिक्षा मांगें।
कई सालों तक भटकने के बाद, जैसे ही काल भैरव ने शिव जी की सबसे प्यारी नगरी काशी (वाराणसी) में कदम रखा, वह सिर उनके हाथ से छूटकर गिर गया और वे पाप से मुक्त हो गए। आज उस जगह को ‘कपाल मोचन तीर्थ’ कहा जाता है। इसके बाद शिव जी ने उन्हें काशी का ‘कोतवाल’ (मुख्य रखवाला) बना दिया, जो सभी इंसानों के अच्छे-बुरे कर्मों का फैसला करते हैं। इनके हाथ में दंड (डंडा) होने की वजह से इन्हें ‘दंडपाणि’ भी कहा जाता है।
स्कंद पुराण के अनुसार, जब सती माता के शरीर के 52 टुकड़े पृथ्वी पर अलग-अलग जगह गिरे, तो वहां ‘शक्तिपीठ’ बन गए। शिव जी ने इन सभी शक्तिपीठों की सुरक्षा के लिए काल भैरव को हर जगह ‘क्षेत्रपाल’ यानी गार्ड के रूप में तैनात किया। इसलिए कहा जाता है कि जब तक आप शक्तिपीठ के साथ वहां के भैरव मंदिर के दर्शन नहीं करते, तक तक आपकी यात्रा पूरी नहीं होती।
अष्टभैरव: काल भैरव के 8 मुख्य रूप
शास्त्रों के अनुसार काल भैरव के 8 मुख्य रूप हैं, जिन्हें ‘अष्टभैरव‘ कहा जाता है। ये सभी अलग-अलग दिशाओं की रक्षा करते हैं:
| क्रम संख्या | अष्टभैरव का नाम | दिशा | आध्यात्मिक और भौतिक प्रभाव |
| 1 | असितांग भैरव | पूर्व | ये बहुत शांत रूप हैं, जो कला, बुद्धि और नए मौके देते हैं। |
| 2 | रुरु भैरव | दक्षिण-पूर्व | ये गुरु के समान हैं, जो सच्चा ज्ञान और समझ बढ़ाते हैं। |
| 3 | चंड भैरव | दक्षिण | ये बहुत उग्र हैं, जो दुश्मनों को हराने की हिम्मत देते हैं। |
| 4 | क्रोध भैरव | दक्षिण-पश्चिम | ये आलस को दूर कर काम में तेजी लाते हैं। |
| 5 | उन्मत्त भैरव | पश्चिम | ये खुशी और ध्यान के देवता हैं, जो अहंकार मिटाते हैं। |
| 6 | कपाल भैरव | उत्तर-पश्चिम | ये जीवन के फालतू के बंधनों और बेकार के कामों को खत्म करते हैं। |
| 7 | भीषण भैरव | उत्तर | ये बुरी नजर, भूत-प्रेत और बुरे सपनों से सुरक्षा कवच की तरह बचाते हैं। |
| 8 | संहार भैरव | उत्तर-ईशान | ये पुराने बुरे कर्मों को मिटाकर मोक्ष का रास्ता खोलते हैं। |
भारत के 5 सबसे प्राचीन और प्रसिद्ध काल भैरव मंदिर (Famous Kal Bhairav Temples in India)
अगर आप काल भैरव के दर्शन करना चाहते हैं या उनके बारे में गहराई से जानना चाहते हैं, तो आपको भारत के इन 5 सबसे प्राचीन और चमत्कारी मंदिरों के बारे में जरूर पता होना चाहिए:
1. काशी काल भैरव मंदिर, वाराणसी (उत्तर प्रदेश) – काशी के कोतवाल
वाराणसी के गोलघर इलाके में स्थित यह मंदिर देश के सबसे प्राचीन और शक्तिशाली भैरव मंदिरों में से एक माना जाता है। इन्हें ‘काशी का कोतवाल’ कहा जाता है। मान्यता है कि भगवान विश्वनाथ के दर्शन तब तक पूरे नहीं माने जाते जब तक आप काल भैरव के दर्शन न कर लें। इस मंदिर का निर्माण 17वीं शताब्दी में मराठा कमांडर सरदार विंचुरकर ने करवाया था। यहाँ सुरक्षा के लिए भक्तों की कलाई पर काले रंग का ‘भैरव रक्षा सूत्र’ बांधा जाता है।
2. काल भैरव मंदिर, उज्जैन (मध्य प्रदेश) – मदिरा पीने वाले बाबा
शिप्रा नदी के तट पर स्थित यह मंदिर अपने अनोखे चमत्कार के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है। यहाँ भगवान काल भैरव को साक्षात् मदिरा (शराब) का भोग लगाया जाता है। जब पुजारी मदिरा का प्याला बाबा के होठों से लगाते हैं, तो वह मदिरा गायब हो जाती है। इस मंदिर का इतिहास बहुत पुराना है, माना जाता है कि इसे राजा भद्रसेन ने बनवाया था और बाद में पानीपत की तीसरी लड़ाई (1761 CE) के बाद मराठा सेनापति महादजी शिंदे ने इसका जीर्णोद्धार करवाया था।
3. किलकारी भैरव मंदिर, नई दिल्ली – पांडवों द्वारा स्थापित मंदिर
पुरानी दिल्ली में पुराना किला के पास स्थित किलकारी भैरव मंदिर एक अत्यंत ऐतिहासिक स्थल है। माना जाता है कि द्वापर युग में पांडवों (विशेषकर भीमसेन) ने इस मंदिर की स्थापना की थी। यहाँ बाबा की प्रतिमा के केवल नयन (आँखें) दिखाई देती हैं। यहाँ भी भैरव बाबा को शराब चढ़ाने की परंपरा है और मंदिर के दो मुख्य हिस्से हैं – एक किलकारी भैरव और दूसरे बटुक भैरव।
4. महाभैरव मंदिर, तेजपुर (असम) – 8वीं से 10वीं शताब्दी का इतिहास
असम के तेजपुर में पहाड़ी की चोटी पर स्थित यह मंदिर अपनी ऐतिहासिक भव्यता के लिए जाना जाता है। इस प्राचीन मंदिर का निर्माण 8वीं से 10वीं शताब्दी के दौरान सालस्तंभ राजवंश के शासकों द्वारा करवाया गया था। इस मंदिर में बहुत विशाल और चमत्कारी शिवलिंग स्थापित है, जिसे काल भैरव का रूप मानकर पूजा जाता है। यह पूरे पूर्वोत्तर भारत में शिव और भैरव साधना का एक बहुत बड़ा केंद्र है।
5. केदारनाथ भैरवनाथ मंदिर, रुद्रप्रयाग (उत्तराखंड) – केदार घाटी के रक्षक
यह अनोखा मंदिर केदारनाथ धाम के मुख्य मंदिर से कुछ दूरी पर पहाड़ी पर स्थित है। इन्हें केदारनाथ का क्षेत्रपाल कहा जाता है। सर्दियों में जब केदारनाथ मंदिर के कपाट बंद हो जाते हैं, तब केदार घाटी की रक्षा की जिम्मेदारी इसी मंदिर के भैरवनाथ जी की होती है। केदारनाथ यात्रा पर जाने वाले भक्त यहाँ आकर बाबा भैरवनाथ के दर्शन जरूर करते हैं।
Shani, Rahu और Ketu का काल भैरव से क्या है ज्योतिष कनेक्शन?
एस्ट्रोलॉजी यानी ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, काल भैरव की पूजा करने से कुंडली के सबसे बड़े ग्रह दोष भी दूर हो जाते हैं:
- शनि दोष से मुक्ति: क्या आप जानते हैं कि शनि देव खुद काल भैरव को अपना गुरु मानते हैं? यही वजह है कि जिन लोगों पर शनि की ढैय्या, साढ़ेसाती या महादशा चल रही है, उन्हें कालाष्टमी के दिन काल भैरव की आराधना जरूर करनी चाहिए। इससे शनि के कष्टों में तुरंत आराम मिलता है।
- राहु और केतु का भय खत्म: राहु और केतु छाया ग्रह हैं, जो इंसान के मन में भ्रम, अज्ञात भय और अचानक नुकसान पैदा करते हैं। काल भैरव के उग्र और जाग्रत प्रभाव के कारण, राहु-केतु की नकारात्मक ऊर्जा शांत हो जाती है। Kalashtami Par Kaal Bhairav को काले तिल और सरसों का तेल चढ़ाने से इन दोनों ग्रहों के बुरे प्रभाव खत्म होते हैं।
Kalashtami Vrat का खास नियम: रात के समय का महत्व
Kalashtami Ke Vrat की तारीख तय करने के लिए पंचांग का एक बहुत ही बारीक नियम काम करता है, जिसे ‘रात्रि व्यापिनी अष्टमी’ कहते हैं।
चूंकि काल भैरव रात के देवता हैं, इसलिए उनकी मुख्य पूजा मध्यरात्रि (निशिता काल) या सूर्यास्त के तुरंत बाद (प्रदोष काल) की जाती है। इसलिए, Kalashtami Vrat उसी दिन रखा जाता है जिस दिन अष्टमी तिथि रात के समय मौजूद हो। अगर अष्टमी तिथि दिन में शुरू होकर शाम या रात से पहले ही खत्म हो जाए, तो व्रत उस दिन नहीं बल्कि पिछले दिन (जब रात को अष्टमी हो) रखा जाता है।
कैसा है काल भैरव का रूप और उनका क्या मतलब है?
काल भैरव का रूप देखने में भले ही डरावना लगे, लेकिन इसके पीछे गहरे आध्यात्मिक मतलब छिपे हैं:
- काला या गहरा नीला रंग: यह इस बात का प्रतीक है कि वे अनंत आकाश की तरह हैं, जिसमें पूरी सृष्टि समा सकती है।
- व्याघ्र चर्म और अस्थि आभूषण: यह दिखाता है कि उन्होंने मौत के डर पर पूरी तरह जीत पा ली है।
- हाथों में हथियार: त्रिशूल, डमरू, तलवार और कपाल (नरमुंड) यह दर्शाते हैं कि वे समय, अज्ञान और इंसानी अहंकार को खत्म करने वाले हैं।
- मदिरा का भोग: तांत्रिक पूजा में उन्हें मदिरा चढ़ाई जाती है, जिसका मतलब यह है कि हमारी अंदरूनी बुराइयाँ (गुस्सा, नशा, मोह) हम भगवान के चरणों में सौंपकर खुद को शुद्ध कर रहे हैं।
श्वान (कुत्ते) का गहरा दिमागी और आध्यात्मिक सच
वैदिक साहित्य के अनुसार ‘श्वा’ का अर्थ होता है ‘कल’ (जो बीत चुका है या जो आने वाला है) और ‘न’ का अर्थ है ‘नहीं’। इसलिए ‘श्वान’ (कुत्ता) वह जीव है जो न तो बीते हुए कल में जीता है और न ही आने वाले कल में—वह सिर्फ और सिर्फ ‘आज’ यानी वर्तमान पल में जीता है। यह हमें काल भैरव का संदेश देता है कि खुश रहने के लिए केवल वर्तमान क्षण में जीना सीखें।
अलग-अलग राज्यों में कैसे मनाई जाती है Kalashtami?
भारत और इसके आस-पास के देशों में कालाष्टमी मनाने के बहुत ही अनोखे तरीके हैं:
- वाराणसी (काशी) की कोतवाल पूजा: वाराणसी में काल भैरव को पूरे शहर का रखवाला माना जाता है। इस दिन गरीबों को खाना खिलाना और कपड़े दान करना बहुत अच्छा माना जाता है।
- महाराष्ट्र की दीवार पूजा: यहाँ लोग घर की दीवार पर सिंदूर से भगवान शिव और चंद्र देव की आकृति बनाते हैं और 8 दीये जलाते हैं। भोग में उड़द दाल के वड़े और मीठे पुए चढ़ाए जाते हैं।
- उज्जैन का तांत्रिक अनुष्ठान: उज्जैन के प्रसिद्ध मंदिर में काल भैरव को मदिरा पिलाई जाती है। यहाँ इस दिन विशेष भस्म आरती और कालसर्प दोष पूजा भी होती है।
- नेपाल का ‘भैरव नाच’: काठमांडू में लोग पारंपरिक मुखौटे पहनकर ‘भैरव नाच’ करते हैं और अपनी तांत्रिक विद्याओं की झांकी दिखाते हैं।
Kalashtami Puja Vidhi: घर पर कैसे करें काल भैरव की पूजा?
अगर आप घर पर कालाष्टमी की पूजा करना चाहते हैं, तो इन आसान स्टेप्स को फॉलो करें:
पंच-तेल का विशेष नियम (दीपक जलाना)
भगवान भैरव के सामने 5 मिट्टी के दीये जलाएं। कोशिश करें कि इन दीयों में अलग-अलग तेल हों:
- सरसों का तेल: कोर्ट-कचहरी और दुश्मनों से राहत के लिए।
- तिल का तेल: शनि और राहु-केतु के दोष दूर करने के लिए।
- नीम का तेल: सेहत अच्छी रखने और बीमारी दूर करने के लिए।
- चमेली का तेल: मन की शांति और खुशियों के लिए।
- गाय का घी: आध्यात्मिक तरक्की के लिए।
भैरव बाबा के पसंदीदा भोग
उन्हें खुश करने के लिए ये चीजें जरूर चढ़ाएं:
- उड़द दाल की खिचड़ी: कालाष्टमी के दिन उड़द की दाल और चावल से बनी खिचड़ी का भोग लगाना बहुत शुभ होता है।
- मीठे गुलगुले और रोट: आटे और गुड़ से बने मीठे गुलगुले और भारी मीठा रोट भैरव जी को बहुत पसंद हैं।
- जलेबी या इमरती: सवा 1 किलो जलेबी का भोग लगाकर इसे कुत्तों या गरीबों में बाँटने से ग्रह दोष शांत होते हैं।
- नींबू की माला: यदि आप घर में नकारात्मक ऊर्जा महसूस करते हैं, तो भैरव जी को 11 या 21 नीबुओं की माला चढ़ाएं।
सेहत अच्छी रखने का एक आसान उपाय
अगर घर में कोई लंबे समय से बीमार है, तो कालाष्टमी के दिन 21 बेलपत्रों पर पीले चंदन से “ॐ नमः शिवाय” लिखकर शिवलिंग पर चढ़ाएं।
व्रत का पारण कैसे करें? (How to Break the Kalashtami Vrat)
व्रत को अगले दिन सुबह खोलने का भी एक खास नियम है। सुबह की नियमित पूजा पूरी करने के बाद सबसे पहले काले कुत्ते को मीठी रोटी, दूध या बिस्किट खिलाएं। इसके बाद ही स्वयं सात्विक भोजन ग्रहण करके व्रत का पारण करें।
Powerful Mantras to Chant on Kalashtami: मंत्र साधना
कालाष्टमी के दिन पूजा के समय या शाम को सरसों के तेल का दीपक जलाकर रुद्राक्ष की माला से इनमें से किसी भी एक मंत्र का 108 बार जाप करें:
- सरल मंत्र: ॐ कालभैरवाय नमः
- भय मुक्ति के लिए बटुक भैरव मंत्र: ॐ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाय कुरु कुरु बटुकाय ह्रीं
- तांत्रिक मंत्र (विशेष साधना के लिए): ॐ भ्रं कालभैरवाय फट्
Kalashtami Vrat में क्या करें और क्या न करें? (Do’s & Don’ts)
चूंकि काल भैरव न्यायप्रिय देवता हैं, इसलिए कुछ बातों का खास ख्याल रखें:
- कुत्तों को नुकसान न पहुँचाएं: कुत्ता काल भैरव की सवारी है, इसलिए कभी भी किसी कुत्ते को मारें या दुत्कारें नहीं। उन्हें प्यार से रोटी या वड़ा खिलाएं।
- झूठ से बचें: इस दिन किसी से झूठ न बोलें और न ही किसी को धोखा दें, क्योंकि काल भैरव झूठ के सख्त खिलाफ हैं।
- गृहस्थ लोगों के लिए नियम: अगर आप शादीशुदा गृहस्थ जीवन जी रहे हैं, तो घर के मंदिर में काल भैरव की उग्र या श्मशान वाली फोटो न रखें। हमेशा बटुक भैरव (बाल रूप) या हंसते हुए शिव परिवार की ही पूजा करें।
- तामसिक चीजें खुद न खाएं: अगर आप भगवान को मदिरा या तामसिक भोग चढ़ाते हैं, तो उसे खुद प्रसाद के रूप में न लें। उसे मंदिर में ही छोड़ दें।
Kalashtami 2026 Dates: साल 2026 में कालाष्टमी कब है?
साल 2026 में आने वाली सभी कालाष्टमी व्रतों की तारीखें और समय नीचे दिया गया है, जिससे आप आसानी से जान सकते हैं कि Kalashtami kab hai:
| अंग्रेजी तिथि और वार | हिंदू मास और पक्ष | अष्टमी तिथि प्रारंभ समय | अष्टमी तिथि समाप्त समय |
| 10 जनवरी 2026 (शनिवार) | पौष, कृष्ण पक्ष | 10 जनवरी, प्रातः 08:23 बजे | 11 जनवरी, प्रातः 10:20 बजे |
| 09 फरवरी 2026 (सोमवार) | माघ, कृष्ण पक्ष | 09 फरवरी, प्रातः 05:01 बजे | 10 फरवरी, प्रातः 07:27 बजे |
| 11 मार्च 2026 (बुधवार) | फाल्गुन, कृष्ण पक्ष | 11 मार्च, मध्यरात्रि 01:54 बजे | 12 मार्च, प्रातः 04:19 बजे |
| 10 अप्रैल 2026 (शुक्रवार) | चैत्र, कृष्ण पक्ष | 09 अप्रैल, रात्रि 09:19 बजे | 10 अप्रैल, रात्रि 11:15 बजे |
| 09 मई 2026 (शनिवार) | वैशाख, कृष्ण पक्ष | 09 मई, दोपहर 02:02 बजे | 10 मई, दोपहर 03:06 बजे |
| 08 जून 2026 (सोमवार) | ज्येष्ठ, कृष्ण पक्ष | 08 जून, प्रातः 03:24 बजे | 09 जून, प्रातः 03:23 बजे |
| 07 जुलाई 2026 (मंगलवार) | आषाढ़, कृष्ण पक्ष | 07 जुलाई, दोपहर 01:24 बजे | 08 जुलाई, दोपहर 12:21 बजे |
| 05 अगस्त 2026 (बुधवार) | श्रावण, कृष्ण पक्ष | 05 अगस्त, रात्रि 08:42 बजे | 06 अगस्त, संध्या 06:52 बजे |
| 04 सितंबर 2026 (शुक्रवार) | भाद्रपद, कृष्ण पक्ष | 04 सितंबर, प्रातः 02:25 बजे | 05 सितंबर, मध्यरात्रि 12:13 बजे |
| 03 अक्टूबर 2026 (शनिवार) | अश्विन, कृष्ण पक्ष | 03 अक्टूबर, प्रातः 07:59 बजे | 04 अक्टूबर, प्रातः 05:51 बजे |
| 01 नवंबर 2026 (रविवार) | कार्तिक, कृष्ण पक्ष | 01 नवंबर, दोपहर 02:51 बजे | 02 नवंबर, दोपहर 01:10 बजे |
| 01 दिसंबर 2026 (मंगलवार) | मार्गशीर्ष, कृष्ण पक्ष (काल भैरव जयंती) | 01 दिसंबर, मध्यरात्रि 12:11 बजे | 01 दिसंबर, रात्रि 11:13 बजे |
| 30 दिसंबर 2026 (बुधवार) | पौष, कृष्ण पक्ष | 30 दिसंबर, दोपहर 12:36 बजे | 31 दिसंबर, दोपहर 12:32 बजे |
Kalashtami 2026: काल भैरव जयंती का खास महासंयोग
ध्यान दें कि 01 दिसंबर 2026 को पड़ने वाली Kalashtami सबसे खास है, क्योंकि इसी दिन मुख्य काल भैरव जयंती मनाई जाएगी। इस साल यह महापर्व मंगलवार के दिन पड़ रहा है। चूंकि मंगलवार और रविवार को काल भैरव की पूजा के लिए सबसे अच्छा दिन माना जाता है, इसलिए मंगलवार को आने वाली यह जयंती आपके जीवन में बहुत शुभ बदलाव ला सकती है।
Kalashtami FAQ (कालाष्टमी) से जुड़े कुछ सवाल-जवाब (FAQs)
1. Kalashtami का व्रत रखने से क्या फायदा होता है?
Kalashtami का व्रत रखने से इंसान के मन का डर दूर होता है और गंभीर बीमारियों व संकटों से मुक्ति मिलती है। इसके अलावा, जिन लोगों की कुंडली में शनि, राहु या केतु की बुरी दशा चल रही है, उन्हें भी इससे बहुत राहत मिलती है।
2. क्या महिलाएँ भी Kalashtami का व्रत रख सकती हैं?
हाँ, महिलाएँ भी यह व्रत रख सकती हैं। बस ध्यान रखें कि वे घर पर पूजा करते समय काल भैरव के उग्र रूप की जगह बटुक भैरव (बाल रूप) या शिव परिवार की पूजा करें।
3. इस दिन काले कुत्ते को खाना खिलाना क्यों जरूरी है?
काला कुत्ता भगवान काल भैरव की सवारी (वाहन) माना जाता है। इस दिन कुत्ते को तेल चुपड़ी रोटी, मीठा पुआ या उड़द के वड़े खिलाने से भैरव बाबा बहुत जल्दी खुश होते हैं और कुंडली के राहु-केतु शांत होते हैं।
4. क्या Kalashtami के व्रत में फलाहार किया जा सकता है?
हाँ, अगर आप पूरा दिन बिना कुछ खाए-पिए (निर्जला) व्रत नहीं रख सकते, तो आप फलाहार व्रत रख सकते हैं। इसमें आप दिन में एक बार फल, दूध या सात्विक शाकाहारी भोजन ग्रहण कर सकते हैं।
5. काल भैरव को “काशी का कोतवाल” क्यों कहते हैं?
पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब काल भैरव को ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति मिली, तो भगवान शिव ने उन्हें अपनी सबसे प्रिय नगरी काशी की सुरक्षा की जिम्मेदारी सौंपी थी। तब से उन्हें काशी का कोतवाल या रखवाला कहा जाता है और वहाँ दर्शन करना अनिवार्य माना जाता है।
जुलाई धार्मिक दृष्टि से बहुत ही ज्यादा महत्वपूर्ण है पूरे महीने के व्रत एवं त्योहारों का के बारे पूरी जानकारी हमने इस आर्टिकल में दी हैं। यदि आपको डिटेल में जानकरी चाहिए उसके भी आर्टिकल लिंक कर दिए हैं आप जरूर पढ़ें। उम्मीद करते हैं धर्मकहानी का यह आर्टिकल आपको बहुत पसंद आया होगा। यदि अभी तक अपने हमारी वेबसाइट की धार्मिक कहानियाँ , मंदिर रहस्यों के बारे मैं नहीं जाना हैं तो केटेगरी मैं जा कर जरूर चेक करें।
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